अत-तौबा · 87/129
अनुवाद उच्चारण — सूरा अत-तौबा
رَضُوا بِأَن يَكُونُوا مَعَ الْخَوَالِفِ وَطُبِعَ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَفْقَهُونَ ۝٨٧
Radoo bi ai yakoonoo ma`al khawaalifi wa tubi`a `alaa quloobihim fahum laa yafqahoon
📖 हिंदी अर्थ
ये इस बात से ख़ुश हैं कि पीछे रह जाने वालों (औरतों, बच्चों, बीमारो के साथ बैठे) रहें और (गोया) उनके दिल पर मोहर कर दी गई तो ये कुछ नहीं समझतें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْخَوَالِفِ (अल-ख़वालिफ़): यह "خَالِفَة" का बहुवचन है, जिसका अर्थ है पीछे रह जाने वाली औरतें, बच्चे, और वे लोग जिनके पास जिहाद से माफ़ी का कोई उज़्र (कारण) हो।
  • طُبِعَ (तुबि'अ): मुहर लगा दी गई, सील कर दी गई।
  • يَفْقَهُونَ (यफ़्क़हून): समझते हैं, अक़्ल और समझ से काम लेते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

इन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) ने अपने लिए यह अपमान और ज़िल्लत पसंद की कि वे जिहाद और अल्लाह के रास्ते में रसूलुल्लाह ﷺ के साथ निकलने के बजाय उन औरतों, बच्चों और माफ़ी पाने वाले लोगों के साथ घरों में बैठे रहें। उन्होंने इसी को अपनी ख़ुशी और संतुष्टि का ज़रिया बना लिया। अल्लाह तआला ने उनके कुफ़्र और निफ़ाक़ की वजह से उनके दिलों पर मुहर लगा दी, यानी उनके दिल बंद कर दिए गए, जिससे हक़ और सच्चाई उनमें दाख़िल नहीं हो सकती। नतीजा यह हुआ कि वे यह नहीं समझ पाते कि उनकी भलाई और कामयाबी किस चीज़ में है — वह जिहाद और रसूल ﷺ की मोहब्बत व इताअत में है, न कि पीछे रह जाने और आराम-तलबी में। वे अपनी आख़िरत को बर्बाद करके दुनिया की फ़ानी राहत पर ख़ुश हैं, और यही उनकी सबसे बड़ी नादानी है।


फ़ायदे (उपदेश):

  1. इज़्ज़त और कामयाबी अल्लाह की इताअत में है: जो बंदा अल्लाह और उसके रसूल की बात मानता है और उसके दीन की ख़िदमत करता है, अल्लाह उसे दुनिया और आख़िरत में इज़्ज़त देता है। जिहाद और नेक कामों से पीछे हटना ज़िल्लत का ज़रिया है।
  2. दिल की मुहर — गुनाहों का अंजाम: जब इंसान लगातार गुनाह और निफ़ाक़ पर अड़ा रहता है, तो अल्लाह उसके दिल पर मुहर लगा देता है, जिससे वह हिदायत और नेकी को समझ ही नहीं पाता। यह सबसे बड़ी सज़ा है।
  3. आराम-तलबी और ज़िम्मेदारी से भागना मुनाफ़िक़ों की आदत है: सच्चा मुसलमान वह है जो दीन की ख़ातिर कुर्बानी देने को तैयार रहे, चाहे उसमें मेहनत और मुश्किल ही क्यों न हो। आराम पसंदी और ज़िम्मेदारियों से बचना ईमान की कमज़ोरी की निशानी है।
  4. समझदारी का असली मापदंड: असली अक़्लमंद वह नहीं जो सिर्फ़ दुनिया की भागदौड़ समझे, बल्कि वह है जो आख़िरत की तैयारी को समझे और उस पर अमल करे। जो लोग आख़िरत को भूलकर दुनिया पर ख़ुश हो जाते हैं, वे सबसे बड़े नासमझ हैं।
  5. अल्लाह की रहमत से निराश न हों: यह आयत हमें सिखाती है कि जब तक दिल खुला है और हम सच्चाई को समझ सकते हैं, हमें तौबा कर लेनी चाहिए। किसी को भी अपने गुनाहों पर अड़े रहने की जुर्रत नहीं करनी चाहिए, क्योंकि दिल की मुहर लगने के बाद हिदायत का रास्ता बंद हो जाता है।


📜 आयत 85-89 — सूरा अत-तौबा

85وَلَا تُعْجِبْكَ أَمْوَالُهُمْ وَأَوْلَادُهُمْ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ أَن يُعَذِّبَهُم بِهَا فِي الدُّنْيَا وَتَزْهَقَ أَنفُسُهُمْ وَهُمْ كَافِرُونَ
और उनके माल और उनकी औलाद (की कसरत) तुम्हें ताज्जुब (हैरत) में न डाले (क्योकि) ख़ुदा तो बस ये चाहता है कि दुनिया में भी उनके माल और औलाद की बदौलत उनको अज़ाब में मुब्तिला करे और उनकी जान निकालने लगे तो उस वक्त भी ये काफ़िर (के काफ़िर ही) रहें
86وَإِذَا أُنزِلَتْ سُورَةٌ أَنْ آمِنُوا بِاللَّهِ وَجَاهِدُوا مَعَ رَسُولِهِ اسْتَأْذَنَكَ أُولُو الطَّوْلِ مِنْهُمْ وَقَالُوا ذَرْنَا نَكُن مَّعَ الْقَاعِدِينَ
और जब कोई सूरा इस बारे में नाज़िल हुआ कि ख़ुदा को मानों और उसके रसूल के साथ जिहाद करो तो जो उनमें से दौलत वाले हैं वह तुमसे इजाज़त मांगते हैं और कहते हैं कि हमें (यहीं छोड़ दीजिए) कि हम भी (घर बैठने वालो के साथ (बैठे) रहें
87رَضُوا بِأَن يَكُونُوا مَعَ الْخَوَالِفِ وَطُبِعَ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَفْقَهُونَ
ये इस बात से ख़ुश हैं कि पीछे रह जाने वालों (औरतों, बच्चों, बीमारो के साथ बैठे) रहें और (गोया) उनके दिल पर मोहर कर दी गई तो ये कुछ नहीं समझतें
88لَٰكِنِ الرَّسُولُ وَالَّذِينَ آمَنُوا مَعَهُ جَاهَدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ ۚ وَأُولَٰئِكَ لَهُمُ الْخَيْرَاتُ ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
मगर रसूल और जो लोग उनके साथ ईमान लाए हैं उन लोगों ने अपने अपने माल और अपनी अपनी जानों से जिहाद किया- यही वह लोग हैं जिनके लिए (हर तरह की) भलाइयाँ हैं और यही लोग कामयाब होने वाले हैं
89أَعَدَّ اللَّهُ لَهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ ذَٰلِكَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ
ख़ुदा ने उनके वास्ते (बेहश्त) के वह (हरे भरे) बाग़ तैयार कर रखे हैं जिनके (दरख्तों के) नीचे नहरे जारी हैं (और ये) इसमें हमेशा रहेंगें यही तो बड़ी कामयाबी हैं
अत-तौबाकुरान सूची
129आयत
मदनीअवतरण स्थान
87आयत

अनुवाद — अत-तौबा 87

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Wednesday, September 30, 2026

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