आल-इमरान · 96/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
إِنَّ أَوَّلَ بَيْتٍ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِي بِبَكَّةَ مُبَارَكًا وَهُدًى لِّلْعَالَمِينَ ۝٩٦
Inna awwala Baitinw wudi`a linnaasi lallazee bi Bakkata mubaarakanw wa hudal lil `aalameen
📖 हिंदी अर्थ
लोगों (की इबादत) के वास्ते जो घर सबसे पहले बनाया गया वह तो यक़ीनन यही (काबा) है जो मक्के में है बड़ी (खैर व बरकत) वाला और सारे जहॉन के लोगों का रहनुमा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَوَّلَ بَيْتٍ: सबसे पहला घर (मस्जिद)।
  • وُضِعَ: रखा गया, बनाया गया, स्थापित किया गया।
  • بِبَكَّةَ: बक्का अर्थात मक्का (यह मक्का का ही एक नाम है)।
  • مُبَارَكًا: बरकत वाला, जिसमें भलाई और अज़ीम फ़ज़ीलत हो।
  • هُدًى: मार्गदर्शन, हिदायत।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस समय उतरी जब यहूदियों ने मुसलमानों से कहा कि बैतुल-मुक़द्दस (यरूशलम) हमारा क़िबला है और वह काबा से बेहतर और पुराना है। अल्लाह तआला ने इसका उत्तर देते हुए फ़रमाया कि सबसे पहला घर जो लोगों के लिए (इबादत और अल्लाह की बंदगी के लिए) बनाया गया, वह वही घर है जो मक्का (बक्का) में है। यह घर बरकतों वाला है, यानी इसमें नेकियाँ बढ़ाई जाती हैं, रहमतें उतरती हैं, और यह पूरी दुनिया के लिए हिदायत और मार्गदर्शन का केंद्र है। इसी की तरफ़ मुख करके नमाज़ पढ़ी जाती है, और यहीं हज और उमरा किया जाता है। यह घर इंसानों की रहनुमाई और उनके दीन-दुनिया की भलाई का ज़रिया है।


फ़ायदे (उपदेश):

  1. काबा की अज़मत और उसका मुक़ाम इस आयत से साबित होता है कि यह दुनिया का सबसे पहला घर है जो अल्लाह की इबादत के लिए बनाया गया। यह मुसलमानों के लिए फ़ख़्र और इज़्ज़त की जगह है।
  2. इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि अल्लाह ने काबा को बरकतों का केंद्र बनाया है, इसलिए हमें इसकी तरफ़ रुख करके नमाज़ पढ़नी चाहिए और हज-उमरा की कोशिश करनी चाहिए, ताकि हम उन बरकतों से महरूम न रहें।
  3. काबा सिर्फ़ एक इमारत नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए हिदायत का निशान है। यह हमें याद दिलाता है कि जिस तरह यह घर लोगों को एकजुट करता है, उसी तरह हमें भी अपने दिलों को अल्लाह की इबादत और आपसी भाईचारे के लिए जोड़ना चाहिए।
  4. यह आयत मुसलमानों को यह भी सिखाती है कि अल्लाह की इबादत की असल बुनियाद तौहीद (एकेश्वरवाद) पर है, और काबा उसी तौहीद का प्रतीक है। इसलिए हमें अपनी ज़िंदगी में तौहीद को ही केंद्र बनाना चाहिए।


📜 आयत 94-98 — आल-इमरान

94فَمَنِ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ الْكَذِبَ مِن بَعْدِ ذَٰلِكَ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
और उसको (हमारे सामने) पढ़ो फिर उसके बाद भी जो कोई ख़ुदा पर झूठ तूफ़ान जोड़े तो (समझ लो) कि यही लोग ज़ालिम (हठधर्म) हैं
95قُلْ صَدَقَ اللَّهُ ۗ فَاتَّبِعُوا مِلَّةَ إِبْرَاهِيمَ حَنِيفًا وَمَا كَانَ مِنَ الْمُشْرِكِينَ
(ऐ रसूल) कह दो कि ख़ुदा ने सच फ़रमाया तो अब तुम मिल्लते इबराहीम (इस्लाम) की पैरवी करो जो बातिल से कतरा के चलते थे और मुशरेकीन से न थे
96إِنَّ أَوَّلَ بَيْتٍ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِي بِبَكَّةَ مُبَارَكًا وَهُدًى لِّلْعَالَمِينَ
लोगों (की इबादत) के वास्ते जो घर सबसे पहले बनाया गया वह तो यक़ीनन यही (काबा) है जो मक्के में है बड़ी (खैर व बरकत) वाला और सारे जहॉन के लोगों का रहनुमा
97فِيهِ آيَاتٌ بَيِّنَاتٌ مَّقَامُ إِبْرَاهِيمَ ۖ وَمَن دَخَلَهُ كَانَ آمِنًا ۗ وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا ۚ وَمَن كَفَرَ فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ
इसमें (हुरमत की) बहुत सी वाज़े और रौशन निशानियॉ हैं (उनमें से) मुक़ाम इबराहीम है (जहॉ आपके क़दमों का पत्थर पर निशान है) और जो इस घर में दाख़िल हुआ अमन में आ गया और लोगों पर वाजिब है कि महज़ ख़ुदा के लिए ख़ानाए काबा का हज करें जिन्हे वहां तक पहुँचने की इस्तेताअत है और जिसने बावजूद कुदरत हज से इन्कार किया तो (याद रखे) कि ख़ुदा सारे जहॉन से बेपरवा है
98قُلْ يَا أَهْلَ الْكِتَابِ لِمَ تَكْفُرُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَاللَّهُ شَهِيدٌ عَلَىٰ مَا تَعْمَلُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ अहले किताब खुदा की आयतो से क्यो मुन्किर हुए जाते हो हालॉकि जो काम काज तुम करते हो खुदा को उसकी (पूरी) पूरी इत्तिला है
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अनुवाद — आल-इमरान 96

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Tuesday, August 18, 2026

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