अर-रूम · 30/60
अनुवाद उच्चारण — अर-रूम
فَأَقِمْ وَجْهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفًا ۚ فِطْرَتَ اللَّهِ الَّتِي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَا ۚ لَا تَبْدِيلَ لِخَلْقِ اللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ ۝٣٠
Fa aqim wajhaka liddeeni Haneefaa; fitratal laahil latee fataran naasa `alaihaa; laa taabdeela likhalqil laah; zaalikad deenul qaiyimu wa laakinna aksaran naasi laa ya`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
तो (ऐ रसूल) तुम बातिल से कतरा के अपना रुख़ दीन की तरफ किए रहो यही ख़ुदा की बनावट है जिस पर उसने लोगों को पैदा किया है ख़ुदा की (दुरुस्त की हुई) बनावट में तग़य्युर तबद्दुल (उलट फेर) नहीं हो सकता यही मज़बूत और (बिल्कुल सीधा) दीन है मगर बहुत से लोग नहीं जानते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • हनीफ़न (حَنِيفًا): सभी झूठे धर्मों से हटकर एक सच्चे धर्म (इस्लाम) की ओर झुकने वाला।
  • फ़ित्रत (فِطْرَتَ): वह मूल प्रकृति जिस पर अल्लाह ने इंसानों को पैदा किया है।
  • क़य्यिम (الْقَيِّم): सीधा, स्थिर और अडिग धर्म जिसमें कोई टेढ़ापन नहीं।

तफ़सीर:

ऐ नबी! आप अपने चेहरे को पूरी तरह इस दीन (इस्लाम) की ओर मोड़ लें, और उस पर स्थिर रहें। यानी अपने आपको, अपनी नीयत को और अपने पूरे अस्तित्व को अल्लाह के उस दीन के लिए समर्पित कर दें, जो उसने आपके लिए चुना है। "हनीफ़न" का मतलब है कि आप हर झूठे और बिगाड़े हुए धर्म से मुँह मोड़कर सिर्फ अल्लाह के सच्चे दीन की तरफ झुक जाएँ। यही वह फ़ित्रत है जिस पर अल्लाह ने सभी इंसानों को पैदा किया है। हर इंसान पैदाइशी तौर पर इसी फ़ित्रत (तौहीद और अल्लाह की इबादत) पर होता है, लेकिन बाद में उसके माता-पिता और समाज उसे दूसरे रास्तों पर ले जाते हैं।

अल्लाह की बनाई हुई इस फ़ित्रत में कोई बदलाव नहीं हो सकता। यह अल्लाह की रचना है, और अल्लाह की रचना कभी बदलती नहीं। जिस तरह अल्लाह ने इंसान को दो आँखें, दो कान और एक दिल देकर पैदा किया है, उसी तरह उसने उसके दिल में अपनी पहचान और अपनी इबादत की फ़ित्रत भी डाल दी है। यही सीधा और स्थिर दीन है — यानी इस्लाम — जो इंसान को अल्लाह की रज़ा और जन्नत तक पहुँचाता है। इस दीन में कोई कमी नहीं, कोई टेढ़ापन नहीं, और न ही इसमें कोई बदलाव आ सकता है।

लेकिन अफ़सोस! अधिकतर लोग इस हक़ीक़त को नहीं जानते। वे अपनी अक्ल और अपनी ख्वाहिशों के पीछे चलते हैं, और उस सच्चे दीन से दूर हो जाते हैं जो उनकी अपनी फ़ित्रत में मौजूद है। अगर वे ज़रा सा भी ग़ौर करें, अपने दिल की आवाज़ सुनें, तो समझ जाएँ कि सच्चा रास्ता सिर्फ़ एक ही है — अल्लाह का रास्ता।

दावती पहलू:

यह आयत हमें बताती है कि इस्लाम कोई नया या अजनबी धर्म नहीं है, बल्कि यह हर इंसान की अपनी फ़ित्रत का धर्म है। जिस तरह एक बच्चा बिना किसी सिखाए अपनी माँ का दूध पीना जानता है, उसी तरह हर इंसान के दिल में अल्लाह की पहचान और उसकी इबादत की चाहत पहले से मौजूद है। इस्लाम क़बूल करना दरअसल अपनी असली फ़ित्रत की तरफ लौटना है। यही वह रास्ता है जो इंसान को सुकून, सच्ची खुशी और अल्लाह की रज़ा तक पहुँचाता है। आइए, हम अपने दिल की आवाज़ सुनें और उस सच्चे दीन को अपनाएँ जो हमारी अपनी फ़ित्रत में बसा है।



📜 आयत 28-32 — अर-रूम

28ضَرَبَ لَكُم مَّثَلًا مِّنْ أَنفُسِكُمْ ۖ هَل لَّكُم مِّن مَّا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُم مِّن شُرَكَاءَ فِي مَا رَزَقْنَاكُمْ فَأَنتُمْ فِيهِ سَوَاءٌ تَخَافُونَهُمْ كَخِيفَتِكُمْ أَنفُسَكُمْ ۚ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ الْآيَاتِ لِقَوْمٍ يَعْقِلُونَ
और हमने (तुम्हारे समझाने के वास्ते) तुम्हारी ही एक मिसाल बयान की है हमने जो कुछ तुम्हे अता किया है क्या उसमें तुम्हारी लौन्डी गुलामों में से कोई (भी) तुम्हारा शरीक है कि (वह और) तुम उसमें बराबर हो जाओ (और क्या) तुम उनसे ऐसा ही ख़ौफ रखते हो जितना तुम्हें अपने लोगों का (हक़ हिस्सा न देने में) ख़ौफ होता है फिर बन्दों को खुदा का शरीक क्यों बनाते हो) अक्ल मन्दों के वास्ते हम यूँ अपनी आयतों को तफसीलदार बयान करते हैं
29بَلِ اتَّبَعَ الَّذِينَ ظَلَمُوا أَهْوَاءَهُم بِغَيْرِ عِلْمٍ ۖ فَمَن يَهْدِي مَنْ أَضَلَّ اللَّهُ ۖ وَمَا لَهُم مِّن نَّاصِرِينَ
मगर सरकशों ने तो बगैर समझे बूझे अपनी नफसियानी ख्वाहिशों की पैरवी कर ली (और ख़ुदा का शरीक ठहरा दिया) ग़रज़ ख़ुदा जिसे गुमराही में छोड़ दे (फिर) उसे कौन राहे रास्त पर ला सकता है और उनका कोई मददगार (भी) नहीं
30فَأَقِمْ وَجْهَكَ لِلدِّينِ حَنِيفًا ۚ فِطْرَتَ اللَّهِ الَّتِي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَا ۚ لَا تَبْدِيلَ لِخَلْقِ اللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
तो (ऐ रसूल) तुम बातिल से कतरा के अपना रुख़ दीन की तरफ किए रहो यही ख़ुदा की बनावट है जिस पर उसने लोगों को पैदा किया है ख़ुदा की (दुरुस्त की हुई) बनावट में तग़य्युर तबद्दुल (उलट फेर) नहीं हो सकता यही मज़बूत और (बिल्कुल सीधा) दीन है मगर बहुत से लोग नहीं जानते हैं
31۞ مُنِيبِينَ إِلَيْهِ وَاتَّقُوهُ وَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَلَا تَكُونُوا مِنَ الْمُشْرِكِينَ
उसी की तरफ रुजू होकर (ख़ुदा की इबादत करो) और उसी से डरते रहो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ो और मुशरेकीन से न हो जाना
32مِنَ الَّذِينَ فَرَّقُوا دِينَهُمْ وَكَانُوا شِيَعًا ۖ كُلُّ حِزْبٍ بِمَا لَدَيْهِمْ فَرِحُونَ
जिन्होंने अपने (असली) दीन में तफरेक़ा परवाज़ी की और मुख्तलिफ़ फिरके क़े बन गए जो (दीन) जिस फिरके क़े पास है उसी में निहाल है
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अनुवाद — अर-रूम 30

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Tuesday, August 18, 2026

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