अत-तौबा · 86/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
وَإِذَا أُنزِلَتْ سُورَةٌ أَنْ آمِنُوا بِاللَّهِ وَجَاهِدُوا مَعَ رَسُولِهِ اسْتَأْذَنَكَ أُولُو الطَّوْلِ مِنْهُمْ وَقَالُوا ذَرْنَا نَكُن مَّعَ الْقَاعِدِينَ ۝٨٦
Wa izaaa unzilat Sooratun an aaminoo billaahi wa jaahidoo ma`a Rasoolihis taazanaka uluttawli minhum wa qaaloo zarnaa nakum ma`alqaa `ideen
📖 हिंदी अर्थ
और जब कोई सूरा इस बारे में नाज़िल हुआ कि ख़ुदा को मानों और उसके रसूल के साथ जिहाद करो तो जो उनमें से दौलत वाले हैं वह तुमसे इजाज़त मांगते हैं और कहते हैं कि हमें (यहीं छोड़ दीजिए) कि हम भी (घर बैठने वालो के साथ (बैठे) रहें
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أُولُو الطَّوْلِ: धन-दौलत और सामर्थ्य वाले लोग।
  • ذَرْنَا: हमें छोड़ दीजिए।
  • الْقَاعِدِينَ: बैठने वाले (जिहाद से पीछे रहने वाले) अर्थात् वे लोग जो युद्ध में शामिल नहीं होते।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब अल्लाह की ओर से कोई सूरा (अध्याय) उतारी जाती है जिसमें अल्लाह पर ईमान लाने और उसके रसूल ﷺ के साथ मिलकर जिहाद करने का आदेश दिया जाता है, तो उनमें से जो लोग धन-संपन्न और सुख-सुविधाओं वाले होते हैं, वे आप ﷺ से युद्ध में शामिल न होने की अनुमति माँगते हैं। वे कहते हैं: "हमें छोड़ दीजिए, हम उन कमज़ोर, बीमार और असमर्थ लोगों के साथ रहेंगे जो जिहाद से पीछे रहते हैं।" यह उनका बहाना था, जबकि वास्तविकता यह थी कि वे आलसी और कायर थे, और उनके पास कोई वैध कारण नहीं था। वे अपने धन और ताकत के बावजूद जिहाद से बचना चाहते थे, और अपने इस कृत्य को एक सामान्य बात के रूप में पेश कर रहे थे, जबकि यह उनके निफ़ाक़ (पाखंड) और कमज़ोर ईमान का प्रमाण था।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि जब अल्लाह और उसके रसूल का आदेश आए, तो उसका तुरंत पालन करना चाहिए, बिना किसी बहाने के।
  2. धन और सामर्थ्य अल्लाह की ओर से एक अमानत (जिम्मेदारी) है, और इसे अल्लाह के रास्ते में खर्च करना चाहिए, न कि आराम और सुख-सुविधाओं में।
  3. मुनाफ़िक़ीन (पाखंडियों) की आदत होती है कि वे धार्मिक ज़िम्मेदारियों से बचने के लिए झूठे बहाने बनाते हैं, जबकि सच्चे मोमिन हर हाल में अल्लाह के आदेश का पालन करते हैं।
  4. यह आयत हमें यह भी बताती है कि इस्लाम में कमज़ोर और बीमार लोगों के लिए छूट है, लेकिन जो लोग सक्षम हैं, उन्हें बहाने बनाकर पीछे नहीं हटना चाहिए।
  5. अल्लाह के रास्ते में कुर्बानी देना ईमान की निशानी है, और जो लोग अपनी जान और माल से जिहाद करते हैं, वे अल्लाह के यहाँ बड़े दर्जे के हक़दार हैं।
🎧 सुनें

📜 आयत 84-88 — अत-तौबा

84وَلَا تُصَلِّ عَلَىٰ أَحَدٍ مِّنْهُم مَّاتَ أَبَدًا وَلَا تَقُمْ عَلَىٰ قَبْرِهِ ۖ إِنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَمَاتُوا وَهُمْ فَاسِقُونَ
और (ऐ रसूल) उन मुनाफिक़ीन में से जो मर जाए तो कभी ना किसी पर नमाजे ज़नाज़ा पढ़ना और न उसकी क़ब्र पर (जाकर) खडे होना इन लोगों ने यक़ीनन ख़ुदा और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया और बदकारी की हालत में मर (भी) गए
85وَلَا تُعْجِبْكَ أَمْوَالُهُمْ وَأَوْلَادُهُمْ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ أَن يُعَذِّبَهُم بِهَا فِي الدُّنْيَا وَتَزْهَقَ أَنفُسُهُمْ وَهُمْ كَافِرُونَ
और उनके माल और उनकी औलाद (की कसरत) तुम्हें ताज्जुब (हैरत) में न डाले (क्योकि) ख़ुदा तो बस ये चाहता है कि दुनिया में भी उनके माल और औलाद की बदौलत उनको अज़ाब में मुब्तिला करे और उनकी जान निकालने लगे तो उस वक्त भी ये काफ़िर (के काफ़िर ही) रहें
86وَإِذَا أُنزِلَتْ سُورَةٌ أَنْ آمِنُوا بِاللَّهِ وَجَاهِدُوا مَعَ رَسُولِهِ اسْتَأْذَنَكَ أُولُو الطَّوْلِ مِنْهُمْ وَقَالُوا ذَرْنَا نَكُن مَّعَ الْقَاعِدِينَ
और जब कोई सूरा इस बारे में नाज़िल हुआ कि ख़ुदा को मानों और उसके रसूल के साथ जिहाद करो तो जो उनमें से दौलत वाले हैं वह तुमसे इजाज़त मांगते हैं और कहते हैं कि हमें (यहीं छोड़ दीजिए) कि हम भी (घर बैठने वालो के साथ (बैठे) रहें
87رَضُوا بِأَن يَكُونُوا مَعَ الْخَوَالِفِ وَطُبِعَ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ فَهُمْ لَا يَفْقَهُونَ
ये इस बात से ख़ुश हैं कि पीछे रह जाने वालों (औरतों, बच्चों, बीमारो के साथ बैठे) रहें और (गोया) उनके दिल पर मोहर कर दी गई तो ये कुछ नहीं समझतें
88لَٰكِنِ الرَّسُولُ وَالَّذِينَ آمَنُوا مَعَهُ جَاهَدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ ۚ وَأُولَٰئِكَ لَهُمُ الْخَيْرَاتُ ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
मगर रसूल और जो लोग उनके साथ ईमान लाए हैं उन लोगों ने अपने अपने माल और अपनी अपनी जानों से जिहाद किया- यही वह लोग हैं जिनके लिए (हर तरह की) भलाइयाँ हैं और यही लोग कामयाब होने वाले हैं
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अनुवाद — अत-तौबा 86

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Tuesday, August 18, 2026

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