आल-इमरान · 71/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَلْبِسُونَ الْحَقَّ بِالْبَاطِلِ وَتَكْتُمُونَ الْحَقَّ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ ۝٧١
Yaaa Ahalal Kitaabi lima talbisoonal haqqa bilbaatili wa taktumoonal haqqa wa antum ta`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
ऐ अहले किताब तुम क्यो हक़ व बातिल को गड़बड़ करते और हक़ को छुपाते हो हालॉकि तुम जानते हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تَلْبِسُونَ (तल्बिसून): मिलाना, गड्ड-मड्ड करना, सच को झूठ में मिला देना।
  • الْحَقّ (अल-हक़): सत्य, सच्चाई — यहाँ अर्थ है वह सत्य जो अल्लाह ने अपनी किताबों में उतारा।
  • الْبَاطِل (अल-बातिल): असत्य, झूठ — यहाँ अर्थ है वह बातें जो उन्होंने अपनी ओर से गढ़ लीं या बदल दीं।
  • تَكْتُمُونَ (तकतुमून): छिपाना, छुपा देना।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ अहले-किताब (यहूदी और ईसाई)! तुम्हें क्या हो गया है? तुम सत्य को असत्य के साथ क्यों मिलाते हो? तुमने अपनी किताबों (तौरात और इंजील) में अल्लाह की भेजी हुई सच्ची शिक्षाओं को अपने मनगढ़ंत विचारों, झूठी व्याख्याओं और अपने हाथों से लिखी हुई बातों के साथ इस तरह मिला दिया कि सच और झूठ में फ़र्क़ करना मुश्किल हो गया। तुम सच को झूठ के रंग में रंग देते हो, ताकि लोग उसे सच समझें और तुम्हारी बात मान लें।

और सबसे बड़ी बात — तुम उस सत्य को भी छिपाते हो जो तुम्हारी अपनी किताबों में मौजूद है। तुम्हें मालूम है कि हज़रत मुहम्मद ﷺ की नबुव्वत की सच्ची निशानियाँ और उनके आने की ख़बरें तुम्हारी किताबों में लिखी हुई हैं। तुम यह भी जानते हो कि उनका दीन ही सच्चा दीन है, और उनका अनुसरण करना ही हर इंसान पर फ़र्ज़ है। लेकिन फिर भी तुम इस सच्चाई को जानबूझकर छिपाते हो, ताकि लोग उन पर ईमान न लाएँ और तुम्हारी दुनियावी सत्ता और फ़ायदे बने रहें।

तुम्हें अच्छी तरह पता है कि सच क्या है और झूठ क्या है, हिदायत क्या है और गुमराही क्या है — फिर भी तुम जानते-बूझते हुए यह सब करते हो। यह तुम्हारी बड़ी बेईमानी और ज़ुल्म है।


फ़ायदे (सीख):

  1. सच को झूठ के साथ मिलाना बड़ा गुनाह है — इंसान को चाहिए कि वह सच को साफ़-साफ़ पेश करे, उसे मिलावट से बचाए। दीन के मामले में मिलावट करना अल्लाह की नज़र में बहुत बुरा काम है।
  2. सच्चाई छिपाना भी झूठ बोलने जैसा है — जिसे सच्चाई का इल्म हो और वह उसे छिपाए, वह अल्लाह के सामने ज़िम्मेदार है। इस्लाम सिखाता है कि सच्चाई को बयान करना अमानत है, चाहे वह अपने ख़िलाफ़ ही क्यों न हो।
  3. इल्म के साथ अमल ज़रूरी है — जो जानता है और फिर भी जानबूझकर गलत रास्ता अपनाता है, उसका इल्म उसे अल्लाह के अज़ाब से नहीं बचा सकता। सच्चा इल्म वही है जो इंसान को अल्लाह की इताअत की तरफ़ ले जाए।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि हम अपने दीन को पाक और साफ़ रखें — किसी भी तरह की बिद'अत (नई बात) या गलत रिवायत को दीन में शामिल न करें, और न ही दीन की कोई बात लोगों से छिपाएँ।
  5. इस आयत में मुहम्मद ﷺ की सच्चाई की गवाही है — क़ुरआन बताता है कि पहले की किताबों में भी उनकी नबुव्वत की ख़बरें थीं, और यह उनके सच्चे नबी होने की एक बड़ी निशानी है। यह हमारे ईमान को मज़बूत करती है और हमें अपने नबी ﷺ से मुहब्बत की तरफ़ बढ़ाती है।


📜 आयत 69-73 — आल-इमरान

69وَدَّت طَّائِفَةٌ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ لَوْ يُضِلُّونَكُمْ وَمَا يُضِلُّونَ إِلَّا أَنفُسَهُمْ وَمَا يَشْعُرُونَ
(मुसलमानो) अहले किताब से एक गिरोह ने बहुत चाहा कि किसी तरह तुमको राहेरास्त से भटका दे हालॉकि वह (अपनी तदबीरों से तुमको तो नहीं मगर) अपने ही को भटकाते हैं
70يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَأَنتُمْ تَشْهَدُونَ
और उसको समझते (भी) नहीं ऐ अहले किताब तुम ख़ुदा की आयतों से क्यों इन्कार करते हो, हालॉकि तुम ख़ुद गवाह बन सकते हो
71يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَلْبِسُونَ الْحَقَّ بِالْبَاطِلِ وَتَكْتُمُونَ الْحَقَّ وَأَنتُمْ تَعْلَمُونَ
ऐ अहले किताब तुम क्यो हक़ व बातिल को गड़बड़ करते और हक़ को छुपाते हो हालॉकि तुम जानते हो
72وَقَالَت طَّائِفَةٌ مِّنْ أَهْلِ الْكِتَابِ آمِنُوا بِالَّذِي أُنزِلَ عَلَى الَّذِينَ آمَنُوا وَجْهَ النَّهَارِ وَاكْفُرُوا آخِرَهُ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
और अहले किताब से एक गिरोह ने (अपने लोगों से) कहा कि मुसलमानों पर जो किताब नाज़िल हुईहै उसपर सुबह सवेरे ईमान लाओ और आख़िर वक्त ऌन्कार कर दिया करो शायद मुसलमान (इसी तदबीर से अपने दीन से) फिर जाए
73وَلَا تُؤْمِنُوا إِلَّا لِمَن تَبِعَ دِينَكُمْ قُلْ إِنَّ الْهُدَىٰ هُدَى اللَّهِ أَن يُؤْتَىٰ أَحَدٌ مِّثْلَ مَا أُوتِيتُمْ أَوْ يُحَاجُّوكُمْ عِندَ رَبِّكُمْ ۗ قُلْ إِنَّ الْفَضْلَ بِيَدِ اللَّهِ يُؤْتِيهِ مَن يَشَاءُ ۗ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ
और तुम्हारे दीन की पैरवरी करे उसके सिवा किसी दूसरे की बात का ऐतबार न करो (ऐ रसूल) तुम कह दो कि बस ख़ुदा ही की हिदायत तो हिदायत है (यहूदी बाहम ये भी कहते हैं कि) उसको भी न (मानना) कि जैसा (उम्दा दीन) तुमको दिया गया है, वैसा किसी और को दिया जाय या तुमसे कोई शख्स ख़ुदा के यहॉ झगड़ा करे (ऐ रसूल तुम उनसे) कह दो कि (ये क्या ग़लत ख्याल है) फ़ज़ल (व करम) ख़ुदा के हाथ में है वह जिसको चाहे दे और ख़ुदा बड़ी गुन्जाईश वाला है (और हर शै को)े जानता है
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अनुवाद — आल-इमरान 71

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Tuesday, August 18, 2026

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