अल-फुरकान · 43/77
अनुवाद उच्चारण — अल-फुरकान
أَرَأَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ إِلَٰهَهُ هَوَاهُ أَفَأَنتَ تَكُونُ عَلَيْهِ وَكِيلًا ۝٤٣
Ara`aita manit takhaza ilaahahoo hawaahu afa anta takoonu `alaihi wakeelaa
📖 हिंदी अर्थ
क्या तुमने उस शख्स को भी देखा है जिसने अपनी नफ़सियानी ख्वाहिश को अपना माबूद बना रखा है तो क्या तुम उसके ज़िम्मेदार हो सकते हो (कि वह गुमराह न हों)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • अर-अयता (أَرَأَيْتَ): क्या तुमने देखा? अर्थात, ध्यान से विचार करो।
  • इलाहा (إِلَٰهَهُ): अपना पूज्य, अपना माबूद।
  • हवाहु (هَوَاهُ): अपनी इच्छा, अपनी मनमर्ज़ी, अपनी कामना।
  • वकीलन (وَكِيلًا): संरक्षक, ज़िम्मेदार, उसे रोकने वाला, उसके कार्यों का उत्तरदायी।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! क्या तुमने उस व्यक्ति को देखा जिसने अपनी इच्छा और मनमर्ज़ी को ही अपना पूज्य बना लिया है? यानी वह जो कुछ भी करता है, सिर्फ़ अपनी चाहत के अनुसार करता है, और अपनी इच्छा को ही सर्वोच्च मानता है। वह अल्लाह के हुक्म की परवाह नहीं करता, बल्कि जो उसका दिल कहे, वही उसके लिए क़ानून बन जाता है।

इतिहास में ऐसे लोग थे जो पत्थर की मूर्ति की पूजा करते थे, और जब उन्हें उससे बेहतर पत्थर मिल जाता था, तो पुराने को फेंक देते थे और नए की पूजा करने लगते थे। यानी उनकी इच्छा ही उनका माबूद थी।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है: "क्या तुम उसके संरक्षक और ज़िम्मेदार हो?" यानी ऐ नबी! तुम्हारा काम केवल संदेश पहुँचाना है। तुम उसे मजबूर नहीं कर सकते कि वह ईमान ले आए। तुम्हारी ज़िम्मेदारी उसके कर्मों की नहीं है। हिदायत देना अल्लाह के हाथ में है।

यह आयत हमें बताती है कि सबसे बड़ी ग़लती यह है कि इंसान अपनी इच्छा को अल्लाह की इच्छा से ऊपर रखे। जब इंसान अपनी हवा-ओ-हवस (इच्छाओं) का ग़ुलाम बन जाता है, तो वह सत्य से भटक जाता है।

दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें आईना दिखाती है। क्या हम में से कोई ऐसा है जो अपनी इच्छा को ही अपना माबूद बना ले? जब हमारी नफ़्स की ख्वाहिश अल्लाह के हुक्म से टकराती है, तो हम किसे प्राथमिकता देते हैं?

इस आयत से हमें सीखना चाहिए कि हम अपनी इच्छाओं को अल्लाह की रज़ा के अधीन करें। जब हम अपनी हवा-ओ-हवस को छोड़कर अल्लाह के हुक्म के सामने सिर झुकाते हैं, तो हमें सच्ची आज़ादी मिलती है। याद रखिए, जो अपनी इच्छा का ग़ुलाम होता है, वह कभी संतुष्ट नहीं होता, लेकिन जो अल्लाह का बंदा बन जाता है, उसे असली सुकून और खुशी मिलती है।

अल्लाह हमें अपनी इच्छा को उसकी रज़ा के ताबे करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 41-45 — अल-फुरकान

41وَإِذَا رَأَوْكَ إِن يَتَّخِذُونَكَ إِلَّا هُزُوًا أَهَٰذَا الَّذِي بَعَثَ اللَّهُ رَسُولًا
और (ऐ रसूल) ये लोग तुम्हें जब देखते हैं तो तुम से मसख़रा पन ही करने लगते हैं कि क्या यही वह (हज़रत) हैं जिन्हें अल्लाह ने रसूल बनाकर भेजा है (माज़ अल्लाह)
42إِن كَادَ لَيُضِلُّنَا عَنْ آلِهَتِنَا لَوْلَا أَن صَبَرْنَا عَلَيْهَا ۚ وَسَوْفَ يَعْلَمُونَ حِينَ يَرَوْنَ الْعَذَابَ مَنْ أَضَلُّ سَبِيلًا
अगर बुतों की परसतिश पर साबित क़दम न रहते तो इस शख्स ने हमको हमारे माबूदों से बहका दिया था और बहुत जल्द (क़यामत में) जब ये लोग अज़ाब को देखेंगें तो उन्हें मालूम हो जाएगा कि राहे रास्त से कौन ज्यादा भटका हुआ था
43أَرَأَيْتَ مَنِ اتَّخَذَ إِلَٰهَهُ هَوَاهُ أَفَأَنتَ تَكُونُ عَلَيْهِ وَكِيلًا
क्या तुमने उस शख्स को भी देखा है जिसने अपनी नफ़सियानी ख्वाहिश को अपना माबूद बना रखा है तो क्या तुम उसके ज़िम्मेदार हो सकते हो (कि वह गुमराह न हों)
44أَمْ تَحْسَبُ أَنَّ أَكْثَرَهُمْ يَسْمَعُونَ أَوْ يَعْقِلُونَ ۚ إِنْ هُمْ إِلَّا كَالْأَنْعَامِ ۖ بَلْ هُمْ أَضَلُّ سَبِيلًا
क्या ये तुम्हारा ख्याल है कि इन (कुफ्फ़ारों) में अक्सर (बात) सुनते या समझते है (नहीं) ये तो बस बिल्कुल मिसल जानवरों के हैं बल्कि उन से भी ज्यादा राह (रास्त) से भटके हुए
45أَلَمْ تَرَ إِلَىٰ رَبِّكَ كَيْفَ مَدَّ الظِّلَّ وَلَوْ شَاءَ لَجَعَلَهُ سَاكِنًا ثُمَّ جَعَلْنَا الشَّمْسَ عَلَيْهِ دَلِيلًا
(ऐ रसूल) क्या तुमने अपने परवरदिगार की कुदरत की तरफ नज़र नहीं की कि उसने क्योंकर साये को फैला दिया अगर वह चहता तो उसे (एक ही जगह) ठहरा हुआ कर देता फिर हमने आफताब को (उसकी शिनाख्त के वास्ते) उसका रहनुमा बना दिया
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अनुवाद — अल-फुरकान 43

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Tuesday, August 18, 2026

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