अस-सजदा · 15/30
अनुवाद उच्चारण — अस-सजदा
إِنَّمَا يُؤْمِنُ بِآيَاتِنَا الَّذِينَ إِذَا ذُكِّرُوا بِهَا خَرُّوا سُجَّدًا وَسَبَّحُوا بِحَمْدِ رَبِّهِمْ وَهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ ۩ ۝١٥
Innamaa yu`minu bi aayaatinal lazeena izaa zukkiroo bihaa kharroo sujjadanw wa sabbahoo bihamdi rabbihim wa hum laa yastakbiroon
📖 हिंदी अर्थ
हमारी आयतों पर ईमान बस वही लोग लाते हैं कि जिस वक्त उन्हें वह (आयते) याद दिलायी गयीं तो फौरन सजदे में गिर पड़ने और अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह पढ़ने लगे और ये लोग तकब्बुर नही करते (15) (सजदा)

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • خَرُّوا سُجَّدًا: वे सजदे में गिर पड़ते हैं, अर्थात अल्लाह के आगे झुक जाते हैं।
  • سَبَّحُوا بِحَمْدِ رَبِّهِمْ: वे अपने रब की तस्बीह (पवित्रता का वर्णन) करते हैं और उसकी हम्द (प्रशंसा) करते हैं।
  • لَا يَسْتَكْبِرُونَ: वे घमंड नहीं करते, अर्थात अल्लाह की इबादत से सिर नहीं झुकाते।

तफसीर (व्याख्या):

यह आयत मोमिनों की पहचान बयान करती है। अल्लाह तआला फरमाता है कि हमारी आयतों पर सच्चा ईमान सिर्फ वही लाते हैं जिनके दिल ज़िंदा होते हैं। जब उन्हें हमारी आयतों की नसीहत दी जाती है या क़ुरआन की आयतें पढ़ी जाती हैं, तो वे तुरंत अल्लाह के सामने सजदे में गिर पड़ते हैं। यह सजदा उनके दिल की गहराई से निकलता है, जो अल्लाह के डर और उसकी महानता के एहसास से भरा होता है। वे इस सजदे में अल्लाह की तस्बीह करते हैं और उसकी हम्द बयान करते हैं, यानी उसे हर ऐब से पाक मानते हैं और उसकी नेमतों का शुक्र अदा करते हैं। साथ ही, वे अल्लाह की इबादत और उसके हुक्म के आगे सर झुकाने में कभी घमंड नहीं करते। चाहे उन्हें कोई भी मुकाम हासिल हो, वे खुद को अल्लाह का बंदा समझते हैं और उसकी रज़ा के आगे अपनी इच्छाओं को छोड़ देते हैं।

यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान सिर्फ ज़ुबान का दावा नहीं, बल्कि दिल और अमल का सच्चा रिश्ता है। जब क़ुरआन की आयतें सुनाई दें, तो हमारा दिल पिघल जाए, हमारी आँखें नम हों और हमारा बदन अल्लाह के सामने झुक जाए। यही वह निशानी है जो हमें सच्चे मोमिनों की सूची में शामिल करती है। अल्लाह तआला हमें इस गुण से नवाज़े और हमारे दिलों को अपनी आयतों के लिए नरम कर दे। आमीन।



📜 आयत 13-17 — अस-सजदा

13وَلَوْ شِئْنَا لَآتَيْنَا كُلَّ نَفْسٍ هُدَاهَا وَلَٰكِنْ حَقَّ الْقَوْلُ مِنِّي لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ
और अब तो हमको (क़यामत का)े पूरा पूरा यक़ीन है और (ख़ुदा फरमाएगा कि) अगर हम चाहते तो दुनिया ही में हर शख़्श को (मजबूर करके) राहे रास्त पर ले आते मगर मेरी तरफ से (रोजे अज़ा) ये बात क़रार पा चुकी है कि मै जहन्नुम को जिन्नात और आदमियों से भर दूँगा
14فَذُوقُوا بِمَا نَسِيتُمْ لِقَاءَ يَوْمِكُمْ هَٰذَا إِنَّا نَسِينَاكُمْ ۖ وَذُوقُوا عَذَابَ الْخُلْدِ بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
तो चूँकि तुम आज के दिन हुज़ूरी को भूले बैठे थे तो अब उसका मज़ा चखो हमने तुमको क़सदन भुला दिया और जैसी जैसी तुम्हारी करतूतें थीं (उनके बदले) अब हमेशा के अज़ाब के मज़े चखो
15إِنَّمَا يُؤْمِنُ بِآيَاتِنَا الَّذِينَ إِذَا ذُكِّرُوا بِهَا خَرُّوا سُجَّدًا وَسَبَّحُوا بِحَمْدِ رَبِّهِمْ وَهُمْ لَا يَسْتَكْبِرُونَ ۩
हमारी आयतों पर ईमान बस वही लोग लाते हैं कि जिस वक्त उन्हें वह (आयते) याद दिलायी गयीं तो फौरन सजदे में गिर पड़ने और अपने परवरदिगार की हम्दो सना की तस्बीह पढ़ने लगे और ये लोग तकब्बुर नही करते (15) (सजदा)
16تَتَجَافَىٰ جُنُوبُهُمْ عَنِ الْمَضَاجِعِ يَدْعُونَ رَبَّهُمْ خَوْفًا وَطَمَعًا وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
(रात) के वक्त उनके पहलू बिस्तरों से आशना नहीं होते और (अज़ाब के) ख़ौफ और (रहमत की) उम्मीद पर अपने परवरदिगार की इबादत करते हैं और हमने जो कुछ उन्हें अता किया है उसमें से (ख़ुदा की) राह में ख़र्च करते हैं
17فَلَا تَعْلَمُ نَفْسٌ مَّا أُخْفِيَ لَهُم مِّن قُرَّةِ أَعْيُنٍ جَزَاءً بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
उन लोगों की कारगुज़ारियों के बदले में कैसी कैसी ऑंखों की ठन्डक उनके लिए ढकी छिपी रखी है उसको कोई शख़्श जानता ही नहीं
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अनुवाद — अस-सजदा 15

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Tuesday, August 18, 2026

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