आल-इमरान · 144/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِ الرُّسُلُ ۚ أَفَإِن مَّاتَ أَوْ قُتِلَ انقَلَبْتُمْ عَلَىٰ أَعْقَابِكُمْ ۚ وَمَن يَنقَلِبْ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ فَلَن يَضُرَّ اللَّهَ شَيْئًا ۗ وَسَيَجْزِي اللَّهُ الشَّاكِرِينَ ۝١٤٤
Wa maa Muhammadun illaa Rasoolun qad khalat min qablihir Rusul; afa`im maata aw qutilan qalabtum `alaaa a`qaabikum; wa mai yanqalib `alaa aqibihi falai yadurral laaha shai`aa; wa sayajzil laahush shaakireen
📖 हिंदी अर्थ
(फिर लड़ाई से जी क्यों चुराते हो) और मोहम्मद तो सिर्फ रसूल हैं (ख़ुदा नहीं) इनसे पहले बहुतेरे पैग़म्बर गुज़र चुके हैं फिर क्या अगर मोहम्मद अपनी मौत से मर जॉए या मार डाले जाएं तो तुम उलटे पॉव (अपने कुफ़्र की तरफ़) पलट जाओगे और जो उलटे पॉव फिरेगा (भी) तो (समझ लो) हरगिज़ ख़ुदा का कुछ भी नहीं बिगड़ेगा और अनक़रीब ख़ुदा का शुक्र करने वालों को अच्छा बदला देगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • خَلَتْ: गुज़र चुकी हैं, बीत चुकी हैं।
  • انقَلَبْتُمْ: तुम पलट गए, लौट गए।
  • عَلَىٰ أَعْقَابِكُمْ: अपनी एड़ियों के बल (यानी पीछे की ओर लौटना, इस्लाम से मुर्तद हो जाना)।
  • يَنقَلِبْ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ: जो अपनी एड़ियों के बल पलटे, यानी दीन से फिर जाए।
  • الشَّاكِرِينَ: शुक्रगुज़ारों को, अल्लाह की नेमतों का एहसान मानने वालों को।

तफ़सीर:

यह आयत उस ऐतिहासिक घटना के संदर्भ में उतरी जब उहुद के मैदान में यह अफवाह फैल गई कि नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) शहीद हो गए हैं। इस खबर ने कुछ कमज़ोर ईमान वाले मुसलमानों को विचलित कर दिया। अल्लाह तआला ने इस आयत में स्पष्ट कर दिया कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) केवल एक रसूल हैं, अल्लाह के भेजे हुए संदेशवाहक, और उनसे पहले भी कई रसूल गुज़र चुके हैं। जिस तरह वे सब मरे या शहीद हुए, यह भी एक इंसान हैं और उन्हें भी मृत्यु आनी है।

फिर अल्लाह ने सवालिया अंदाज़ में फरमाया: "क्या अगर वह मर जाएं या शहीद कर दिए जाएं, तो तुम अपने दीन से पलट जाओगे?" यह एक कड़ी फटकार है उन लोगों को जिनका ईमान नबी की ज़ात से जुड़ा था, अल्लाह की रिसालेत से नहीं। सच्चा ईमान तो अल्लाह और उसके दीन से होता है, किसी इंसान की ज़िंदगी से नहीं।

आगे फरमाया गया कि जो कोई अपनी एड़ियों के बल पलटेगा (यानी मुर्तद हो जाएगा), तो वह अल्लाह का कुछ भी नुक़सान नहीं कर सकता। अल्लाह किसी के ईमान या कुफ्र से बेनियाज़ है। उसकी सत्ता और कुदरत पर कोई असर नहीं पड़ता। मुर्तद होने वाला सिर्फ अपना ही नुक़सान करता है — दुनिया में भी और आख़िरत में भी।

आयत के अंत में अल्लाह ने उन लोगों को खुशखबरी दी जो शुक्र करने वाले हैं — यानी जो अल्लाह की नेमत (इस्लाम) पर क़ायम रहते हैं, उसे पहचानते हैं और उसकी क़द्र करते हैं। अल्लाह उन्हें ज़रूर अच्छा बदला देगा, क्योंकि वह शुक्रगुज़ारों को कभी निराश नहीं करता।

फ़ायदे (सबक़):

  1. नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मुहब्बत ईमान का हिस्सा है, लेकिन असली ईमान अल्लाह और उसके दीन से वाबस्ता होना चाहिए, न कि किसी इंसान की ज़िंदगी से। दीन क़ायम रहता है, चाहे लोग बदलते रहें।
  2. मुसलमानों को चाहिए कि वे मुश्किलों और आज़माइशों में डटे रहें, किसी भी हालत में दीन से मुंह न मोड़ें। अल्लाह की मदद सब्र करने वालों के साथ है।
  3. अल्लाह को किसी के ईमान की ज़रूरत नहीं, और न ही किसी का कुफ्र उसे नुक़सान पहुंचा सकता है। यह बात मुसलमान को अल्लाह पर भरोसा और आत्म-सम्मान सिखाती है कि वह अपने दीन पर अडिग रहे।
  4. शुक्र की असली हक़ीक़त यह है कि इंसान अल्लाह की नेमतों को पहचाने, उनका सही इस्तेमाल करे और उन पर क़ायम रहे। अल्लाह ऐसे लोगों को बेहतरीन इनाम देगा — यह एक बड़ी खुशखबरी है जो दिलों को सुकून देती है।


📜 आयत 142-146 — आल-इमरान

142أَمْ حَسِبْتُمْ أَن تَدْخُلُوا الْجَنَّةَ وَلَمَّا يَعْلَمِ اللَّهُ الَّذِينَ جَاهَدُوا مِنكُمْ وَيَعْلَمَ الصَّابِرِينَ
(मुसलमानों) क्या तुम ये समझते हो कि सब के सब बहिश्त में चले ही जाओगे और क्या ख़ुदा ने अभी तक तुममें से उन लोगों को भी नहीं पहचाना जिन्होंने जेहाद किया और न साबित क़दम रहने वालों को ही पहचाना
143وَلَقَدْ كُنتُمْ تَمَنَّوْنَ الْمَوْتَ مِن قَبْلِ أَن تَلْقَوْهُ فَقَدْ رَأَيْتُمُوهُ وَأَنتُمْ تَنظُرُونَ
तुम तो मौत के आने से पहले (लड़ाई में) मरने की तमन्ना करते थे बस अब तुमने उसको अपनी ऑख से देख लिया और तुम अब भी देख रहे हो
144وَمَا مُحَمَّدٌ إِلَّا رَسُولٌ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِ الرُّسُلُ ۚ أَفَإِن مَّاتَ أَوْ قُتِلَ انقَلَبْتُمْ عَلَىٰ أَعْقَابِكُمْ ۚ وَمَن يَنقَلِبْ عَلَىٰ عَقِبَيْهِ فَلَن يَضُرَّ اللَّهَ شَيْئًا ۗ وَسَيَجْزِي اللَّهُ الشَّاكِرِينَ
(फिर लड़ाई से जी क्यों चुराते हो) और मोहम्मद तो सिर्फ रसूल हैं (ख़ुदा नहीं) इनसे पहले बहुतेरे पैग़म्बर गुज़र चुके हैं फिर क्या अगर मोहम्मद अपनी मौत से मर जॉए या मार डाले जाएं तो तुम उलटे पॉव (अपने कुफ़्र की तरफ़) पलट जाओगे और जो उलटे पॉव फिरेगा (भी) तो (समझ लो) हरगिज़ ख़ुदा का कुछ भी नहीं बिगड़ेगा और अनक़रीब ख़ुदा का शुक्र करने वालों को अच्छा बदला देगा
145وَمَا كَانَ لِنَفْسٍ أَن تَمُوتَ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ كِتَابًا مُّؤَجَّلًا ۗ وَمَن يُرِدْ ثَوَابَ الدُّنْيَا نُؤْتِهِ مِنْهَا وَمَن يُرِدْ ثَوَابَ الْآخِرَةِ نُؤْتِهِ مِنْهَا ۚ وَسَنَجْزِي الشَّاكِرِينَ
और बगैर हुक्मे ख़ुदा के तो कोई शख्स मर ही नहीं सकता वक्ते मुअय्यन तक हर एक की मौत लिखी हुई है और जो शख्स (अपने किए का) बदला दुनिया में चाहे तो हम उसको इसमें से दे देते हैं और जो शख्स आख़ेरत का बदला चाहे उसे उसी में से देंगे और (नेअमत ईमान के) शुक्र करने वालों को बहुत जल्द हम जज़ाए खैर देंगे
146وَكَأَيِّن مِّن نَّبِيٍّ قَاتَلَ مَعَهُ رِبِّيُّونَ كَثِيرٌ فَمَا وَهَنُوا لِمَا أَصَابَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَمَا ضَعُفُوا وَمَا اسْتَكَانُوا ۗ وَاللَّهُ يُحِبُّ الصَّابِرِينَ
और (मुसलमानों तुम ही नहीं) ऐसे पैग़म्बर बहुत से गुज़र चुके हैं जिनके साथ बहुतेरे अल्लाह वालों ने (राहे खुदा में) जेहाद किया और फिर उनको ख़ुदा की राह में जो मुसीबत पड़ी है न तो उन्होंने हिम्मत हारी न बोदापन किया (और न दुशमन के सामने) गिड़गिड़ाने लगे और साबित क़दम रहने वालों से ख़ुदा उलफ़त रखता है
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अनुवाद — आल-इमरान 144

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Wednesday, August 19, 2026

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