Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- خَلَتْ: गुज़र चुकी हैं, बीत चुकी हैं।
- انقَلَبْتُمْ: तुम पलट गए, लौट गए।
- عَلَىٰ أَعْقَابِكُمْ: अपनी एड़ियों के बल (यानी पीछे की ओर लौटना, इस्लाम से मुर्तद हो जाना)।
- يَنقَلِبْ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ: जो अपनी एड़ियों के बल पलटे, यानी दीन से फिर जाए।
- الشَّاكِرِينَ: शुक्रगुज़ारों को, अल्लाह की नेमतों का एहसान मानने वालों को।
तफ़सीर:
यह आयत उस ऐतिहासिक घटना के संदर्भ में उतरी जब उहुद के मैदान में यह अफवाह फैल गई कि नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) शहीद हो गए हैं। इस खबर ने कुछ कमज़ोर ईमान वाले मुसलमानों को विचलित कर दिया। अल्लाह तआला ने इस आयत में स्पष्ट कर दिया कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) केवल एक रसूल हैं, अल्लाह के भेजे हुए संदेशवाहक, और उनसे पहले भी कई रसूल गुज़र चुके हैं। जिस तरह वे सब मरे या शहीद हुए, यह भी एक इंसान हैं और उन्हें भी मृत्यु आनी है।
फिर अल्लाह ने सवालिया अंदाज़ में फरमाया: "क्या अगर वह मर जाएं या शहीद कर दिए जाएं, तो तुम अपने दीन से पलट जाओगे?" यह एक कड़ी फटकार है उन लोगों को जिनका ईमान नबी की ज़ात से जुड़ा था, अल्लाह की रिसालेत से नहीं। सच्चा ईमान तो अल्लाह और उसके दीन से होता है, किसी इंसान की ज़िंदगी से नहीं।
आगे फरमाया गया कि जो कोई अपनी एड़ियों के बल पलटेगा (यानी मुर्तद हो जाएगा), तो वह अल्लाह का कुछ भी नुक़सान नहीं कर सकता। अल्लाह किसी के ईमान या कुफ्र से बेनियाज़ है। उसकी सत्ता और कुदरत पर कोई असर नहीं पड़ता। मुर्तद होने वाला सिर्फ अपना ही नुक़सान करता है — दुनिया में भी और आख़िरत में भी।
आयत के अंत में अल्लाह ने उन लोगों को खुशखबरी दी जो शुक्र करने वाले हैं — यानी जो अल्लाह की नेमत (इस्लाम) पर क़ायम रहते हैं, उसे पहचानते हैं और उसकी क़द्र करते हैं। अल्लाह उन्हें ज़रूर अच्छा बदला देगा, क्योंकि वह शुक्रगुज़ारों को कभी निराश नहीं करता।
फ़ायदे (सबक़):
- नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मुहब्बत ईमान का हिस्सा है, लेकिन असली ईमान अल्लाह और उसके दीन से वाबस्ता होना चाहिए, न कि किसी इंसान की ज़िंदगी से। दीन क़ायम रहता है, चाहे लोग बदलते रहें।
- मुसलमानों को चाहिए कि वे मुश्किलों और आज़माइशों में डटे रहें, किसी भी हालत में दीन से मुंह न मोड़ें। अल्लाह की मदद सब्र करने वालों के साथ है।
- अल्लाह को किसी के ईमान की ज़रूरत नहीं, और न ही किसी का कुफ्र उसे नुक़सान पहुंचा सकता है। यह बात मुसलमान को अल्लाह पर भरोसा और आत्म-सम्मान सिखाती है कि वह अपने दीन पर अडिग रहे।
- शुक्र की असली हक़ीक़त यह है कि इंसान अल्लाह की नेमतों को पहचाने, उनका सही इस्तेमाल करे और उन पर क़ायम रहे। अल्लाह ऐसे लोगों को बेहतरीन इनाम देगा — यह एक बड़ी खुशखबरी है जो दिलों को सुकून देती है।
📜 आयत 142-146 — सूरा आल-इमरान
अनुवाद — आल-इमरान 144
सूरा आल-इमरान आयत 144 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (फिर लड़ाई से जी क्यों चुराते हो) और मोहम्मद तो…सूरा आयत 144/200 — सूरा आल-इमरान آل عمران (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा आल-इमरान सुनें, सूरा आल-इमरान अनुवाद, सूरा आल-इमरान mp3, सूरा आल-इमरान pdf. आयत 142–146. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा आल-इमरान
पवित्र क़ुरआन
Friday, October 2, 2026
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