आल-इमरान · 164/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
لَقَدْ مَنَّ اللَّهُ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ إِذْ بَعَثَ فِيهِمْ رَسُولًا مِّنْ أَنفُسِهِمْ يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِهِ وَيُزَكِّيهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَإِن كَانُوا مِن قَبْلُ لَفِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ ۝١٦٤
Laqad mannal laahu `alal mu`mineena iz ba`asa feehim Rasoolam min anfusihim yatloo `alaihim Aayaatihee wa yuzakkeehim wa yu`allimu humul Kitaaba wal Hikmata wa in kaanoo min qablu lafee dalaalim mubeen
📖 हिंदी अर्थ
ख़ुदा ने तो ईमानदारों पर बड़ा एहसान किया कि उनके वास्ते उन्हीं की क़ौम का एक रसूल भेजा जो उन्हें खुदा की आयतें पढ़ पढ़ के सुनाता है और उनकी तबीयत को पाकीज़ा करता है और उन्हें किताबे (ख़ुदा) और अक्ल की बातें सिखाता है अगरचे वह पहले खुली हुई गुमराही में पडे थे
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَنَّ اللهُ: अल्लाह ने उपकार किया, एहसान किया।
  • بَعَثَ: भेजा, नियुक्त किया।
  • مِنْ أَنْفُسِهِمْ: उन्हीं में से, उन्हीं की जाति में से।
  • يَتْلُو: पढ़कर सुनाता है।
  • يُزَكِّيهِمْ: उन्हें पवित्र करता है, उनके दिलों को शिर्क और बुरे आचरण से साफ़ करता है।
  • الْكِتَابَ: क़ुरआन।
  • الْحِكْمَةَ: सुन्नत (पैग़ंबर की शिक्षाएँ और तरीक़ा)।
  • ضَلَالٍ مُبِينٍ: स्पष्ट और खुला पथ-भ्रष्टाचार।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने ईमानवालों पर बड़ा एहसान किया कि उन्हीं में से एक रसूल (मुहम्मद ﷺ) को भेजा। यह रसूल उन्हीं की जाति और भाषा का था, ताकि वे उसकी बात आसानी से समझ सकें और उससे सीधा जुड़ाव महसूस कर सकें। इस रसूल के चार प्रमुख कार्य बताए गए हैं:

  1. वह उन्हें अल्लाह की आयतें (क़ुरआन) पढ़कर सुनाता है — ताकि लोगों को सीधा मार्गदर्शन मिले और वे अपने रब के संदेश को समझें।
  2. वह उन्हें पवित्र करता है — यानी उनके दिलों को शिर्क, बुरी आदतों, झूठ, धोखे और सभी प्रकार की नैतिक बुराइयों से साफ़ करता है, ताकि वे पाक और सच्चे इंसान बनें।
  3. वह उन्हें किताब (क़ुरआन) सिखाता है — यानी उन्हें अल्लाह की वह पवित्र पुस्तक पढ़ाता और समझाता है जो उनके जीवन का मार्गदर्शक है।
  4. वह उन्हें हिक्मत (सुन्नत) सिखाता है — यानी पैग़ंबर की शिक्षाएँ, उनका तरीक़ा और वह समझ जो क़ुरआन को अमल में लाने के लिए ज़रूरी है।

इससे पहले ये लोग स्पष्ट गुमराही में थे — वे मूर्तियों की पूजा करते थे, आपस में लड़ते-झगड़ते थे, बुराइयों में डूबे हुए थे और सच्चे ज्ञान से कोसों दूर थे। अल्लाह ने इस रसूल के ज़रिए उन्हें अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर लाया।


फ़ायदे (लाभ और शिक्षाएँ):

  1. अल्लाह का सबसे बड़ा एहसान — अल्लाह ने इंसानों पर सबसे बड़ा उपकार रसूल भेजकर किया है, क्योंकि रसूल ही वह ज़रिया है जो इंसान को जहालत से निकालकर हिदायत की राह दिखाता है।
  2. रसूल का इंसानों में से होना — यह अल्लाह की रहमत है कि रसूल फ़रिश्ता नहीं बल्कि इंसानों में से भेजा गया, ताकि लोग उनसे सीधे सीख सकें, उनके जीवन को देख सकें और उनका अनुसरण कर सकें।
  3. तज़्किया (आत्म-शुद्धि) की अहमियत — सिर्फ़ ज्ञान देना काफ़ी नहीं, बल्कि दिलों को पवित्र करना भी ज़रूरी है। इस्लाम सिर्फ़ बाहरी अमल नहीं, बल्कि अंदर की सफ़ाई और अच्छे आचरण की तालीम देता है।
  4. क़ुरआन और सुन्नत का साथ — किताब (क़ुरआन) और हिक्मत (सुन्नत) दोनों का ज़िक्र एक साथ आया है, जो बताता है कि सही राह पाने के लिए दोनों पर अमल ज़रूरी है।
  5. अल्लाह का शुक्र — यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए कि उसने हमें इस उम्मत में पैदा किया और हम तक यह नेमत पहुँची। जो लोग इस एहसान को पहचानते हैं, वे क़ुरआन और सुन्नत से जुड़ते हैं और अपनी ज़िंदगी को संवारते हैं।
🎧 सुनें

📜 आयत 162-166 — आल-इमरान

162أَفَمَنِ اتَّبَعَ رِضْوَانَ اللَّهِ كَمَن بَاءَ بِسَخَطٍ مِّنَ اللَّهِ وَمَأْوَاهُ جَهَنَّمُ ۚ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ
भला जो शख्स ख़ुदा की ख़ुशनूदी का पाबन्द हो क्या वह उस शख्स के बराबर हो सकता है जो ख़ुदा के गज़ब में गिरफ्तार हो और जिसका ठिकाना जहन्नुम है और वह क्या बुरा ठिकाना है
163هُمْ دَرَجَاتٌ عِندَ اللَّهِ ۗ وَاللَّهُ بَصِيرٌ بِمَا يَعْمَلُونَ
वह लोग खुदा के यहॉ मुख्तलिफ़ दरजों के हैं और जो कुछ वह करते हैं ख़ुदा देख रहा है
164لَقَدْ مَنَّ اللَّهُ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ إِذْ بَعَثَ فِيهِمْ رَسُولًا مِّنْ أَنفُسِهِمْ يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِهِ وَيُزَكِّيهِمْ وَيُعَلِّمُهُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَإِن كَانُوا مِن قَبْلُ لَفِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
ख़ुदा ने तो ईमानदारों पर बड़ा एहसान किया कि उनके वास्ते उन्हीं की क़ौम का एक रसूल भेजा जो उन्हें खुदा की आयतें पढ़ पढ़ के सुनाता है और उनकी तबीयत को पाकीज़ा करता है और उन्हें किताबे (ख़ुदा) और अक्ल की बातें सिखाता है अगरचे वह पहले खुली हुई गुमराही में पडे थे
165أَوَلَمَّا أَصَابَتْكُم مُّصِيبَةٌ قَدْ أَصَبْتُم مِّثْلَيْهَا قُلْتُمْ أَنَّىٰ هَٰذَا ۖ قُلْ هُوَ مِنْ عِندِ أَنفُسِكُمْ ۗ إِنَّ اللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
मुसलमानों क्या जब तुमपर (जंगे ओहद) में वह मुसीबत पड़ी जिसकी दूनी मुसीबत तुम (कुफ्फ़ार पर) डाल चुके थे तो (घबरा के) कहने लगे ये (आफ़त) कहॉ से आ गयी (ऐ रसूल) तुम कह दो कि ये तो खुद तुम्हारी ही तरफ़ से है (न रसूल की मुख़ालेफ़त करते न सज़ा होती) बेशक ख़ुदा हर चीज़ पर क़ादिर है
166وَمَا أَصَابَكُمْ يَوْمَ الْتَقَى الْجَمْعَانِ فَبِإِذْنِ اللَّهِ وَلِيَعْلَمَ الْمُؤْمِنِينَ
और जिस दिन दो जमाअतें आपस में गुंथ गयीं उस दिन तुम पर जो मुसीबत पड़ी वह तुम्हारी शरारत की वजह से (ख़ुदा के इजाजत की वजह से आयी) और ताकि ख़ुदा सच्चे ईमान वालों को देख ले
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अनुवाद — आल-इमरान 164

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Tuesday, August 18, 2026

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