Wa yaa qawmi haazihee naaqatul laahi lakum aayatan fazaroohaa taakul feee ardil laahi wa laa tamassoohaa bisooo`in fa yaakhuzakum azaabun qareeb
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
ऐ मेरी क़ौम ये ख़ुदा की (भेजी हुई) ऊँटनी है तुम्हारे वास्ते (मेरी नबूवत का) एक मौजिज़ा है तो इसको (उसके हाल पर) छोड़ दो कि ख़ुदा की ज़मीन में (जहाँ चाहे) खाए और उसे कोई तकलीफ न पहुँचाओ
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اور یہ بھی کہا کہ اے قوم! یہ خدا کی اونٹنی تمہارے لیے ایک نشانی (یعنی معجزہ) ہے تو اس کو چھوڑ دو کہ خدا کی زمین میں (جہاں چاہے) چرے اور اس کو کسی طرح کی تکلیف نہ دینا ورنہ تمہیں جلد عذاب آپکڑے گا
ऐ मेरी क़ौम ये ख़ुदा की (भेजी हुई) ऊँटनी है तुम्हारे वास्ते (मेरी नबूवत का) एक मौजिज़ा है तो इसको (उसके हाल पर) छोड़ दो कि ख़ुदा की ज़मीन में (जहाँ चाहे) खाए और उसे कोई तकलीफ न पहुँचाओ
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
نَاقَةُ اللَّهِ: अल्लाह की ऊँटनी।
آيَةً: निशानी, प्रमाण, चमत्कार।
فَذَرُوهَا: उसे छोड़ दो।
تَأْكُلْ فِي أَرْضِ اللَّهِ: अल्लाह की धरती में चरती रहे।
بِسُوءٍ: किसी बुराई या नुक़सान के साथ (यहाँ अर्थ है उसे मारना या ज़ख़्मी करना)।
عَذَابٌ قَرِيبٌ: निकट का अज़ाब (जो उसी वक़्त या बहुत जल्द आ जाए)।
तफ़सीर (व्याख्या):
ऐ मेरी क़ौम के लोगो! यह अल्लाह की ऊँटनी है, जिसे अल्लाह ने तुम्हारे लिए एक निशानी और प्रमाण बनाया है। यह मेरी सच्चाई की गवाह है, कि मैं जो कुछ कहता हूँ वह अल्लाह की तरफ़ से है। तुमने मुझसे एक चमत्कार माँगा था, और अल्लाह ने तुम्हारी माँग पूरी करते हुए यह ऊँटनी एक चट्टान से निकाली है। अब यह तुम्हारे सामने जीती-जागती निशानी के रूप में मौजूद है।
इसलिए, उसे छोड़ दो कि वह अल्लाह की धरती पर चरती रहे। उसके खाने-पीने की ज़िम्मेदारी तुम पर नहीं है, अल्लाह ही उसे रोज़ी देता है। उसे किसी भी प्रकार का नुक़सान मत पहुँचाओ, न उसे मारो और न ही उसे ज़ख़्मी करो। यदि तुमने उसे कोई तकलीफ़ दी या उसके साथ बुराई की, तो अल्लाह का अज़ाब तुम पर आ जाएगा, और वह अज़ाब बहुत निकट होगा — यानी तुम्हारे उस बुरे काम के तुरंत बाद ही आ जाएगा। यह अज़ाब तीन दिनों के भीतर आने वाला था, जैसा कि अल्लाह ने अपने नबी सालिह (अलैहिस्सलाम) के ज़रिए बताया था।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
अल्लाह के नबी अपनी क़ौम के लिए सिर्फ़ ख़ैर और भलाई चाहते हैं। वे लोगों को अज़ाब से डराते हैं ताकि वे सीधे रास्ते पर आ जाएँ, और यही उनकी दया और शफ़्क़त का सबूत है।
अल्लाह के निशानियों का सम्मान करना चाहिए। जब अल्लाह कोई चमत्कार या निशानी दिखाता है, तो उसका मज़ाक़ उड़ाना या उसे नुक़सान पहुँचाना अल्लाह की नाफ़रमानी है और उसका अंजाम बहुत बुरा होता है।
अल्लाह की रहमत और उसका अज़ाब दोनों क़रीब हैं। इंसान को चाहिए कि वह अल्लाह की नाफ़रमानी से बचे, क्योंकि अज़ाब किसी भी वक़्त आ सकता है — जब इंसान को उम्मीद न हो।
यह क़िस्सा हमें सिखाता है कि अल्लाह के हुक्मों की खिलाफ़वर्ज़ी करने वालों का अंजाम तबाही है, जबकि अल्लाह के हुक्मों का पालन करने वालों के लिए सुकून और कामयाबी है। इस्लाम हमें अल्लाह की रहमत की तरफ़ बुलाता है और उसके अज़ाब से बचने की तरकीब सिखाता है — और वह तरकीब है ईमान, इताअत और अच्छे अख़लाक़।
वह लोग कहने लगे ऐ सालेह इसके पहले तो तुमसे हमारी उम्मीदें वाबस्ता थी तो क्या अब तुम जिस चीज़ की परसतिश हमारे बाप दादा करते थे उसकी परसतिश से हमें रोकते हो और जिस दीन की तरफ तुम हमें बुलाते हो हम तो उसकी निस्बत ऐसे शक़ में पड़े हैं
कि उसने हैरत में डाल दिया है सालेह ने जवाब दिया ऐ मेरी क़ौम भला देखो तो कि अगर मैं अपने परवरदिगार की तरफ से रौशन दलील पर हूँ और उसने मुझे अपनी (बारगाह) मे रहमत (नबूवत) अता की है इस पर भी अगर मै उसकी नाफ़रमानी करुँ तो ख़ुदा (के अज़ाब से बचाने में) मेरी मदद कौन करेगा-फिर तुम सिवा नुक़सान के मेरा कुछ बढ़ा दोगे नहीं
ऐ मेरी क़ौम ये ख़ुदा की (भेजी हुई) ऊँटनी है तुम्हारे वास्ते (मेरी नबूवत का) एक मौजिज़ा है तो इसको (उसके हाल पर) छोड़ दो कि ख़ुदा की ज़मीन में (जहाँ चाहे) खाए और उसे कोई तकलीफ न पहुँचाओ
(वरना) फिर तुम्हें फौरन ही (ख़ुदा का) अज़ाब ले डालेगा इस पर भी उन लोगों ने उसकी कूँचे काटकर (मार) डाला तब सालेह ने कहा अच्छा तीन दिन तक (और) अपने अपने घर में चैन (उड़ा लो)
यही ख़ुदा का वायदा है जो कभी झूठा नहीं होता फिर जब हमारा (अज़ाब का) हुक्म आ पहुँचा तो हमने सालेह और उन लोगों को जो उसके साथ ईमान लाए थे अपनी मेहरबानी से नजात दी और उस दिन की रुसवाई से बचा लिया इसमें शक़ नहीं कि तेरा परवरदिगार ज़बरदस्त ग़ालिब है
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