अत-तौबा · 47/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
لَوْ خَرَجُوا فِيكُم مَّا زَادُوكُمْ إِلَّا خَبَالًا وَلَأَوْضَعُوا خِلَالَكُمْ يَبْغُونَكُمُ الْفِتْنَةَ وَفِيكُمْ سَمَّاعُونَ لَهُمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالظَّالِمِينَ ۝٤٧
Law kharajoo feekum maa zaadookum ilaa Khabaalanw wa la awda`oo khilaalakum yabghoona kumul fitnata wa feekum sammaa`oona lahum; wallaahu `aleemum biz zaalimeen
📖 हिंदी अर्थ
अगर ये लोग तुममें (मिलकर) निकलते भी तो बस तुममे फ़साद ही बरपा कर देते और तुम्हारे हक़ में फ़ितना कराने की ग़रज़ से तुम्हारे दरमियान (इधर उधर) घोड़े दौड़ाते फिरते और तुममें से उनके जासूस भी हैं (जो तुम्हारी उनसे बातें बयान करते हैं) और ख़ुदा शरीरों से ख़ूब वाक़िफ़ है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • خَبَالًا: फ़साद, बिगाड़, यानी नुक़सान और खराबी।
  • لَأَوْضَعُوا: वे तेज़ी से फैलते, दौड़-धूप करते।
  • خِلَالَكُمْ: तुम्हारे बीच, तुम्हारे दरमियान।
  • يَبْغُونَكُمُ الْفِتْنَةَ: वे तुम्हारे लिए फ़ितना (परीक्षा और उपद्रव) चाहते हैं।
  • سَمَّاعُونَ لَهُمْ: उनकी बातें सुनने वाले (यानी उनके जासूस या उनकी बात मानने वाले)।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) की हालत बयान कर रहा है, जो जिहाद से पीछे रहने के लिए बहाने बनाते थे। अल्लाह फ़रमाता है: ऐ ईमान वालों! अगर ये मुनाफ़िक़ तुम्हारे साथ जिहाद के लिए निकलते, तो वे तुम्हारे लिए किसी भलाई का ज़रिया न बनते, बल्कि वे तुम्हारे बीच फ़साद, बिगाड़ और खराबी ही बढ़ाते। वे तुम्हारे दिलों में डर और कमज़ोरी पैदा करते, तुम्हारे हौसले पस्त करते और तुम्हारे बीच नफ़रत व दुश्मनी फैलाने के लिए तेज़ी से चुग़ली और बुराई फैलाते। उनका मक़सद सिर्फ़ यही होता कि तुम्हें फ़ितने में डालें, यानी तुम्हारे ईमान और एकता को कमज़ोर करें और तुम्हें जिहाद से रोकें। और तुम्हारे बीच (ऐ ईमान वालों!) कुछ ऐसे लोग भी मौजूद हैं जो उनकी बातें सुनते हैं, उनकी बातों पर यक़ीन कर लेते हैं और उन्हें आगे फैला देते हैं, जिससे तुम्हारे बीच अलगाव और झगड़े पैदा हो जाते हैं। अल्लाह तआला इन ज़ालिमों (मुनाफ़िक़ों) के हाल से पूरी तरह वाक़िफ़ है — वह उनके दिलों के भेद जानता है और उनके छिपे इरादों से बाख़बर है। वह उन्हें उनके किए की सज़ा ज़रूर देगा।

फ़ायदे (सबक़):

  1. मुनाफ़िक़ और बुरे लोग किसी भी काम में शामिल हों तो वे नुक़सान ही पहुँचाते हैं, भलाई नहीं। इसलिए उनसे दूर रहना चाहिए और उन पर भरोसा नहीं करना चाहिए।
  2. मुसलमानों को चाहिए कि वे अपने बीच एकता और भाईचारे को बनाए रखें, और चुग़ली, बुराई फैलाने वालों की बातों से सावधान रहें।
  3. अल्लाह तआला हर चीज़ से बाख़बर है — वह ज़ालिमों के छिपे हुए मंसूबों को भी जानता है और उन्हें उनकी सज़ा देगा। यह ईमान वालों के लिए तसल्ली है कि अल्लाह उनका हिमायती है।
  4. मुसलमानों को चाहिए कि वे किसी की बात को बिना जाँचे-परखे न मानें, क्योंकि दुश्मन और मुनाफ़िक़ लोग झूठी बातें फैलाकर उनके बीच फूट डालने की कोशिश करते हैं।
🎧 सुनें

📜 आयत 45-49 — अत-तौबा

45إِنَّمَا يَسْتَأْذِنُكَ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَارْتَابَتْ قُلُوبُهُمْ فَهُمْ فِي رَيْبِهِمْ يَتَرَدَّدُونَ
(पीछे रह जाने की) इजाज़त तो बस वही लोग मॉगेंगे जो ख़ुदा और रोजे आख़िरत पर ईमान नहीं रखते और उनके दिल (तरह तरह) के शक़ कर रहे है तो वह अपने शक़ में डावॉडोल हो रहे हैं
46۞ وَلَوْ أَرَادُوا الْخُرُوجَ لَأَعَدُّوا لَهُ عُدَّةً وَلَٰكِن كَرِهَ اللَّهُ انبِعَاثَهُمْ فَثَبَّطَهُمْ وَقِيلَ اقْعُدُوا مَعَ الْقَاعِدِينَ
(कि क्या करें क्या न करें) और अगर ये लोग (घर से) निकलने की ठान लेते तो (कुछ न कुछ सामान तो करते मगर (बात ये है) कि ख़ुदा ने उनके साथ भेजने को नापसन्द किया तो उनको काहिल बना दिया और (गोया) उनसे कह दिया गया कि तुम बैठने वालों के साथ बैठे (मक्खी मारते) रहो
47لَوْ خَرَجُوا فِيكُم مَّا زَادُوكُمْ إِلَّا خَبَالًا وَلَأَوْضَعُوا خِلَالَكُمْ يَبْغُونَكُمُ الْفِتْنَةَ وَفِيكُمْ سَمَّاعُونَ لَهُمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالظَّالِمِينَ
अगर ये लोग तुममें (मिलकर) निकलते भी तो बस तुममे फ़साद ही बरपा कर देते और तुम्हारे हक़ में फ़ितना कराने की ग़रज़ से तुम्हारे दरमियान (इधर उधर) घोड़े दौड़ाते फिरते और तुममें से उनके जासूस भी हैं (जो तुम्हारी उनसे बातें बयान करते हैं) और ख़ुदा शरीरों से ख़ूब वाक़िफ़ है
48لَقَدِ ابْتَغَوُا الْفِتْنَةَ مِن قَبْلُ وَقَلَّبُوا لَكَ الْأُمُورَ حَتَّىٰ جَاءَ الْحَقُّ وَظَهَرَ أَمْرُ اللَّهِ وَهُمْ كَارِهُونَ
(ए रसूल) इसमें तो शक़ नहीं कि उन लोगों ने पहले ही फ़साद डालना चाहा था और तुम्हारी बहुत सी बातें उलट पुलट के यहॉ तक कि हक़ आ पहुंचा और ख़ुदा ही का हुक्म ग़ालिब रहा और उनको नागवार ही रहा
49وَمِنْهُم مَّن يَقُولُ ائْذَن لِّي وَلَا تَفْتِنِّي ۚ أَلَا فِي الْفِتْنَةِ سَقَطُوا ۗ وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمُحِيطَةٌ بِالْكَافِرِينَ
उन लोगों में से बाज़ ऐसे भी हैं जो साफ कहते हैं कि मुझे तो (पीछे रह जाने की) इजाज़त दीजिए और मुझ बला में न फॅसाइए (ऐ रसूल) आगाह हो कि ये लोग खुद बला में (औंधे मुँह) गिर पड़े और जहन्नुम तो काफिरों का यक़ीनन घेरे हुए ही हैं
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अनुवाद — अत-तौबा 47

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Tuesday, August 18, 2026

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