अल-क़सस · 49/88
अनुवाद उच्चारण — अल-क़सस
قُلْ فَأْتُوا بِكِتَابٍ مِّنْ عِندِ اللَّهِ هُوَ أَهْدَىٰ مِنْهُمَا أَتَّبِعْهُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ ۝٤٩
Qul faatoo bi Kitaabim min `indil laahi huwa ahdaa minhu maaa attabi`hu in kuntum saadiqeen
📖 हिंदी अर्थ
और ये भी कह चुके कि हम एब के मुन्किर हैं (ऐ रसूल) तुम (इन लोगों से) कह दो कि अगर सच्चे हो तो ख़ुदा की तरफ से एक ऐसी किताब जो इन दोनों से हिदायत में बेहतर हो ले आओ
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَهْدَىٰ: अधिक मार्गदर्शन करने वाला, अधिक सही रास्ता दिखाने वाला।
  • مِنْهُمَا: इन दोनों (तौरात और क़ुरआन) से।
  • صَادِقِينَ: सच्चे होने के दावे में।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप इन मुनकिरों से कहिए जो तौरात और क़ुरआन दोनों को जादू कहकर खारिज कर रहे हैं: "अगर तुम अपने इस दावे में सच्चे हो कि ये दोनों किताबें अल्लाह की तरफ से नहीं हैं, और तुम्हारे पास कोई बेहतर रास्ता है, तो लाओ अल्लाह की तरफ से कोई ऐसी किताब जो इन दोनों (तौरात और क़ुरआन) से ज़्यादा सही रास्ता दिखाने वाली हो। मैं उसी की पैरवी करूँगा, बशर्ते कि तुम सच्चे हो।"

यह एक खुला चैलेंज है जो उनके झूठ को बेनकाब करता है। अगर वे सच्चे होते तो कोई ऐसी किताब पेश करते जो इंसानियत को बेहतर रास्ता दिखाती, लेकिन यह नामुमकिन है, क्योंकि क़ुरआन और तौरात में वह हिदायत है जो इंसान की दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई की ज़मानत देती है।

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई का दावा करने वालों के सामने सबूत पेश करने का तरीक़ा यही है — उन्हें चुनौती दो कि अगर तुम सच्चे हो तो अपना दावा साबित करो। और जब कोई सबूत नहीं ला सके, तो यही सबसे बड़ा प्रमाण है कि क़ुरआन अल्लाह की किताब है।

यह चुनौती आज भी क़ायम है — पूरी दुनिया की ताक़तें मिलकर भी क़ुरआन जैसी एक सूरा नहीं ला सकतीं। यही इस किताब की सच्चाई की सबसे बड़ी गवाही है। जो इसे मान ले, वह सीधे रास्ते पर है, और जो इसे ठुकराए, वह खुद अपने नुक़सान का सामान करता है। अल्लाह हमें क़ुरआन को समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 47-51 — अल-क़सस

47وَلَوْلَا أَن تُصِيبَهُم مُّصِيبَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ فَيَقُولُوا رَبَّنَا لَوْلَا أَرْسَلْتَ إِلَيْنَا رَسُولًا فَنَتَّبِعَ آيَاتِكَ وَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ
और अगर ये नही होता कि जब उन पर उनकी अगली करतूतों की बदौलत कोई मुसीबत पड़ती तो बेसाख्ता कह बैठते कि परवरदिगार तूने हमारे पास कोई पैग़म्बर क्यों न भेजा कि हम तेरे हुक्मों पर चलते और ईमानदारों में होते (तो हम तुमको न भेजते )
48فَلَمَّا جَاءَهُمُ الْحَقُّ مِنْ عِندِنَا قَالُوا لَوْلَا أُوتِيَ مِثْلَ مَا أُوتِيَ مُوسَىٰ ۚ أَوَلَمْ يَكْفُرُوا بِمَا أُوتِيَ مُوسَىٰ مِن قَبْلُ ۖ قَالُوا سِحْرَانِ تَظَاهَرَا وَقَالُوا إِنَّا بِكُلٍّ كَافِرُونَ
मगर फिर जब हमारी बारगाह से (दीन) हक़ उनके पास पहुँचा तो कहने लगे जैसे (मौजिज़े) मूसा को अता हुए थे वैसे ही इस रसूल (मोहम्मद) को क्यों नही दिए गए क्या जो मौजिज़े इससे पहले मूसा को अता हुए थे उनसे इन लोगों ने इन्कार न किया था कुफ्फ़ार तो ये भी कह गुज़रे कि ये दोनों के दोनों (तौरैत व कुरान) जादू हैं कि बाहम एक दूसरे के मददगार हो गए हैं
49قُلْ فَأْتُوا بِكِتَابٍ مِّنْ عِندِ اللَّهِ هُوَ أَهْدَىٰ مِنْهُمَا أَتَّبِعْهُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
और ये भी कह चुके कि हम एब के मुन्किर हैं (ऐ रसूल) तुम (इन लोगों से) कह दो कि अगर सच्चे हो तो ख़ुदा की तरफ से एक ऐसी किताब जो इन दोनों से हिदायत में बेहतर हो ले आओ
50فَإِن لَّمْ يَسْتَجِيبُوا لَكَ فَاعْلَمْ أَنَّمَا يَتَّبِعُونَ أَهْوَاءَهُمْ ۚ وَمَنْ أَضَلُّ مِمَّنِ اتَّبَعَ هَوَاهُ بِغَيْرِ هُدًى مِّنَ اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ
कि मै भी उस पर चलँ फिर अगर ये लोग (इस पर भी) न मानें तो समझ लो कि ये लोग बस अपनी हवा व हवस की पैरवी करते है और जो शख्स ख़ुदा की हिदायत को छोड़ कर अपनी हवा व हवस की पैरवी करते है उससे ज्यादा गुमराह कौन होगा बेशक ख़ुदा सरकश लोगों को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचाया करता
51۞ وَلَقَدْ وَصَّلْنَا لَهُمُ الْقَوْلَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
और हम यक़ीनन लगातार (अपने एहकाम भेजकर) उनकी नसीहत करते रहे ताकि वह लोग नसीहत हासिल करें
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अनुवाद — अल-क़सस 49

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Tuesday, August 18, 2026

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