Manihtadaa fa innamaa yahtadee linafsihee wa man dalla fa innamaa yadillu `alaihaa; wa laa taziru waaziratunw wizra ukhraa; wa maa kunnaa mu`azzibeena hatta nab`asa Rasoola
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
जो शख़्श रुबरु होता है तो बस अपने फायदे के लिए यह पर आता है और जो शख़्श गुमराह होता है तो उसने भटक कर अपना आप बिगाड़ा और कोई शख़्श किसी दूसरे (के गुनाह) का बोझ अपने सर नहीं लेगा और हम तो जब तक रसूल को भेजकर तमाम हुज्जत न कर लें किसी पर अज़ाब नहीं किया करते
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🌐 اردو
جو شخص ہدایت اختیار کرتا ہے تو اپنے لئے اختیار کرتا ہے۔ اور جو گمراہ ہوتا ہے گمراہی کا ضرر بھی اسی کو ہوگا۔ اور کوئی شخص کسی دوسرے کا بوجھ نہیں اٹھائے گا۔ اور جب تک ہم پیغمبر نہ بھیج لیں عذاب نہیں دیا کرتے
जो शख़्श रुबरु होता है तो बस अपने फायदे के लिए यह पर आता है और जो शख़्श गुमराह होता है तो उसने भटक कर अपना आप बिगाड़ा और कोई शख़्श किसी दूसरे (के गुनाह) का बोझ अपने सर नहीं लेगा और हम तो जब तक रसूल को भेजकर तमाम हुज्जत न कर लें किसी पर अज़ाब नहीं किया करते
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
اهْتَدَىٰ: हिदायत पाना, सीधे मार्ग पर चलना।
ضَلَّ: गुमराह होना, पथभ्रष्ट होना।
تَزِرُ: उठाना, वहन करना।
وَازِرَةٌ: बोझ उठाने वाली (आत्मा)।
وِزْرَ: बोझ, पाप, गुनाह।
نَبْعَثَ: भेजना, उठाना (रसूल भेजना)।
तफसीर (व्याख्या):
इस पवित्र आयत में अल्लाह तआला स्पष्ट करते हैं कि हिदायत और गुमराही का फल व्यक्ति को खुद ही मिलता है। जो कोई सीधे मार्ग पर चलता है, उसकी हिदायत का लाभ उसी को पहुँचता है, और जो गुमराही का रास्ता अपनाता है, उसकी गुमराही का अंजाम भी उसी के लिए है। यह न्याय का मूल सिद्धांत है कि कोई आत्मा किसी दूसरी आत्मा का पाप नहीं उठाएगी। हर इंसान अपने कर्मों के लिए स्वयं जिम्मेदार है।
इसके बाद अल्लाह तआला अपनी रहमत और अदल का एक और पहलू बयान करते हैं कि वह किसी को तब तक अज़ाब नहीं देते, जब तक कि उनके पास रसूल न भेज दिया जाए। यानी अल्लाह की ओर से हुज्जत (प्रमाण) क़ायम किए बिना किसी को सज़ा नहीं दी जाती। रसूलों के आने के बाद ही लोगों पर अल्लाह की आज्ञा मानने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह स्थापित होती है, और उसके बाद ही उन्हें इनाम या सज़ा का हक़दार बनाया जाता है।
फ़ायदे (शिक्षाएँ):
इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि इस्लाम में व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी का सिद्धांत है — हर इंसान अपने अच्छे या बुरे कर्मों का फल खुद पाएगा, किसी और का बोझ उस पर नहीं डाला जाएगा। यह अत्यंत न्यायपूर्ण व्यवस्था है जो मनुष्य को आत्मविश्वास और उत्तरदायित्व की भावना देती है।
अल्लाह की रहमत का पता चलता है कि उसने बिना मार्गदर्शन भेजे किसी को सज़ा का पात्र नहीं बनाया। यह उसकी दया और न्याय का प्रमाण है कि उसने हर युग में रसूल और किताबें भेजकर लोगों को सही रास्ता दिखाया।
यह आयत हमें प्रेरित करती है कि हम अपने कर्मों को सुधारें और केवल अपने अच्छे कर्मों पर भरोसा रखें, क्योंकि क़ियामत के दिन कोई किसी की मदद नहीं कर सकेगा।
इससे यह भी पता चलता है कि अल्लाह का मार्गदर्शन (क़ुरआन और रसूल) हमारे लिए सबसे बड़ी नेमत है, क्योंकि इसके बिना हम सही और गलत में अंतर नहीं कर सकते।
और हमने हर आदमी के नामए अमल को उसके गले का हार बना दिया है (कि उसकी किस्मत उसके साथ रहे) और क़यामत के दिन हम उसे उसके सामने निकल के रख देगें कि वह उसको एक खुली हुई किताब अपने रुबरु पाएगा
जो शख़्श रुबरु होता है तो बस अपने फायदे के लिए यह पर आता है और जो शख़्श गुमराह होता है तो उसने भटक कर अपना आप बिगाड़ा और कोई शख़्श किसी दूसरे (के गुनाह) का बोझ अपने सर नहीं लेगा और हम तो जब तक रसूल को भेजकर तमाम हुज्जत न कर लें किसी पर अज़ाब नहीं किया करते
और हमको जब किसी बस्ती का वीरान करना मंज़ूर होता है तो हम वहाँ के खुशहालों को (इताअत का) हुक्म देते हैं तो वह लोग उसमें नाफरमानियाँ करने लगे तब वह बस्ती अज़ाब की मुस्तहक़ होगी उस वक्त हमने उसे अच्छी तरह तबाह व बरबाद कर दिया
और नूह के बाद से (उस वक्त तक) हमने कितनी उम्मतों को हलाक कर मारा और (ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार अपने बन्दों के गुनाहों को जानने और देखने के लिए काफी है
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