अल-हज · 52/78
अनुवाद उच्चारण — अल-हज
وَمَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ مِن رَّسُولٍ وَلَا نَبِيٍّ إِلَّا إِذَا تَمَنَّىٰ أَلْقَى الشَّيْطَانُ فِي أُمْنِيَّتِهِ فَيَنسَخُ اللَّهُ مَا يُلْقِي الشَّيْطَانُ ثُمَّ يُحْكِمُ اللَّهُ آيَاتِهِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ۝٥٢
Wa maaa arsalnaa min qablika mir Rasoolinnw wa laa Nabiyyin illaaa izaaa tamannaaa alqash Shaitaanu feee umniy yatihee fa yansakhul laahu maa yulqish Shaitaanu summa yuhkimul laahu aayaatih; wallaahu `Aleemun Hakeem
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) हमने तो तुमसे पहले जब कभी कोई रसूल और नबी भेजा तो ये ज़रूर हुआ कि जिस वक्त उसने (तबलीग़े एहकाम की) आरज़ू की तो शैतान ने उसकी आरज़ू में (लोंगों को बहका कर) ख़लल डाल दिया फिर जो वस वसा शैतान डालता है खुदा उसे बेट देता है फिर अपने एहकाम को मज़बूत करता है और खुदा तो बड़ा वाक़िफकार दाना है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • تَمَنَّىٰ – अर्थात पढ़ा, तिलावत की (कुरआन की आयतें पढ़ते समय)।
  • أُمْنِيَّتِهِ – उसकी तिलावत या पढ़ने में।
  • يَنسَخُ – मिटा देता है, समाप्त कर देता है।
  • يُحْكِمُ – मज़बूत और स्पष्ट कर देता है, स्थापित कर देता है।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! हमने आपसे पहले जितने भी रसूल और नबी भेजे, उन सबके साथ यही स्थिति रही कि जब वे अल्लाह की किताब की तिलावत करते, तो शैतान उनकी तिलावत में अपनी तरफ से कुछ वसवसे (संदेह और भ्रम) मिलाने की कोशिश करता, ताकि लोगों को सच्चाई से भटका सके। लेकिन अल्लाह तआला अपनी कुदरत से शैतान के उन वसवसों को तुरंत मिटा देता है और अपनी आयतों को स्पष्ट और मज़बूत कर देता है। यह चीज़ आपके साथ भी हुई, तो आप चिंतित न हों। यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि हर नबी के साथ यही परीक्षा हुई। अल्लाह सब कुछ जानने वाला है और अपनी हर बात में हिकमत (समझदारी) रखता है। वह जानता है कि कब क्या करना है और कैसे अपने दीन को स्थापित करना है।

यह आयत उस घटना के संदर्भ में उतरी जब कुछ लोगों ने झूठी अफवाह फैलाई थी कि नबी ﷺ ने अपनी तिलावत में शैतान के शब्द पढ़ दिए। अल्लाह ने इस आयत के माध्यम से स्पष्ट कर दिया कि यह सब शैतान की कोशिश थी, और अल्लाह ने उसे नाकाम कर दिया। नबी ﷺ की पवित्रता और सत्यनिष्ठा पर कोई आँच नहीं आई। अल्लाह ने अपनी आयतों को हमेशा सुरक्षित रखा और शैतान के सारे प्रयासों को विफल कर दिया। यह अल्लाह की सुन्नत (रीति) रही है कि वह अपने नबियों की हिफ़ाज़त करता है और उनके माध्यम से सच्चाई को स्थापित करता है।

दावत (आमंत्रण) की ओर से कुछ बातें:

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई की राह में रुकावटें आएंगी, शैतान हर नबी के साथ अपनी चालें चलता रहा, लेकिन अल्लाह की मदद हमेशा उनके साथ रही। जब हम सच्चाई पर चलते हैं, तो शैतान हमारे रास्ते में भी वसवसे डालता है, लेकिन अल्लाह पर भरोसा रखने वालों को वह कभी नुकसान नहीं पहुंचा सकता। अल्लाह ने अपने दीन को हमेशा सुरक्षित रखा है और रखेगा। हमें चाहिए कि हम कुरआन को पढ़ें, समझें और उस पर अमल करें, क्योंकि यही अल्लाह की मज़बूत रस्सी है। शैतान की कोशिशें चाहे कितनी भी हों, अल्लाह का कलाम (कुरआन) हमेशा सच्चा और स्पष्ट है। हमें अपने नबी ﷺ की सुन्नत पर चलते हुए अल्लाह से मदद मांगनी चाहिए, क्योंकि अल्लाह ही सबसे बड़ा मददगार है और वही अपने बंदों को सच्चाई की राह दिखाता है।



📜 आयत 50-54 — अल-हज

50فَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَرِيمٌ
पस जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया और अच्छे-अच्छे काम किए (आख़िरत में) उनके लिए बख्शिश है और बेहिश्त की बहुत उम्दा रोज़ी
51وَالَّذِينَ سَعَوْا فِي آيَاتِنَا مُعَاجِزِينَ أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ
और जिन लोगों ने हमारी आयतों (के झुठलाने में हमारे) आजिज़ करने के वास्ते कोशिश की यही लोग तो जहन्नुमी हैं
52وَمَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ مِن رَّسُولٍ وَلَا نَبِيٍّ إِلَّا إِذَا تَمَنَّىٰ أَلْقَى الشَّيْطَانُ فِي أُمْنِيَّتِهِ فَيَنسَخُ اللَّهُ مَا يُلْقِي الشَّيْطَانُ ثُمَّ يُحْكِمُ اللَّهُ آيَاتِهِ ۗ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
और (ऐ रसूल) हमने तो तुमसे पहले जब कभी कोई रसूल और नबी भेजा तो ये ज़रूर हुआ कि जिस वक्त उसने (तबलीग़े एहकाम की) आरज़ू की तो शैतान ने उसकी आरज़ू में (लोंगों को बहका कर) ख़लल डाल दिया फिर जो वस वसा शैतान डालता है खुदा उसे बेट देता है फिर अपने एहकाम को मज़बूत करता है और खुदा तो बड़ा वाक़िफकार दाना है
53لِّيَجْعَلَ مَا يُلْقِي الشَّيْطَانُ فِتْنَةً لِّلَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ وَالْقَاسِيَةِ قُلُوبُهُمْ ۗ وَإِنَّ الظَّالِمِينَ لَفِي شِقَاقٍ بَعِيدٍ
और शैतान जो (वसवसा) डालता (भी) है तो इसलिए ताकि खुदा उसे उन लोगों के आज़माइश (का ज़रिया) क़रार दे जिनके दिलों में (कुफ्र का) मर्ज़ है और जिनके दिल सख्त हैं और बेशक (ये) ज़ालिम मुशरेकीन पल्ले दरजे की मुख़ालेफ़त में पड़े हैं
54وَلِيَعْلَمَ الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ أَنَّهُ الْحَقُّ مِن رَّبِّكَ فَيُؤْمِنُوا بِهِ فَتُخْبِتَ لَهُ قُلُوبُهُمْ ۗ وَإِنَّ اللَّهَ لَهَادِ الَّذِينَ آمَنُوا إِلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ
और (इसलिए भी) ताकि जिन लोगों को (कुतूबे समावी का) इल्म अता हुआ है वह जान लें कि ये (वही) बेशक तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से ठीक ठीक (नाज़िल) हुईहै फिर (ये ख्याल करके) इस पर वह लोग ईमान लाए फिर उनके दिल खुदा के सामने आजिज़ी करें और इसमें तो शक ही नहीं कि जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया उनकी खुदा सीधी राह तक पहुँचा देता है
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अनुवाद — अल-हज 52

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Tuesday, August 18, 2026

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