अल-अहज़ाब · 11/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
هُنَالِكَ ابْتُلِيَ الْمُؤْمِنُونَ وَزُلْزِلُوا زِلْزَالًا شَدِيدًا ۝١١
Hunaalikab tuliyal mu`minoona wa zulziloo zilzaalan shadeedaa
📖 हिंदी अर्थ
यहाँ पर मोमिनों का इम्तिहान लिया गया था और ख़ूब अच्छी तरह झिंझोड़े गए थे।

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • هُنَالِكَ: उस समय, उस मौके पर।
  • ابْتُلِيَ: आज़माया गया, परीक्षा में डाला गया।
  • زُلْزِلُوا: उन्हें ज़ोर से हिलाया गया, बुरी तरह विचलित किया गया।
  • زِلْزَالًا شَدِيدًا: बहुत सख्त झटका, अत्यधिक भय और घबराहट।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत ग़ज़वा-ए-अहज़ाब (खंदक की लड़ाई) के उस कठिन दौर का ज़िक्र करती है जब मुसलमान मदीना में घिर गए थे और दुश्मनों के गठजोड़ ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया था। उस वक्त मुसलमानों की हालत इतनी भयावह थी कि उनके दिल दहल गए, और यह परीक्षा अल्लाह की तरफ से इसलिए थी ताकि सच्चे ईमान वाले और मुनाफ़िक़ (दिखावटी मुसलमान) साफ़ तौर पर अलग हो जाएँ।

उस मुश्किल घड़ी में सच्चे मोमिनों को सख्त परीक्षा से गुज़रना पड़ा — उन्हें भूख, डर, ठंड और दुश्मनों के हमले का सामना करना पड़ा। यह परीक्षा इसलिए थी कि उनका ईमान खरा हो जाए, उनका यक़ीन मज़बूत हो और वे अल्लाह पर पूरा भरोसा करना सीखें। जब इंसान मुसीबत में होता है तो उसका असली चेहरा सामने आ जाता है — कौन सच्चा है और कौन झूठा।

इस आयत से हमें सबक मिलता है कि अल्लाह अपने बंदों को मुसीबतों के ज़रिए आज़माता है ताकि उनके दर्जे बुलंद करे और उनके ईमान को निखारे। जो लोग इस परीक्षा में डटे रहे, उन्होंने अल्लाह की मदद का वादा सच पाया और आख़िरकार फतह उन्हीं की हुई। यह हमारे लिए भी एक सबक़ है कि जब ज़िंदगी में मुश्किलें आएँ, तो हमें घबराना नहीं चाहिए, बल्कि यक़ीन रखना चाहिए कि हर मुसीबत के बाद आसानी है, और अल्लाह उन्हीं के साथ है जो सब्र करने वाले हैं।

याद रखिए, यह दुनिया इम्तिहान की जगह है — जो लोग इस इम्तिहान में कामयाब होते हैं, उनके लिए जन्नत की खुशियाँ हैं, और अल्लाह का प्यार और रहमत उन्हें हमेशा के लिए मिलती है।



📜 आयत 9-13 — अल-अहज़ाब

9يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اذْكُرُوا نِعْمَةَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ جَاءَتْكُمْ جُنُودٌ فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِيحًا وَجُنُودًا لَّمْ تَرَوْهَا ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرًا
(ऐ ईमानदारों खुदा की) उन नेअमतों को याद करो जो उसने तुम पर नाज़िल की हैं (जंगे खन्दक में) जब तुम पर (काफिरों का) लशकर (उमड़ के) आ पड़ा तो (हमने तुम्हारी मदद की) उन पर ऑंधी भेजी और (इसके अलावा फरिश्तों का ऐसा लश्कर भेजा) जिसको तुमने देखा तक नहीं और तुम जो कुछ कर रहे थे खुदा उसे खूब देख रहा था
10إِذْ جَاءُوكُم مِّن فَوْقِكُمْ وَمِنْ أَسْفَلَ مِنكُمْ وَإِذْ زَاغَتِ الْأَبْصَارُ وَبَلَغَتِ الْقُلُوبُ الْحَنَاجِرَ وَتَظُنُّونَ بِاللَّهِ الظُّنُونَا
जिस वक्त वह लोग तुम पर तुम्हारे ऊपर से आ पड़े और तुम्हारे नीचे की तरफ से भी पिल गए और जिस वक्त (उनकी कसरत से) तुम्हारी ऑंखें ख़ैरा हो गयीं थी और (ख़ौफ से) कलेजे मुँह को आ गए थे और ख़ुदा पर तरह-तरह के (बुरे) ख्याल करने लगे थे।
11هُنَالِكَ ابْتُلِيَ الْمُؤْمِنُونَ وَزُلْزِلُوا زِلْزَالًا شَدِيدًا
यहाँ पर मोमिनों का इम्तिहान लिया गया था और ख़ूब अच्छी तरह झिंझोड़े गए थे।
12وَإِذْ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ مَّا وَعَدَنَا اللَّهُ وَرَسُولُهُ إِلَّا غُرُورًا
और जिस वक्त मुनाफेक़ीन और वह लोग जिनके दिलों में (कुफ्र का) मरज़ था कहने लगे थे कि खुदा ने और उसके रसूल ने जो हमसे वायदे किए थे वह बस बिल्कुल धोखे की टट्टी था।
13وَإِذْ قَالَت طَّائِفَةٌ مِّنْهُمْ يَا أَهْلَ يَثْرِبَ لَا مُقَامَ لَكُمْ فَارْجِعُوا ۚ وَيَسْتَأْذِنُ فَرِيقٌ مِّنْهُمُ النَّبِيَّ يَقُولُونَ إِنَّ بُيُوتَنَا عَوْرَةٌ وَمَا هِيَ بِعَوْرَةٍ ۖ إِن يُرِيدُونَ إِلَّا فِرَارًا
और अब उनमें का एक गिरोह कहने लगा था कि ऐ मदीने वालों अब (दुश्मन के मुक़ाबलें में ) तुम्हारे कहीं ठिकाना नहीं तो (बेहतर है कि अब भी) पलट चलो और उनमें से कुछ लोग रसूल से (घर लौट जाने की) इजाज़त माँगने लगे थे कि हमारे घर (मर्दों से) बिल्कुल ख़ाली (गैर महफूज़) पड़े हुए हैं - हालाँकि वह ख़ाली (ग़ैर महफूज़) न थे (बल्कि) वह लोग तो (इसी बहाने से) बस भागना चाहते हैं
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अनुवाद — अल-अहज़ाब 11

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Tuesday, August 18, 2026

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