अस-सजदा · 16/30
अनुवाद उच्चारण — अस-सजदा
تَتَجَافَىٰ جُنُوبُهُمْ عَنِ الْمَضَاجِعِ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ خَوْفًا وَطَمَعًا وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ ۝١٦
Tatajaafaa junoobuhum `anil madaaji`i yad`oona rabbahum khawfanw wa tama`anw wa mimmaa razaqnaahum yunfiqoon
📖 हिंदी अर्थ
(रात) के वक्त उनके पहलू बिस्तरों से आशना नहीं होते और (अज़ाब के) ख़ौफ और (रहमत की) उम्मीद पर अपने परवरदिगार की इबादत करते हैं और हमने जो कुछ उन्हें अता किया है उसमें से (ख़ुदा की) राह में ख़र्च करते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تَتَجَافَىٰ: अलग होना, ऊपर उठना, दूर हटना।
  • جُنُوبُهُمْ: उनके पहलू (करवटें)।
  • الْمَضَاجِعِ: सोने के स्थान, बिस्तर, पलंग।
  • خَوْفًا وَطَمَعًا: डर (अल्लाह के अज़ाब से) और लालच (उसकी रहमत की उम्मीद)।
  • يُنفِقُونَ: खर्च करते हैं (अल्लाह की राह में)।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत उन मोमिनों के खूबसूरत और पाकीज़ा औसाफ (गुणों) का ज़िक्र करती है जो रात की नमाज़ (तहज्जुद) के लिए उठते हैं। उनके पहलू नरम बिस्तरों से अलग हो जाते हैं, यानी वे आराम और नींद की मिठास को छोड़कर अल्लाह की इबादत के लिए खड़े हो जाते हैं। वे रात के सन्नाटे में अपने रब को पुकारते हैं—उसके अज़ाब से डरते हुए और उसकी रहमत की उम्मीद रखते हुए। उनका दिल दोनों के बीच झूलता है: एक तरफ़ खौफ़ कि कहीं उनकी इबादत क़ुबूल न हो, और दूसरी तरफ़ तमअ (लालच) कि अल्लाह की रहमत उन्हें जन्नत तक पहुँचाए। यही वह संतुलन है जो मोमिन को इख़लास (शुद्ध नियत) पर क़ायम रखता है।

इसके साथ ही, वे सिर्फ़ रात की इबादत तक सीमित नहीं रहते, बल्कि दिन में भी अल्लाह ने उन्हें जो रिज़्क़ दिया है, उसमें से खर्च करते हैं—चाहे वह ज़कात हो, सदक़ा हो, या अल्लाह की राह में किसी भी तरह की भलाई। यानी उनकी ज़िंदगी इबादत और खिदमत का एक समग्र नमूना है: रात को आँसू और दुआ, दिन को खर्च और नेकी।

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चा ईमान सिर्फ़ ज़ुबान का दावा नहीं, बल्कि अमल का सबूत है। जो लोग रात को उठकर अल्लाह से जुड़ते हैं और दिन में अपने माल से दूसरों की मदद करते हैं, उनके लिए अल्लाह ने ऐसा इनाम तैयार किया है जो किसी आँख ने नहीं देखा, किसी कान ने नहीं सुना और किसी दिल ने नहीं सोचा। यही वह लोग हैं जिनकी आँखें ठंडी होंगी और जो अपने रब की मेहरबानी से जन्नत की नेमतों में होंगे।

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें बुला रही है कि हम अपनी नींद में से थोड़ा सा हिस्सा अल्लाह के लिए निकालें, अपने बिस्तर की गर्माहट को छोड़कर सजदे की ठंडक महसूस करें, और अपने माल में से कुछ हिस्सा उन लोगों के लिए निकालें जो ज़रूरतमंद हैं। यही वह रास्ता है जो हमें अल्लाह की मुहब्बत तक पहुँचाता है और हमारे दिलों को सुकून देता है। अल्लाह हमें इस नेक अमल की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 14-18 — अस-सजदा

14فَذُوقُوا بِمَا نَسِيتُمْ لِقَاءَ يَوْمِكُمْ هَٰذَا إِنَّا نَسِينَاكُمْ ۖ وَذُوقُوا عَذَابَ الْخُلْدِ بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
तो चूँकि तुम आज के दिन हुज़ूरी को भूले बैठे थे तो अब उसका मज़ा चखो हमने तुमको क़सदन भुला दिया और जैसी जैसी तुम्हारी करतूतें थीं (उनके बदले) अब हमेशा के अज़ाब के मज़े चखो
15إِنَّمَا يُؤْمِنُ بِآيَاتِنَا الَّذِينَ إِذَا ذُكِّرُوا بِهَا خَرُّوا سُجَّدًا وَسَبَّحُوا بِحَمْدِ رَبِّهِمْ وَهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ ۩
हमारी आयतों पर ईमान बस वही लोग लाते हैं कि जिस वक्त उन्हें वह (आयते) याद दिलायी गयीं तो फौरन सजदे में गिर पड़ने और अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह पढ़ने लगे और ये लोग तकब्बुर नही करते (15) (सजदा)
16تَتَجَافَىٰ جُنُوبُهُمْ عَنِ الْمَضَاجِعِ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ خَوْفًا وَطَمَعًا وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
(रात) के वक्त उनके पहलू बिस्तरों से आशना नहीं होते और (अज़ाब के) ख़ौफ और (रहमत की) उम्मीद पर अपने परवरदिगार की इबादत करते हैं और हमने जो कुछ उन्हें अता किया है उसमें से (ख़ुदा की) राह में ख़र्च करते हैं
17فَلَا تَعْلَمُ نَفْسٌ مَّا أُخْفِيَ لَهُم مِّن قُرَّةِ أَعْيُنٍ جَزَاءً بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
उन लोगों की कारगुज़ारियों के बदले में कैसी कैसी ऑंखों की ठन्डक उनके लिए ढकी छिपी रखी है उसको कोई शख़्श जानता ही नहीं
18أَفَمَن كَانَ مُؤْمِنًا كَمَن كَانَ فَاسِقًا ۚ لَّا يَسْتَوُونَ
तो क्या जो शख़्श ईमानदार है उस शख़्श के बराबर हो जाएगा जो बदकार है (हरगिज़ नहीं) ये दोनों बराबर नही हो सकते
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अनुवाद — अस-सजदा 16

सूरा अस-सजदा आयत 16 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (रात) के वक्त उनके पहलू बिस्तरों से आशना नहीं होते…

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Tuesday, August 18, 2026

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