अल-अंबिया · 2/112
अनुवाद उच्चारण — अल-अंबिया
مَا يَأْتِيهِم مِّن ذِكْرٍ مِّن رَّبِّهِم مُّحْدَثٍ إِلَّا اسْتَمَعُوهُ وَهُمْ يَلْعَبُونَ ۝٢
Maa yaateehim min zikrim mir Rabbihim muhdasin illas tama`oohu wa hum yal`aboon
📖 हिंदी अर्थ
जब उनके परवरदिगार की तरफ से उनके पास कोई नया हुक्म आता है तो उसे सिर्फ कान लगाकर सुन लेते हैं और (फिर उसका) हँसी खेल उड़ाते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • ذِكْرٍ (ज़िक्र): यहाँ इससे अभिप्राय क़ुरआन है, जो अल्लाह की याद दिलाने वाला और नसीहत करने वाला है।
  • مُحْدَثٍ (मुहदस): नया उतारा गया, यानी जो अभी-अभी नाज़िल हुआ हो। यह क़ुरआन के क्रमिक अवतरण की ओर इशारा करता है।
  • يَلْعَبُونَ (यल'अबून): खेल-कूद में मशगूल होना, मज़ाक़ और मसख़रापन करना।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला उन लोगों की हालत बयान कर रहा है जो क़ुरआन सुनकर भी उससे ग़ाफ़िल रहते हैं। जब भी उनके रब की तरफ़ से कोई नई आयत या सूरह नाज़िल होती है, जो उन्हें सच्चाई की याद दिलाती है और उनकी भलाई के लिए नसीहत बनकर आती है, तो वे उसे ध्यान से सुनने के बजाय मज़ाक़ और खेल-खिलाड़ में लग जाते हैं। वे उसे गंभीरता से नहीं सुनते, न उस पर विचार करते हैं, बल्कि उसका उपहास करते हैं और अपनी अज्ञानता और अहंकार के कारण उससे मुँह मोड़ लेते हैं।

यह उनकी उस हालत की तस्वीर है जो हक़ के सामने उनकी सख़्त ग़फ़लत और बेपरवाही को दिखाती है। वे क़ुरआन को एक साधारण किताब समझते हैं, जबकि यह उनके रब की तरफ़ से आया हुआ मार्गदर्शन है, जो उन्हें अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाना चाहता है। लेकिन उनका दिल बंद है और वे अपनी मौज-मस्ती में ही खोए रहते हैं।

इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि क़ुरआन को सुनते समय हमें पूरी गंभीरता और ध्यान से सुनना चाहिए। यह अल्लाह का कलाम है, जो हमारे लिए रहनुमा है। जो लोग इसे मज़ाक़ समझते हैं या इससे ग़ाफ़िल रहते हैं, वे अपने नुक़सान का सामान खुद करते हैं। अल्लाह तआला ने इस क़ुरआन को हमारी हिदायत के लिए उतारा है, और इसमें हमारी दुनिया और आख़िरत की भलाई है। इसलिए हमें चाहिए कि जब भी क़ुरआन की आयतें पढ़ी जाएँ, हम उन्हें ध्यान से सुनें, उन पर अमल करें, और उन्हें अपनी ज़िंदगी का नुस्ख़ा बनाएँ। यही वह रास्ता है जो हमें अल्लाह की रहमत और जन्नत तक पहुँचाएगा।



📜 आयत 1-4 — अल-अंबिया

1اقْتَرَبَ لِلنَّاسِ حِسَابُهُمْ وَهُمْ فِي غَفْلَةٍ مُّعْرِضُونَ
लोगों के पास उनका हिसाब (उसका वक्त) अा पहुँचा और वह है कि गफ़लत में पड़े मुँह मोड़े ही जाते हैं
2مَا يَأْتِيهِم مِّن ذِكْرٍ مِّن رَّبِّهِم مُّحْدَثٍ إِلَّا اسْتَمَعُوهُ وَهُمْ يَلْعَبُونَ
जब उनके परवरदिगार की तरफ से उनके पास कोई नया हुक्म आता है तो उसे सिर्फ कान लगाकर सुन लेते हैं और (फिर उसका) हँसी खेल उड़ाते हैं
3لَاهِيَةً قُلُوبُهُمْ ۗ وَأَسَرُّوا النَّجْوَى الَّذِينَ ظَلَمُوا هَلْ هَٰذَا إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ ۖ أَفَتَأْتُونَ السِّحْرَ وَأَنتُمْ تُبْصِرُونَ
उनके दिल (आख़िरत के ख्याल से) बिल्कुल बेख़बर हैं और ये ज़ालिम चुपके-चुपके कानाफूसी किया करते हैं कि ये शख्स (मोहम्मद कुछ भी नहीं) बस तुम्हारे ही सा आदमी है तो क्या तुम दीन व दानिस्ता जादू में फँसते हो
4قَالَ رَبِّي يَعْلَمُ الْقَوْلَ فِي السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ ۖ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ
(तो उस पर) रसूल ने कहा कि मेरा परवरदिगार जितनी बातें आसमान और ज़मीन में होती हैं खूब जानता है (फिर क्यों कानाफूसी करते हो) और वह तो बड़ा सुनने वाला वाक़िफ़कार है
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अनुवाद — अल-अंबिया 2

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Tuesday, August 18, 2026

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