अल-फुरकान · 44/77
अनुवाद उच्चारण — अल-फुरकान
أَمْ تَحْسَبُ أَنَّ أَكْثَرَهُمْ يَسْمَعُونَ أَوْ يَعْقِلُونَ ۚ إِنْ هُمْ إِلَّا كَالْأَنْعَامِ ۖ بَلْ هُمْ أَضَلُّ سَبِيلًا ۝٤٤
Am tahsabu annna aksarahum yasma`oona aw ya``qiloon; in hum illaa kal an`aami bal hum adallu sabeelan
📖 हिंदी अर्थ
क्या ये तुम्हारा ख्याल है कि इन (कुफ्फ़ारों) में अक्सर (बात) सुनते या समझते है (नहीं) ये तो बस बिल्कुल मिसल जानवरों के हैं बल्कि उन से भी ज्यादा राह (रास्त) से भटके हुए

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَمْ تَحْسَبُ: क्या तुम समझते हो
  • يَسْمَعُونَ: सुनते हैं (ध्यान और समझ के साथ)
  • يَعْعْقِلُونَ: समझते-बूझते हैं, अक्ल से काम लेते हैं
  • كَالْأَنْعَامِ: चौपायों (जानवरों) की तरह
  • أَضَلُّ سَبِيلًا: रास्ते से और ज्यादा भटके हुए

तफसीर (व्याख्या):

ऐ नबी! क्या तुम यह ख़याल करते हो कि इनमें से ज़्यादातर लोग सच्चाई की बातें सुनकर उन पर ग़ौर करते हैं, या उन आयतों और निशानियों को समझते हैं जो उनके सामने पेश की जा रही हैं? हरगिज़ नहीं! ये लोग सुनते तो हैं, लेकिन सुनने का मक़सद समझना और उस पर अमल करना होता है—ये उससे महरूम हैं। ये आँखों से देखते हैं, कानों से सुनते हैं, मगर दिल की आँखें बंद हैं, दिल के कान बहरे हैं।

ये लोग बिल्कुल उन चौपायों की तरह हैं जो चरते हैं, पीते हैं, सोते हैं, लेकिन उन्हें न कोई फ़ायदा-नुक़सान समझ आता है, न ही वे अपने अंजाम के बारे में सोचते हैं। हक़ीक़त में ये जानवरों से भी बदतर हैं, क्योंकि जानवर अपनी फ़ितरत (प्राकृतिक प्रवृत्ति) के हिसाब से अपने चरने की जगह, पानी के सोतों और अपने फ़ायदे की चीज़ों को पहचान लेते हैं, और ख़तरे से बचते हैं। मगर ये लोग अपनी अक्ल और समझ होते हुए भी सच्चाई से मुँह मोड़ते हैं, हिदायत की रौशनी से भागते हैं, और गुमराही के अंधेरों में भटकते रहते हैं। इसलिए ये जानवरों से भी ज़्यादा गुमराह हैं, क्योंकि जानवर तो अपनी फ़ितरत पर चलते हैं, लेकिन ये इंसान अपनी अक्ल का इस्तेमाल न करके शैतान के पीछे चलते हैं।

दावत और नसीहत:

प्यारे भाइयों! यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपनी अक्ल और समझ का इस्तेमाल किस तरह कर रहे हैं। अल्लाह ने हमें सबसे बेहतरीन अक्ल और समझ दी है, ताकि हम उसकी आयतों पर ग़ौर करें, उसके दीन को समझें और उसके हुक्मों पर अमल करें। जो लोग क़ुरआन की आयतों को सुनकर भी उन पर अमल नहीं करते, वे जानवरों की मिसाल में आ जाते हैं—बल्कि उनसे भी बदतर। आओ, हम अपनी ज़िंदगी में क़ुरआन की तालीमात को समझने और उन पर अमल करने की कोशिश करें, ताकि हम उन लोगों में से न हों जिनके बारे में यह आयत फ़रमाई गई है। अल्लाह हमें सच्ची समझ और अमल की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 42-46 — अल-फुरकान

42إِن كَادَ لَيُضِلُّنَا عَنْ آلِهَتِنَا لَوْلَا أَن صَبَرْنَا عَلَيْهَا ۚ وَسَوْفَ يَعْلَمُونَ حِينَ يَرَوْنَ الْعَذَابَ مَنْ أَضَلُّ سَبِيلًا
अगर बुतों की परसतिश पर साबित क़दम न रहते तो इस शख्स ने हमको हमारे माबूदों से बहका दिया था और बहुत जल्द (क़यामत में) जब ये लोग अज़ाब को देखेंगें तो उन्हें मालूम हो जाएगा कि राहे रास्त से कौन ज्यादा भटका हुआ था
43أَرَأَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ إِلَٰهَهُ هَوَاهُ أَفَأَنتَ تَكُونُ عَلَيْهِ وَكِيلًا
क्या तुमने उस शख्स को भी देखा है जिसने अपनी नफ़सियानी ख्वाहिश को अपना माबूद बना रखा है तो क्या तुम उसके ज़िम्मेदार हो सकते हो (कि वह गुमराह न हों)
44أَمْ تَحْسَبُ أَنَّ أَكْثَرَهُمْ يَسْمَعُونَ أَوْ يَعْقِلُونَ ۚ إِنْ هُمْ إِلَّا كَالْأَنْعَامِ ۖ بَلْ هُمْ أَضَلُّ سَبِيلًا
क्या ये तुम्हारा ख्याल है कि इन (कुफ्फ़ारों) में अक्सर (बात) सुनते या समझते है (नहीं) ये तो बस बिल्कुल मिसल जानवरों के हैं बल्कि उन से भी ज्यादा राह (रास्त) से भटके हुए
45أَلَمْ تَرَ إِلَىٰ رَبِّكَ كَيْفَ مَدَّ الظِّلَّ وَلَوْ شَاءَ لَجَعَلَهُ سَاكِنًا ثُمَّ جَعَلْنَا الشَّمْسَ عَلَيْهِ دَلِيلًا
(ऐ रसूल) क्या तुमने अपने परवरदिगार की कुदरत की तरफ नज़र नहीं की कि उसने क्योंकर साये को फैला दिया अगर वह चहता तो उसे (एक ही जगह) ठहरा हुआ कर देता फिर हमने आफताब को (उसकी शिनाख्त के वास्ते) उसका रहनुमा बना दिया
46ثُمَّ قَبَضْنَاهُ إِلَيْنَا قَبْضًا يَسِيرًا
फिर हमने उसको थोड़ा थोड़ा करके अपनी तरफ खीच लिया
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अनुवाद — अल-फुरकान 44

सूरा अल-फुरकान आयत 44 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : क्या ये तुम्हारा ख्याल है कि इन (कुफ्फ़ारों) में अक्सर…

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Tuesday, August 18, 2026

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