अल-बकरा · 261/286
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-बकरा
مَّثَلُ الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ فِي كُلِّ سُنبُلَةٍ مِّائَةُ حَبَّةٍ ۗ وَاللَّهُ يُضَاعِفُ لِمَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ ۝٢٦١
Masalul lazeena yunfiqoona amwaalahum fee sabeelil laahi kamasali habbatin ambatat sab`a sanaabila fee kulli sumbulatim mi`atu habbah; wallaahu yudaa`ifu limai yashaaa; wallaahu Waasi`un `Aleem
📖 हिंदी अर्थ
जो लोग अपने माल खुदा की राह में खर्च करते हैं उनके (खर्च) की मिसाल उस दाने की सी मिसाल है जिसकी सात बालियॉ निकलें (और) हर बाली में सौ (सौ) दाने हों और ख़ुदा जिसके लिये चाहता है दूना कर देता है और खुदा बड़ी गुन्जाइश वाला (हर चीज़ से) वाक़िफ़ है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَثَل: उदाहरण, दृष्टांत।
  • يُنفِقُونَ: खर्च करते हैं।
  • سَبِيلِ اللَّهِ: अल्लाह की राह में (जिहाद, दान, और नेकी के सभी कार्य)।
  • حَبَّةٍ: एक दाना (बीज)।
  • أَنبَتَت: उगाया, पैदा किया।
  • سَنَابِلَ: बालियाँ (गेहूँ की बालियाँ)।
  • سُنبُلَةٍ: बाली।
  • يُضَاعِفُ: कई गुना बढ़ाता है।
  • وَاسِعٌ: बड़ी गुंजाइश वाला, असीम दानशील।
  • عَلِيمٌ: सब कुछ जानने वाला।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन मोमिनों के दान और खर्च की मिसाल बयान करती है जो अपनी संपत्ति अल्लाह की राह में खर्च करते हैं। अल्लाह ने उनके इस खर्च की तुलना एक ऐसे दाने से की है जो अच्छी ज़मीन में बोया जाए और वह सात बालियाँ उगाए, और हर बाली में सौ दाने हों। यानी एक दाना बोने से सात सौ दाने मिलते हैं, और अल्लाह चाहे तो इससे भी कई गुना ज़्यादा दे सकता है।

यह मिसाल बताती है कि अल्लाह की राह में खर्च करना कोई घाटे का सौदा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी फसल है जो अल्लाह के यहाँ कई गुना बढ़कर मिलती है। अल्लाह तआला अपने बंदों के खर्च को देखता है और उनकी नीयत के अनुसार उन्हें अज्र (इनाम) देता है। जिसकी नीयत जितनी ख़ालिस और ईमान जितना मज़बूत होगा, उसे उतना ही ज़्यादा अज्र मिलेगा। अल्लाह की देन असीम है, वह जिसे चाहता है बिना हिसाब के देता है, और वह अपने बंदों के दिलों के हाल से पूरी तरह वाक़िफ है।


फ़ायदे (सबक):

  1. अल्लाह की राह में खर्च करना कोई नुक़सान नहीं, बल्कि यह एक ऐसा निवेश है जो अल्लाह के यहाँ कई गुना बढ़कर मिलता है। यह आयत मुसलमानों को दान और खर्च की तरफ़ राग़िब करती है।
  2. अल्लाह की राह में खर्च करने का अज्र सिर्फ़ मात्रा पर नहीं, बल्कि नीयत की ख़ुलूस (शुद्धता) पर निर्भर करता है। जितनी नीयत साफ़ होगी, अज्र उतना ही बढ़ेगा।
  3. अल्लाह की देन और उसका फज़ल असीम है। वह चाहे तो एक नेकी को सात सौ गुना या उससे भी ज़्यादा बढ़ा सकता है। इससे इंसान को अल्लाह की रहमत से कभी निराश नहीं होना चाहिए।
  4. यह आयत यह भी सिखाती है कि इंसान को अपनी संपत्ति को अल्लाह की राह में खर्च करने में कोई झिझक या डर नहीं होना चाहिए, क्योंकि अल्लाह ही असली मालिक है और वही रिज़्क़ देने वाला है।
  5. अल्लाह का इल्म हर चीज़ पर हावी है। वह जानता है कि कौन सच्चे दिल से खर्च करता है और कौन दिखावे के लिए। इसलिए हमें हमेशा ख़ालिस नीयत से नेकी करनी चाहिए।


📜 आयत 259-263 — सूरा अल-बकरा

259أَوْ كَالَّذِي مَرَّ عَلَىٰ قَرْيَةٍ وَهِيَ خَاوِيَةٌ عَلَىٰ عُرُوشِهَا قَالَ أَنَّىٰ يُحْيِي هَٰذِهِ اللَّهُ بَعْدَ مَوْتِهَا ۖ فَأَمَاتَهُ اللَّهُ مِائَةَ عَامٍ ثُمَّ بَعَثَهُ ۖ قَالَ كَمْ لَبِثْتَ ۖ قَالَ لَبِثْتُ يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍ ۖ قَالَ بَل لَّبِثْتَ مِائَةَ عَامٍ فَانظُرْ إِلَىٰ طَعَامِكَ وَشَرَابِكَ لَمْ يَتَسَنَّهْ ۖ وَانظُرْ إِلَىٰ حِمَارِكَ وَلِنَجْعَلَكَ آيَةً لِّلنَّاسِ ۖ وَانظُرْ إِلَى الْعِظَامِ كَيْفَ نُنشِزُهَا ثُمَّ نَكْسُوهَا لَحْمًا ۚ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُ قَالَ أَعْلَمُ أَنَّ اللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
(ऐ रसूल तुमने) मसलन उस (बन्दे के हाल पर भी नज़र की जो एक गॉव पर से होकर गुज़रा और वो ऐसा उजड़ा था कि अपनी छतों पर से ढह के गिर पड़ा था ये देखकर वह बन्दा (कहने लगा) अल्लाह अब इस गॉव को ऐसी वीरानी के बाद क्योंकर आबाद करेगा इस पर ख़ुदा ने उसको (मार डाला) सौ बरस तक मुर्दा रखा फिर उसको जिला उठाया (तब) पूछा तुम कितनी देर पड़े रहे अर्ज क़ी एक दिन पड़ा रहा एक दिन से भी कम फ़रमाया नहीं तुम (इसी हालत में) सौ बरस पड़े रहे अब ज़रा अपने खाने पीने (की चीज़ों) को देखो कि बुसा तक नहीं और ज़रा अपने गधे (सवारी) को तो देखो कि उसकी हड्डियाँ ढेर पड़ी हैं और सब इस वास्ते किया है ताकि लोगों के लिये तुम्हें क़ुदरत का नमूना बनाये और अच्छा अब (इस गधे की) हड्डियों की तरफ़ नज़र करो कि हम क्योंकर जोड़ जाड़ कर ढाँचा बनाते हैं फिर उनपर गोश्त चढ़ाते हैं पस जब ये उनपर ज़ाहिर हुआ तो बेसाख्ता बोल उठे कि (अब) मैं ये यक़ीने कामिल जानता हूं कि ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
260وَإِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ رَبِّ أَرِنِي كَيْفَ تُحْيِي الْمَوْتَىٰ ۖ قَالَ أَوَلَمْ تُؤْمِن ۖ قَالَ بَلَىٰ وَلَٰكِن لِّيَطْمَئِنَّ قَلْبِي ۖ قَالَ فَخُذْ أَرْبَعَةً مِّنَ الطَّيْرِ فَصُرْهُنَّ إِلَيْكَ ثُمَّ اجْعَلْ عَلَىٰ كُلِّ جَبَلٍ مِّنْهُنَّ جُزْءًا ثُمَّ ادْعُهُنَّ يَأْتِينَكَ سَعْيًا ۚ وَاعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٌ
और (ऐ रसूल) वह वाकेया भी याद करो जब इबराहीम ने (खुदा से) दरख्वास्त की कि ऐ मेरे परवरदिगार तू मुझे भी तो दिखा दे कि तू मुर्दों को क्योंकर ज़िन्दा करता है ख़ुदा ने फ़रमाया क्या तुम्हें (इसका) यक़ीन नहीं इबराहीम ने अर्ज़ की (क्यों नहीं) यक़ीन तो है मगर ऑंख से देखना इसलिए चाहता हूं कि मेरे दिल को पूरा इत्मिनान हो जाए फ़रमाया (अगर ये चाहते हो) तो चार परिन्दे लो और उनको अपने पास मॅगवा लो और टुकड़े टुकड़े कर डालो फिर हर पहाड़ पर उनका एक एक टुकड़ा रख दो उसके बाद उनको बुलाओ (फिर देखो तो क्यों कर वह सब के सब तुम्हारे पास दौड़े हुए आते हैं और समझ रखो कि ख़ुदा बेशक ग़ालिब और हिकमत वाला है
261مَّثَلُ الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ فِي كُلِّ سُنبُلَةٍ مِّائَةُ حَبَّةٍ ۗ وَاللَّهُ يُضَاعِفُ لِمَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ
जो लोग अपने माल खुदा की राह में खर्च करते हैं उनके (खर्च) की मिसाल उस दाने की सी मिसाल है जिसकी सात बालियॉ निकलें (और) हर बाली में सौ (सौ) दाने हों और ख़ुदा जिसके लिये चाहता है दूना कर देता है और खुदा बड़ी गुन्जाइश वाला (हर चीज़ से) वाक़िफ़ है
262الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ثُمَّ لَا يُتْبِعُونَ مَا أَنفَقُوا مَنًّا وَلَا أَذًى ۙ لَّهُمْ أَجْرُهُمْ عِندَ رَبِّهِمْ وَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
जो लोग अपने माल ख़ुदा की राह में ख़र्च करते हैं और फिर ख़र्च करने के बाद किसी तरह का एहसान नहीं जताते हैं और न जिनपर एहसान किया है उनको सताते हैं उनका अज्र (व सवाब) उनके परवरदिगार के पास है और न आख़ेरत में उनपर कोई ख़ौफ़ होगा और न वह ग़मगीन होंगे
263۞ قَوْلٌ مَّعْرُوفٌ وَمَغْفِرَةٌ خَيْرٌ مِّن صَدَقَةٍ يَتْبَعُهَا أَذًى ۗ وَاللَّهُ غَنِيٌّ حَلِيمٌ
(सायल को) नरमी से जवाब दे देना और (उसके इसरार पर न झिड़कना बल्कि) उससे दरगुज़र करना उस खैरात से कहीं बेहतर है जिसके बाद (सायल को) ईज़ा पहुंचे और ख़ुदा हर शै से बेपरवा (और) बुर्दबार है
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अनुवाद — अल-बकरा 261

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Monday, September 7, 2026

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