अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- لَا تُؤَاخِذْنِي: मुझे पकड़ मत करो, मुझे दोष मत दो।
- نَسِيتُ: मैं भूल गया।
- تُرْهِقْنِي: मुझ पर बोझ डालो, मुझे कठिनाई में डालो।
- عُسْرًا: कठिनाई, सख्ती।
तफसीर (व्याख्या):
जब हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) से पहली बार भूल हुई और उन्होंने ख़िज़र (अलैहिस्सलाम) की शर्त का उल्लंघन किया, तो उन्होंने तुरंत अपनी गलती का एहसास किया और बड़ी नम्रता और विनम्रता के साथ माफ़ी मांगी। उन्होंने कहा: "मुझे मत पकड़ो उस बात पर जो मैं भूल गया, और मेरे मामले में मुझ पर कठिनाई मत डालो।"
यह एक बहुत ही सुंदर और सिखाने वाला पहलू है। हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने अपनी भूल को स्वीकार किया और तुरंत माफ़ी मांगी। उन्होंने यह नहीं कहा कि "मैंने गलती नहीं की" या "यह मेरी गलती नहीं थी", बल्कि उन्होंने सीधे अपनी भूल स्वीकार की और नम्रता से पेश आए। यह हमारे लिए एक बहुत बड़ा सबक है कि इंसान को अपनी गलती मानने में संकोच नहीं करना चाहिए और दूसरों से नरमी और आसानी की उम्मीद करनी चाहिए।
इस आयत में हमें यह भी सिखाया गया है कि जब हमसे कोई गलती हो जाए, तो हमें तुरंत माफ़ी मांगनी चाहिए और अपने साथी या शिक्षक से नरमी और आसानी की अपील करनी चाहिए। यह अल्लाह के नबी की शान है कि वे अपनी गलती पर शर्मिंदा हुए और जल्दी से सुधार करने की कोशिश की।
यह आयत हमें यह भी बताती है कि इंसान भूलने वाला है, और भूलना इंसान की फितरत (प्राकृतिक स्वभाव) का हिस्सा है। अल्लाह हम पर रहम करने वाला है, और उसने हमें भूलने की क्षमता दी है, लेकिन साथ ही हमें सिखाया है कि जब हम भूल जाएं, तो हमें माफ़ी मांगनी चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए।
इस आयत से हमें यह भी सीख मिलती है कि इंसान को अपने शिक्षक, बड़ों और अच्छे लोगों के साथ नम्रता से पेश आना चाहिए और उनसे आसानी और नरमी की उम्मीद करनी चाहिए। हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने ख़िज़र (अलैहिस्सलाम) से जो अंदाज़ में बात की, वह हमारे लिए एक आदर्श है कि हमें अपने से बड़ों और ज्ञानियों के साथ कैसे पेश आना चाहिए।
यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह के नबी भी इंसान थे और उनसे भी भूल हो सकती थी, लेकिन उन्होंने अपनी भूल को छिपाया नहीं, बल्कि उसे स्वीकार किया और माफ़ी मांगी। यह हमारे लिए एक प्रेरणा है कि हमें भी अपनी गलतियों को छिपाना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें स्वीकार करके सुधार करना चाहिए।
अल्लाह हमें यह तौफ़ीक़ दे कि हम अपनी गलतियों को स्वीकार करें, दूसरों के साथ नरमी से पेश आएं और अपने जीवन में अच्छे अख़लाक़ (नैतिकता) को अपनाएं। आमीन।
📜 आयत 71-75 — अल-कहफ
अनुवाद — अल-कहफ 73
सूरा अल-कहफ आयत 73 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : कि आप मेरे साथ हरगिज़ सब्र न कर सकेगे-मूसा ने…सूरा आयत 73/110 — अल-कहफ الكهف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-कहफ सुनें, अल-कहफ अनुवाद, अल-कहफ mp3, अल-कहफ pdf. आयत 71–75. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए








