आल-इमरान · 169/200
अनुवाद उच्चारण — सूरा आल-इमरान
وَلَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ قُتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَمْوَاتًا ۚ بَلْ أَحْيَاءٌ عِندَ رَبِّهِمْ يُرْزَقُونَ ۝١٦٩
Wa laa tahsabannal lazeena qutiloo fee sabeelillaahi amwaata; bal ahyaaa`un `inda Rabbihim yurzaqoon
📖 हिंदी अर्थ
और जो लोग ख़ुदा की राह में शहीद किए गए उन्हें हरगिज़ मुर्दा न समझना बल्कि वह लोग जीते जागते मौजूद हैं अपने परवरदिगार की तरफ़ से वह (तरह तरह की) रोज़ी पाते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • क़ुतिलू – जो मारे गए (शहीद हुए)
  • फ़ी सबीलिल्लाह – अल्लाह के रास्ते में (जिहाद करते हुए)
  • अम्वातन – मुर्दा (बेजान)
  • अह्याउ – ज़िंदा
  • इंदा रब्बिहिम – अपने रब के पास
  • युर्ज़क़ून – उन्हें रोज़ी (आजीविका) दी जाती है

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप यह कभी न समझें कि जो लोग अल्लाह के रास्ते में शहीद हो गए, वे मुर्दा हैं और उनका कोई वजूद नहीं रहा। हरगिज़ नहीं! बल्कि वे अपने रब के पास ज़िंदा हैं, एक ऐसी विशेष ज़िंदगी जो हमारी समझ से परे है — बरज़ख़ की ज़िंदगी। वे अपने रब की विशेष करीबी और रहमत में हैं, और उन्हें जन्नत की तरह-तरह की नेमतें और रोज़ी दी जा रही हैं, जिसका असली हाल केवल अल्लाह ही जानता है।

यह आयत मुख्य रूप से बद्र के शहीदों के बारे में उतरी, और कुछ के अनुसार उहुद के शहीदों — जैसे हज़रत हमज़ा (रज़ि.) और उनके साथियों — के बारे में। इसमें अल्लाह तआला ने शहादत की असली हक़ीक़त बयान की है कि शहीद मरते नहीं, बल्कि अपने रब के पास जीवित होकर नेमतों में रहते हैं।

दावती पहलू:

यह आयत मुसलमानों के दिलों में जिहाद और अल्लाह के रास्ते में कुर्बानी का जज़्बा पैदा करती है। जब एक मोमिन जानता है कि शहादत का मतलब मौत नहीं, बल्कि एक ऐसी ज़िंदगी है जो अल्लाह की करीबी और जन्नत की नेमतों से भरी हुई है, तो उसके दिल में अल्लाह के रास्ते में कुर्बानी का शौक़ पैदा होता है। यह आयत हमें सिखाती है कि मौत ख़त्म होना नहीं है, बल्कि एक दरवाज़ा है — और जो लोग अल्लाह के लिए जीते हैं और अल्लाह के लिए मरते हैं, उनका अंजाम कभी बुरा नहीं हो सकता। अल्लाह उन्हें अपनी जन्नत में जगह देता है और उन्हें ऐसी रोज़ी देता है जो कभी ख़त्म नहीं होती। यही वह सच्ची कामयाबी है जो हर मोमिन को मांगनी चाहिए — कि हम भी अल्लाह के रास्ते में जिएं, और अगर मौत आए तो उसी रास्ते में आए।



📜 आयत 167-171 — सूरा आल-इमरान

167وَلِيَعْلَمَ الَّذِينَ نَافَقُوا ۚ وَقِيلَ لَهُمْ تَعَالَوْا قَاتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَوِ ادْفَعُوا ۖ قَالُوا لَوْ نَعْلَمُ قِتَالًا لَّاتَّبَعْنَاكُمْ ۗ هُمْ لِلْكُفْرِ يَوْمَئِذٍ أَقْرَبُ مِنْهُمْ لِلْإِيمَانِ ۚ يَقُولُونَ بِأَفْوَاهِهِم مَّا لَيْسَ فِي قُلُوبِهِمْ ۗ وَاللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا يَكْتُمُونَ
और मुनाफ़िक़ों को देख ले (कि कौन है) और मुनाफ़िक़ों से कहा गया कि आओ ख़ुदा की राह में जेहाद करो या (ये न सही अपने दुशमन को) हटा दो तो कहने लगे (हाए क्या कहीं) अगर हम लड़ना जानते तो ज़रूर तुम्हारा साथ देते ये लोग उस दिन बनिस्बते ईमान के कुफ़्र के ज्यादा क़रीब थे अपने मुंह से वह बातें कह देते हैं जो उनके दिल में (ख़ाक) नहीं होतीं और जिसे वह छिपाते हैं ख़ुदा उसे ख़ूब जानता है
168الَّذِينَ قَالُوا لِإِخْوَانِهِمْ وَقَعَدُوا لَوْ أَطَاعُونَا مَا قُتِلُوا ۗ قُلْ فَادْرَءُوا عَنْ أَنفُسِكُمُ الْمَوْتَ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
(ये वही लोग हैं) जो (आप चैन से घरों में बैठे रहते है और अपने शहीद) भाईयों के बारे में कहने लगे काश हमारी पैरवी करते तो न मारे जाते (ऐ रसूल) उनसे कहो (अच्छा) अगर तुम सच्चे हो तो ज़रा अपनी जान से मौत को टाल दो
169وَلَا تَحْسَبَنَّ الَّذِينَ قُتِلُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَمْوَاتًا ۚ بَلْ أَحْيَاءٌ عِندَ رَبِّهِمْ يُرْزَقُونَ
और जो लोग ख़ुदा की राह में शहीद किए गए उन्हें हरगिज़ मुर्दा न समझना बल्कि वह लोग जीते जागते मौजूद हैं अपने परवरदिगार की तरफ़ से वह (तरह तरह की) रोज़ी पाते हैं
170فَرِحِينَ بِمَا آتَاهُمُ اللَّهُ مِن فَضْلِهِ وَيَسْتَبْشِرُونَ بِالَّذِينَ لَمْ يَلْحَقُوا بِهِم مِّنْ خَلْفِهِمْ أَلَّا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
और ख़ुदा ने जो फ़ज़ल व करम उन पर किया है उसकी (ख़ुशी) से फूले नहीं समाते और जो लोग उनसे पीछे रह गए और उनमें आकर शामिल नहीं हुए उनकी निस्बत ये (ख्याल करके) ख़ुशियॉ मनाते हैं कि (ये भी शहीद हों तो) उनपर न किसी क़िस्म का ख़ौफ़ होगा और न आज़ुर्दा ख़ातिर होंगे
171۞ يَسْتَبْشِرُونَ بِنِعْمَةٍ مِّنَ اللَّهِ وَفَضْلٍ وَأَنَّ اللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ الْمُؤْمِنِينَ
ख़ुदा नेअमत और उसके फ़ज़ल (व करम) और इस बात की ख़ुशख़बरी पाकर कि ख़ुदा मोमिनीन के सवाब को बरबाद नहीं करता
आल-इमरानकुरान सूची
200आयत
मदनीअवतरण स्थान
169आयत

अनुवाद — आल-इमरान 169

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Thursday, October 1, 2026

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