आल-इमरान · 72/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَقَالَت طَّائِفَةٌ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ آمِنُوا بِالَّذِي أُنزِلَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَجْهَ النَّهَارِ وَاكْفُرُوا آخِرَهُ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ ۝٧٢
Wa qaalat taaa`ifatum min Ahlil Kitaabi aaminoo billazeee unzila `alal lazeena aamanoo wajhan nahaari wakfurooo aakhirahoo la`alla hum yarji`oon
📖 हिंदी अर्थ
और अहले किताब से एक गिरोह ने (अपने लोगों से) कहा कि मुसलमानों पर जो किताब नाज़िल हुईहै उसपर सुबह सवेरे ईमान लाओ और आख़िर वक्त ऌन्कार कर दिया करो शायद मुसलमान (इसी तदबीर से अपने दीन से) फिर जाए

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • طَائِفَةٌ – एक गिरोह या समूह
  • وَجْهَ النَّهَارِ – दिन की शुरुआत, सुबह का समय
  • آخِرَهُ – दिन का अंत, अंतिम भाग
  • لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ – ताकि वे (मुसलमान) अपने धर्म से लौट जाएँ या संदेह में पड़ जाएँ

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में यहूदियों की एक चालाक और कपटपूर्ण साज़िश का पर्दाफाश किया है। उनके कुछ विद्वानों और नेताओं ने आपस में साजिश रची कि वे सुबह के समय मुसलमानों के सामने ईमान लाने का ढोंग करें — यानी क़ुरआन और रसूलुल्लाह ﷺ पर ईमान लाने का इज़हार करें — और जब दिन ढले तो उसी दिन कुफ़्र का एलान कर दें। उनका मक़सद यह था कि साधारण मुसलमान, जो इन्हें अहले-किताब और जानकार समझते थे, जब यह देखेंगे कि ये लोग ईमान लाने के बाद वापस कुफ़्र की तरफ लौट गए, तो वे कहेंगे: "ये लोग तो किताबों के जानकार हैं, अगर इस दीन में भलाई होती तो ये इसे छोड़कर नहीं जाते।" इस तरह वे मुसलमानों के दिलों में शुबहा (संदेह) डालकर उन्हें इस्लाम से फेरना चाहते थे।

यह आयत हमें सिखाती है कि दुश्मन कितनी भी चालाकियाँ करें, अल्लाह उनकी हर साज़िश को नाकाम कर देता है। अल्लाह ने उनकी यह योजना उसी वक़्त बेनक़ाब कर दी और मुसलमानों को उनके मक्र (धोखे) से आगाह कर दिया। यह हमारे लिए एक बड़ी नेमत है कि अल्लाह ने अपने कलाम में दुश्मनों की चालों का ज़िक्र किया ताकि हम सतर्क रहें और अपने ईमान को मज़बूत करें।

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि सच्चा ईमान सिर्फ़ ज़ुबान का इज़हार नहीं, बल्कि दिल का यक़ीन और अमल की पाबंदी है। हमें अपने दीन पर मज़बूती से क़ायम रहना चाहिए और किसी की धोखेबाज़ी से नहीं डरना चाहिए, क्योंकि अल्लाह अपने बंदों का हाथ पकड़ने वाला है। जो लोग अल्लाह पर भरोसा करते हैं, अल्लाह उन्हें दुश्मनों की साज़िशों से बचाता है। यह भी याद रखें कि दीन की सच्चाई किसी इंसान के ईमान लाने या छोड़ने से बदलती नहीं — सच्चाई तो वही है जो अल्लाह ने अपनी किताब में उतारी है। हमें अपने ईमान को इल्म, अमल और यक़ीन से मज़बूत करना है, ताकि कोई शुबहा हमें हिला न सके। अल्लाह हमें सच्चे दिल से ईमान लाने और उस पर साबित-क़दम रहने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 70-74 — आल-इमरान

70يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَأَنتُمْ تَشْهَدُونَ
और उसको समझते (भी) नहीं ऐ अहले किताब तुम ख़ुदा की आयतों से क्यों इन्कार करते हो, हालॉकि तुम ख़ुद गवाह बन सकते हो
71يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَلْبِسُونَ الْحَقَّ بِالْبَاطِلِ وَتَكْتُمُونَ الْحَقَّ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ
ऐ अहले किताब तुम क्यो हक़ व बातिल को गड़बड़ करते और हक़ को छुपाते हो हालॉकि तुम जानते हो
72وَقَالَت طَّائِفَةٌ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ آمِنُوا بِالَّذِي أُنزِلَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَجْهَ النَّهَارِ وَاكْفُرُوا آخِرَهُ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
और अहले किताब से एक गिरोह ने (अपने लोगों से) कहा कि मुसलमानों पर जो किताब नाज़िल हुईहै उसपर सुबह सवेरे ईमान लाओ और आख़िर वक्त ऌन्कार कर दिया करो शायद मुसलमान (इसी तदबीर से अपने दीन से) फिर जाए
73وَلَا تُؤْمِنُوا إِلَّا لِمَن تَبِعَ دِينَكُمْ قُلْ إِنَّ الْهُدَىٰ هُدَى اللَّهِ أَن يُؤْتَىٰ أَحَدٌ مِّثْلَ مَا أُوتِيتُمْ أَوْ يُحَاجُّوكُمْ عِندَ رَبِّكُمْ ۗ قُلْ إِنَّ الْفَضْلَ بِيَدِ اللَّهِ يُؤْتِيهِ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ
और तुम्हारे दीन की पैरवरी करे उसके सिवा किसी दूसरे की बात का ऐतबार न करो (ऐ रसूल) तुम कह दो कि बस ख़ुदा ही की हिदायत तो हिदायत है (यहूदी बाहम ये भी कहते हैं कि) उसको भी न (मानना) कि जैसा (उम्दा दीन) तुमको दिया गया है, वैसा किसी और को दिया जाय या तुमसे कोई शख्स ख़ुदा के यहॉ झगड़ा करे (ऐ रसूल तुम उनसे) कह दो कि (ये क्या ग़लत ख्याल है) फ़ज़ल (व करम) ख़ुदा के हाथ में है वह जिसको चाहे दे और ख़ुदा बड़ी गुन्जाईश वाला है (और हर शै को)े जानता है
74يَخْتَصُّ بِرَحْمَتِهِ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيمِ
जिसको चाहे अपनी रहमत के लिये ख़ास कर लेता है और ख़ुदा बड़ा फ़ज़लों करम वाला हे
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अनुवाद — आल-इमरान 72

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Tuesday, August 18, 2026

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