अत-तौबा · 48/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
لَقَدِ ابْتَغَوُا الْفِتْنَةَ مِن قَبْلُ وَقَلَّبُوا لَكَ الْأُمُورَ حَتَّىٰ جَاءَ الْحَقُّ وَظَهَرَ أَمْرُ اللَّهِ وَهُمْ كَارِهُونَ ۝٤٨
Laqadib taghawul fitnata min qablu wa qallaboo lakal umoora hattaa jaaa`al haqqu wa zahara amrul laahi wa hum kaarihoon
📖 हिंदी अर्थ
(ए रसूल) इसमें तो शक़ नहीं कि उन लोगों ने पहले ही फ़साद डालना चाहा था और तुम्हारी बहुत सी बातें उलट पुलट के यहॉ तक कि हक़ आ पहुंचा और ख़ुदा ही का हुक्म ग़ालिब रहा और उनको नागवार ही रहा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْفِتْنَةَ: फ़ितना — यहाँ इसका अर्थ है मुसलमानों को धर्म से भटकाना, उनके बीच फूट डालना और उन्हें कष्ट पहुँचाना।
  • قَلَّبُوا لَكَ الْأُمُورَ: उन्होंने आपके (नबी ﷺ) विरुद्ध तरह-तरह की चालें चलीं, हर संभव तरीके से आपके काम को बिगाड़ने की कोशिश की।
  • جَاءَ الْحَقُّ: सत्य आ गया — अर्थात अल्लाह की ओर से सहायता और विजय प्राप्त हो गई।
  • ظَهَرَ أَمْرُ اللَّهِ: अल्लाह का दीन (इस्लाम) प्रकट और प्रबल हो गया।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के बारे में है जो हर समय इस्लाम और मुसलमानों को नुक़सान पहुँचाने की फ़िक्र में लगे रहते थे। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि इन लोगों ने पहले से ही (ग़ज़वा-ए-तबूक से पहले) फ़ितना फैलाने की कोशिश की — यानी मुसलमानों के बीच फूट डालने, उन्हें जिहाद से रोकने और उनके ईमान को कमज़ोर करने की साज़िशें कीं। उन्होंने आप ﷺ के ख़िलाफ़ हर तरह की चालें चलीं, हर मौक़े पर आपके काम को नाकाम करने की कोशिश की — जैसे उन्होंने उहुद के दिन और ख़ंदक़ (ग़ज़वा-ए-अहज़ाब) के दिन भी ऐसी ही कोशिशें की थीं। वे चाहते थे कि आपका अज़्म (इरादा) कमज़ोर हो जाए और आप जिहाद से रुक जाएँ।

लेकिन अल्लाह का फ़ैसला उनकी साज़िशों के उलट हुआ। अल्लाह ने अपने नबी ﷺ की मदद की, सत्य को प्रकट किया, इस्लाम को ग़ालिब किया और अपने दीन को पूरी दुनिया में फैलाया — और यह सब उन मुनाफ़िक़ों की इच्छा के विरुद्ध हुआ। वे इससे बहुत नाराज़ और क्षुब्ध थे, क्योंकि वे चाहते थे कि बातिल (असत्य) की जीत हो और हक़ (सत्य) दबा रहे। लेकिन अल्लाह ने उनकी सारी चालों को नाकाम कर दिया और सच्चाई को सबसे ऊपर रखा।


फ़ायदे (सीख):

  1. अल्लाह की मदद हक़ के साथ है: चाहे दुश्मन कितनी भी साज़िशें कर लें, अल्लाह अपने दीन की मदद ज़रूर करता है। मुसलमानों को कभी निराश नहीं होना चाहिए।
  2. मुनाफ़िक़ों की फ़ितरत: यह आयत हमें सिखाती है कि मुनाफ़िक़ हमेशा फ़ितना फैलाने और मुसलमानों को कमज़ोर करने की कोशिश में लगे रहते हैं। हमें उनकी चालों से सावधान रहना चाहिए और उन पर भरोसा नहीं करना चाहिए।
  3. सब्र और भरोसा: जब नबी ﷺ को इतनी साज़िशों का सामना करना पड़ा, तो हमें भी मुश्किलों में सब्र रखना चाहिए और अल्लाह पर भरोसा करना चाहिए। अंजाम हमेशा सब्र करने वालों के हक़ में होता है।
  4. हक़ की जीत तय है: चाहे दुनिया भर के लोग हक़ के ख़िलाफ़ हों, अल्लाह का वादा है कि हक़ ही बुलंद होगा। यह बात मुसलमान के दिल को तसल्ली देती है और उसे सीधे रास्ते पर चलने की हिम्मत देती है।
  5. दुश्मन की नाराज़गी की परवाह न करें: मुनाफ़िक़ और दुश्मन हक़ के प्रकट होने से नाराज़ होंगे ही, लेकिन हमें उनकी नाराज़गी की परवाह किए बिना अल्लाह के दीन की ख़िदमत करनी चाहिए।


📜 आयत 46-50 — अत-तौबा

46۞ وَلَوْ أَرَادُوا الْخُرُوجَ لَأَعَدُّوا لَهُ عُدَّةً وَلَٰكِن كَرِهَ اللَّهُ انبِعَاثَهُمْ فَثَبَّطَهُمْ وَقِيلَ اقْعُدُوا مَعَ الْقَاعِدِينَ
(कि क्या करें क्या न करें) और अगर ये लोग (घर से) निकलने की ठान लेते तो (कुछ न कुछ सामान तो करते मगर (बात ये है) कि ख़ुदा ने उनके साथ भेजने को नापसन्द किया तो उनको काहिल बना दिया और (गोया) उनसे कह दिया गया कि तुम बैठने वालों के साथ बैठे (मक्खी मारते) रहो
47لَوْ خَرَجُوا فِيكُم مَّا زَادُوكُمْ إِلَّا خَبَالًا وَلَأَوْضَعُوا خِلَالَكُمْ يَبْغُونَكُمُ الْفِتْنَةَ وَفِيكُمْ سَمَّاعُونَ لَهُمْ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ بِالظَّالِمِينَ
अगर ये लोग तुममें (मिलकर) निकलते भी तो बस तुममे फ़साद ही बरपा कर देते और तुम्हारे हक़ में फ़ितना कराने की ग़रज़ से तुम्हारे दरमियान (इधर उधर) घोड़े दौड़ाते फिरते और तुममें से उनके जासूस भी हैं (जो तुम्हारी उनसे बातें बयान करते हैं) और ख़ुदा शरीरों से ख़ूब वाक़िफ़ है
48لَقَدِ ابْتَغَوُا الْفِتْنَةَ مِن قَبْلُ وَقَلَّبُوا لَكَ الْأُمُورَ حَتَّىٰ جَاءَ الْحَقُّ وَظَهَرَ أَمْرُ اللَّهِ وَهُمْ كَارِهُونَ
(ए रसूल) इसमें तो शक़ नहीं कि उन लोगों ने पहले ही फ़साद डालना चाहा था और तुम्हारी बहुत सी बातें उलट पुलट के यहॉ तक कि हक़ आ पहुंचा और ख़ुदा ही का हुक्म ग़ालिब रहा और उनको नागवार ही रहा
49وَمِنْهُم مَّن يَقُولُ ائْذَن لِّي وَلَا تَفْتِنِّي ۚ أَلَا فِي الْفِتْنَةِ سَقَطُوا ۗ وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمُحِيطَةٌ بِالْكَافِرِينَ
उन लोगों में से बाज़ ऐसे भी हैं जो साफ कहते हैं कि मुझे तो (पीछे रह जाने की) इजाज़त दीजिए और मुझ बला में न फॅसाइए (ऐ रसूल) आगाह हो कि ये लोग खुद बला में (औंधे मुँह) गिर पड़े और जहन्नुम तो काफिरों का यक़ीनन घेरे हुए ही हैं
50إِن تُصِبْكَ حَسَنَةٌ تَسُؤْهُمْ ۖ وَإِن تُصِبْكَ مُصِيبَةٌ يَقُولُوا قَدْ أَخَذْنَا أَمْرَنَا مِن قَبْلُ وَيَتَوَلَّوا وَّهُمْ فَرِحُونَ
तुमको कोई फायदा पहुंचा तो उन को बुरा मालूम होता है और अगर तुम पर कोई मुसीबत आ पड़ती तो ये लोग कहते हैं कि (इस वजह से) हमने अपना काम पहले ही ठीक कर लिया था और (ये कह कर) ख़ुश (तुम्हारे पास से उठकर) वापस लौटतें है
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अनुवाद — अत-तौबा 48

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Tuesday, August 18, 2026

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