(वरना) फिर तुम्हें फौरन ही (ख़ुदा का) अज़ाब ले डालेगा इस पर भी उन लोगों ने उसकी कूँचे काटकर (मार) डाला तब सालेह ने कहा अच्छा तीन दिन तक (और) अपने अपने घर में चैन (उड़ा लो)
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مگر انہوں نے اس کی کانچیں کاٹ ڈالیں۔ تو (صالح نے) کہا کہ اپنے گھروں میں تم تین دن (اور) فائدہ اٹھا لو۔ یہ وعدہ ہے کہ جھوٹا نہ ہوگا
(वरना) फिर तुम्हें फौरन ही (ख़ुदा का) अज़ाब ले डालेगा इस पर भी उन लोगों ने उसकी कूँचे काटकर (मार) डाला तब सालेह ने कहा अच्छा तीन दिन तक (और) अपने अपने घर में चैन (उड़ा लो)
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
فَعَقَرُوهَا: उन्होंने (क़ौमे-समूद ने) उस ऊँटनी को काट डाला या उसके पैर काटकर उसे गिरा दिया।
تَمَتَّعُوا: आनंद उठाओ, जीवन बिताओ।
فِي دَارِكُمْ: अपने घरों में, अपनी बस्ती में।
وَعْدٌ غَيْرُ مَكْذُوبٍ: एक ऐसा वादा जो झुठलाया न जा सके, अर्थात सत्य और अवश्य पूरा होने वाला वादा।
तफ़सीर (व्याख्या):
जब हज़रत सालेह (अलैहिस्सलाम) की क़ौम ने उनकी नसीहत को नकारते हुए अल्लाह की भेजी हुई निशानी (ऊँटनी) को काट डाला, और यह कार्य उन्होंने अत्यधिक हठधर्मी और इनकार के साथ किया, तो हज़रत सालेह (अलैहिस्सलाम) ने उन्हें बताया कि अब तुम्हारे लिए केवल तीन दिनों का जीवन शेष है। उन्होंने कहा: "अपने घरों में तीन दिन और आनंद उठा लो, फिर अल्लाह का अज़ाब (दंड) तुम पर आकर रहेगा।" यह कोई धमकी या डराने वाली बात नहीं थी, बल्कि यह अल्लाह की ओर से एक सच्चा और अटल वादा था, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। यह वादा अवश्य पूरा होना था, क्योंकि अल्लाह का फैसला कभी टलता नहीं। इसके बाद तीन दिनों के भीतर ही उस क़ौम पर अज़ाब आ गया और वे अपने घरों में तबाह हो गए।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
अल्लाह के नबियों की निशानियों और आदेशों का मज़ाक उड़ाना या उन्हें नकारना विनाश का कारण बनता है। जो लोग हक़ (सत्य) को देखकर भी उसे ठुकरा देते हैं, उनका अंजाम बहुत बुरा होता है।
अल्लाह का वादा और उसकी चेतावनी कभी झूठी नहीं होती। जब अल्लाह किसी क़ौम के लिए अज़ाब का फैसला कर लेता है, तो वह निश्चित रूप से आता है, चाहे उसमें कितनी भी देर क्यों न हो।
इस आयत से हमें सीख मिलती है कि अल्लाह की दी हुई मोहलत (छूट) को हमें अपनी ताक़त या सुरक्षा नहीं समझनी चाहिए। कभी-कभी अल्लाह गुनाहगारों को थोड़ी सी मोहलत देता है, लेकिन फिर उन्हें अचानक पकड़ लेता है।
नबियों की दावत और उनकी चेतावनियाँ हमेशा सच्ची और नेक नीयत पर आधारित होती हैं। उनका उद्देश्य लोगों को सुधारना होता है, न कि डराना या धमकाना। इसलिए हमें उनकी बातों को गंभीरता से लेना चाहिए।
यह क़िस्सा हमें बताता है कि अल्लाह की पकड़ बहुत सख्त है, और उसके आदेशों की अवहेलना करने वालों को कोई नहीं बचा सकता। इसलिए हमें हमेशा अल्लाह के आदेशों का पालन करना चाहिए और उसकी निशानियों से सबक लेना चाहिए।
कि उसने हैरत में डाल दिया है सालेह ने जवाब दिया ऐ मेरी क़ौम भला देखो तो कि अगर मैं अपने परवरदिगार की तरफ से रौशन दलील पर हूँ और उसने मुझे अपनी (बारगाह) मे रहमत (नबूवत) अता की है इस पर भी अगर मै उसकी नाफ़रमानी करुँ तो ख़ुदा (के अज़ाब से बचाने में) मेरी मदद कौन करेगा-फिर तुम सिवा नुक़सान के मेरा कुछ बढ़ा दोगे नहीं
ऐ मेरी क़ौम ये ख़ुदा की (भेजी हुई) ऊँटनी है तुम्हारे वास्ते (मेरी नबूवत का) एक मौजिज़ा है तो इसको (उसके हाल पर) छोड़ दो कि ख़ुदा की ज़मीन में (जहाँ चाहे) खाए और उसे कोई तकलीफ न पहुँचाओ
(वरना) फिर तुम्हें फौरन ही (ख़ुदा का) अज़ाब ले डालेगा इस पर भी उन लोगों ने उसकी कूँचे काटकर (मार) डाला तब सालेह ने कहा अच्छा तीन दिन तक (और) अपने अपने घर में चैन (उड़ा लो)
यही ख़ुदा का वायदा है जो कभी झूठा नहीं होता फिर जब हमारा (अज़ाब का) हुक्म आ पहुँचा तो हमने सालेह और उन लोगों को जो उसके साथ ईमान लाए थे अपनी मेहरबानी से नजात दी और उस दिन की रुसवाई से बचा लिया इसमें शक़ नहीं कि तेरा परवरदिगार ज़बरदस्त ग़ालिब है
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