आल-इमरान · 73/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَلَا تُؤْمِنُوا إِلَّا لِمَن تَبِعَ دِينَكُمْ قُلْ إِنَّ الْهُدَىٰ هُدَى اللَّهِ أَن يُؤْتَىٰ أَحَدٌ مِّثْلَ مَا أُوتِيتُمْ أَوْ يُحَاجُّوكُمْ عِندَ رَبِّكُمْ ۗ قُلْ إِنَّ الْفَضْلَ بِيَدِ اللَّهِ يُؤْتِيهِ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ ۝٧٣
Wa laa tu`minooo illaa liman tabi`a deenakum qul innal hudaa hudal laahi ai yu`taaa ahadum misla maaa ooteetum aw yuhaaajjookum `inda Rabbikum, qul innal fadla biyadil laah; yu`teehi mai yashaaa`; wallaahu Waasi`un `Aleem
📖 हिंदी अर्थ
और तुम्हारे दीन की पैरवरी करे उसके सिवा किसी दूसरे की बात का ऐतबार न करो (ऐ रसूल) तुम कह दो कि बस ख़ुदा ही की हिदायत तो हिदायत है (यहूदी बाहम ये भी कहते हैं कि) उसको भी न (मानना) कि जैसा (उम्दा दीन) तुमको दिया गया है, वैसा किसी और को दिया जाय या तुमसे कोई शख्स ख़ुदा के यहॉ झगड़ा करे (ऐ रसूल तुम उनसे) कह दो कि (ये क्या ग़लत ख्याल है) फ़ज़ल (व करम) ख़ुदा के हाथ में है वह जिसको चाहे दे और ख़ुदा बड़ी गुन्जाईश वाला है (और हर शै को)े जानता है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْهُدَىٰ: मार्गदर्शन, सत्य का रास्ता दिखाना।
  • الْفَضْل: दया, उपकार, और अनुग्रह।
  • وَاسِعٌ: जिसकी दया और ज्ञान सब कुछ घेरे हुए है, असीमित।
  • عَلِيمٌ: सब कुछ जानने वाला, हर चीज़ से पूर्ण अवगत।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला यहूदियों की उस बुरी सलाह का ज़िक्र कर रहा है जो वे आपस में एक-दूसरे को दे रहे थे। वे कहते थे कि "तुम उसी पर विश्वास करो जो तुम्हारे दीन (धर्म) का पैरोकार हो, यानी यहूदी हो।" वे मुसलमानों को यहूदी बनाने की कोशिश में थे और चाहते थे कि उन्हें सच्चा ज्ञान और मार्गदर्शन न दिया जाए।

अल्लाह तआला नबी ﷺ को हुक्म देता है कि आप उन्हें जवाब दें: "सच्चा मार्गदर्शन तो केवल अल्लाह ही का है।" यानी हिदायत किसी के पास नहीं है, बल्कि अल्लाह जिसे चाहता है सीधा रास्ता दिखाता है। यहूदियों का एक और ख़याल यह था कि वे डरते थे कि कहीं मुसलमानों को भी वही ज्ञान और फज़ीलत न मिल जाए जो उन्हें मिली है, या फिर वे उनसे उनके रब के सामने हुज्जत (तर्क) में बढ़ न जाएँ। इसलिए वे आपस में कहते थे कि अपने ज्ञान को उन पर ज़ाहिर मत करो।

अल्लाह तआला फरमाता है: "कह दो कि फज़ीलत और उपकार अल्लाह ही के हाथ में है, वह जिसे चाहता है देता है।" यानी ज्ञान, समझ, ईमान, और नेकी — सब कुछ अल्लाह की देन है। वह जिसे चाहता है अपने फज़ल से नवाज़ता है, चाहे वह यहूदी हो या मुसलमान। अल्लाह की दया और ज्ञान असीमित है, वह हर चीज़ से वाक़िफ है और जानता है कि यह फज़ल किसे देना है।

फ़ायदे (लाभ):

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चा मार्गदर्शन और भलाई किसी ज़ात या गिरोह के साथ ख़ास नहीं है, बल्कि अल्लाह की रहमत हर उस इंसान के लिए खुली है जो सच्चे दिल से उसकी तरफ रुजू करे। इससे हमें उम्मीद और खुशी मिलती है कि अल्लाह की दया से कोई महरूम नहीं रहता।
  2. हमें सिखाया गया कि ज्ञान और समझ को बाँटना चाहिए, उसे छिपाना नहीं चाहिए। यहूदियों की बुराई यह थी कि वे ज्ञान छिपाते थे, जबकि इस्लाम हमें सिखाता है कि अच्छी बात दूसरों तक पहुँचाना सदक़ा है।
  3. यह आयत हमें अल्लाह पर भरोसा करना सिखाती है। जब हमें पता चलता है कि सब कुछ अल्लाह के हाथ में है, तो हमारा दिल उसकी तरफ मुड़ता है और हम उससे फज़ल की उम्मीद रखते हैं। अल्लाह वासी (विस्तृत) है — उसकी रहमत किसी हद में नहीं बंधी।
  4. यह आयत हमें यह भी बताती है कि इस्लाम में कोई जातिवाद या नस्लवाद नहीं है। अल्लाह की नज़र में सब बराबर हैं; फज़ल उसी को मिलता है जो उसके हुक्मों पर चले और उसकी राह में सच्चा हो।
🎧 सुनें

📜 आयत 71-75 — आल-इमरान

71يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَلْبِسُونَ الْحَقَّ بِالْبَاطِلِ وَتَكْتُمُونَ الْحَقَّ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ
ऐ अहले किताब तुम क्यो हक़ व बातिल को गड़बड़ करते और हक़ को छुपाते हो हालॉकि तुम जानते हो
72وَقَالَت طَّائِفَةٌ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ آمِنُوا بِالَّذِي أُنزِلَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَجْهَ النَّهَارِ وَاكْفُرُوا آخِرَهُ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
और अहले किताब से एक गिरोह ने (अपने लोगों से) कहा कि मुसलमानों पर जो किताब नाज़िल हुईहै उसपर सुबह सवेरे ईमान लाओ और आख़िर वक्त ऌन्कार कर दिया करो शायद मुसलमान (इसी तदबीर से अपने दीन से) फिर जाए
73وَلَا تُؤْمِنُوا إِلَّا لِمَن تَبِعَ دِينَكُمْ قُلْ إِنَّ الْهُدَىٰ هُدَى اللَّهِ أَن يُؤْتَىٰ أَحَدٌ مِّثْلَ مَا أُوتِيتُمْ أَوْ يُحَاجُّوكُمْ عِندَ رَبِّكُمْ ۗ قُلْ إِنَّ الْفَضْلَ بِيَدِ اللَّهِ يُؤْتِيهِ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ
और तुम्हारे दीन की पैरवरी करे उसके सिवा किसी दूसरे की बात का ऐतबार न करो (ऐ रसूल) तुम कह दो कि बस ख़ुदा ही की हिदायत तो हिदायत है (यहूदी बाहम ये भी कहते हैं कि) उसको भी न (मानना) कि जैसा (उम्दा दीन) तुमको दिया गया है, वैसा किसी और को दिया जाय या तुमसे कोई शख्स ख़ुदा के यहॉ झगड़ा करे (ऐ रसूल तुम उनसे) कह दो कि (ये क्या ग़लत ख्याल है) फ़ज़ल (व करम) ख़ुदा के हाथ में है वह जिसको चाहे दे और ख़ुदा बड़ी गुन्जाईश वाला है (और हर शै को)े जानता है
74يَخْتَصُّ بِرَحْمَتِهِ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيمِ
जिसको चाहे अपनी रहमत के लिये ख़ास कर लेता है और ख़ुदा बड़ा फ़ज़लों करम वाला हे
75۞ وَمِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ مَنْ إِن تَأْمَنْهُ بِقِنطَارٍ يُؤَدِّهِ إِلَيْكَ وَمِنْهُم مَّنْ إِن تَأْمَنْهُ بِدِينَارٍ لَّا يُؤَدِّهِ إِلَيْكَ إِلَّا مَا دُمْتَ عَلَيْهِ قَائِمًا ۗ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَالُوا لَيْسَ عَلَيْنَا فِي الْأُمِّيِّينَ سَبِيلٌ وَيَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
और अहले किताब कुछ ऐसे भी हैं कि अगर उनके पास रूपए की ढेर अमानत रख दो तो भी उसे (जब चाहो) वैसे ही तुम्हारे हवाले कर देंगे और बाज़ ऐसे हें कि अगर एक अशर्फ़ी भी अमानत रखो तो जब तक तुम बराबर (उनके सर) पर खड़े न रहोगे तुम्हें वापस न देंगे ये (बदमुआम लगी) इस वजह से है कि उन का तो ये क़ौल है कि (अरब के) जाहिलो (का हक़ मार लेने) में हम पर कोई इल्ज़ाम की राह ही नहीं और जान बूझ कर खुदा पर झूठ (तूफ़ान) जोड़ते हैं
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अनुवाद — आल-इमरान 73

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Tuesday, August 18, 2026

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