अल-अहज़ाब · 12/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
وَإِذْ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ مَّا وَعَدَنَا اللَّهُ وَرَسُولُهُ إِلَّا غُرُورًا ۝١٢
Wa iz yaqoolul munaafiqoona wallazeena fee quloobihim maradum maa wa`adanal laahu wa Rasooluhooo illaa ghurooraa
📖 हिंदी अर्थ
और जिस वक्त मुनाफेक़ीन और वह लोग जिनके दिलों में (कुफ्र का) मरज़ था कहने लगे थे कि खुदा ने और उसके रसूल ने जो हमसे वायदे किए थे वह बस बिल्कुल धोखे की टट्टी था।

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الْمُنَافِقُونَ – मुनाफ़िक़ (दिखावे के मुसलमान, जो दिल में कुफ़्र रखते हैं)
  • الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ – वे लोग जिनके दिलों में शक और कमज़ोर ईमान की बीमारी है
  • غُرُورًا – धोखा, झूठा वादा, बेकार बात

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस समय का ज़िक्र करती है जब अहज़ाब (समूहों) की जंग में मुसलमान मुश्किल हालात से गुज़र रहे थे। दुश्मनों ने मदीना का घेरा डाल रखा था और मुसलमानों की परीक्षा का वक़्त था। उस वक़्त मुनाफ़िक़ (दिखावे के मुसलमान) और वे लोग जिनके दिलों में शक और ईमान की कमज़ोरी की बीमारी थी, बोल उठे कि "अल्लाह और उसके रसूल ने हमसे जो वादा किया था वह सिर्फ़ धोखा था, झूठ था, बेकार बात थी।"

यानी जब अल्लाह के रसूल ﷺ ने मुसलमानों को फ़तह और ग़लबा (विजय) की ख़ुशख़बरी दी थी, तो इन कमज़ोर ईमान वालों ने उस वादे को झूठा और धोखा समझा। उन्होंने कहा कि हमें जो वादे दिए गए थे वे महज़ धोखा थे, कोई हक़ीक़त नहीं रखते।

यह उन लोगों की कमज़ोर नज़र थी। उन्होंने सिर्फ़ मौजूदा मुश्किल हालात को देखा और अल्लाह के वादे पर भरोसा नहीं किया। जबकि सच्चे मोमिनों का हाल यह था कि उन्होंने अल्लाह के वादे को सच्चा माना और उस पर पक्का यक़ीन रखा, चाहे हालात कितने ही कठिन क्यों न हों।

दावत और नसीहत:

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें सिखाती है कि मुसीबत और परेशानी के वक़्त में भी अल्लाह के वादों पर भरोसा रखना चाहिए। अल्लाह तआला कभी अपना वादा नहीं तोड़ता। जो लोग मुश्किल वक़्त में अल्लाह के वादों पर शक करते हैं, उनके दिलों में ईमान की कमज़ोरी होती है। लेकिन जो लोग पक्के ईमान वाले होते हैं, वे हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखते हैं और अल्लाह उन्हें कभी निराश नहीं करता।

आज भी जब हम पर मुश्किलें आती हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि अल्लाह का वादा सच्चा है। जो लोग अल्लाह और उसके रसूल ﷺ पर सच्चे दिल से भरोसा करते हैं, अल्लाह उन्हें ज़रूर कामयाबी देता है। मुश्किलों के पीछे आसानी छिपी होती है। अल्लाह हमें पक्का ईमान और सच्चा भरोसा अता करे। आमीन।



📜 आयत 10-14 — अल-अहज़ाब

10إِذْ جَاءُوكُم مِّن فَوْقِكُمْ وَمِنْ أَسْفَلَ مِنكُمْ وَإِذْ زَاغَتِ الْأَبْصَارُ وَبَلَغَتِ الْقُلُوبُ الْحَنَاجِرَ وَتَظُنُّونَ بِاللَّهِ الظُّنُونَا
जिस वक्त वह लोग तुम पर तुम्हारे ऊपर से आ पड़े और तुम्हारे नीचे की तरफ से भी पिल गए और जिस वक्त (उनकी कसरत से) तुम्हारी ऑंखें ख़ैरा हो गयीं थी और (ख़ौफ से) कलेजे मुँह को आ गए थे और ख़ुदा पर तरह-तरह के (बुरे) ख्याल करने लगे थे।
11هُنَالِكَ ابْتُلِيَ الْمُؤْمِنُونَ وَزُلْزِلُوا زِلْزَالًا شَدِيدًا
यहाँ पर मोमिनों का इम्तिहान लिया गया था और ख़ूब अच्छी तरह झिंझोड़े गए थे।
12وَإِذْ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ مَّا وَعَدَنَا اللَّهُ وَرَسُولُهُ إِلَّا غُرُورًا
और जिस वक्त मुनाफेक़ीन और वह लोग जिनके दिलों में (कुफ्र का) मरज़ था कहने लगे थे कि खुदा ने और उसके रसूल ने जो हमसे वायदे किए थे वह बस बिल्कुल धोखे की टट्टी था।
13وَإِذْ قَالَت طَّائِفَةٌ مِّنْهُمْ يَا أَهْلَ يَثْرِبَ لَا مُقَامَ لَكُمْ فَارْجِعُوا ۚ وَيَسْتَأْذِنُ فَرِيقٌ مِّنْهُمُ النَّبِيَّ يَقُولُونَ إِنَّ بُيُوتَنَا عَوْرَةٌ وَمَا هِيَ بِعَوْرَةٍ ۖ إِن يُرِيدُونَ إِلَّا فِرَارًا
और अब उनमें का एक गिरोह कहने लगा था कि ऐ मदीने वालों अब (दुश्मन के मुक़ाबलें में ) तुम्हारे कहीं ठिकाना नहीं तो (बेहतर है कि अब भी) पलट चलो और उनमें से कुछ लोग रसूल से (घर लौट जाने की) इजाज़त माँगने लगे थे कि हमारे घर (मर्दों से) बिल्कुल ख़ाली (गैर महफूज़) पड़े हुए हैं - हालाँकि वह ख़ाली (ग़ैर महफूज़) न थे (बल्कि) वह लोग तो (इसी बहाने से) बस भागना चाहते हैं
14وَلَوْ دُخِلَتْ عَلَيْهِم مِّنْ أَقْطَارِهَا ثُمَّ سُئِلُوا الْفِتْنَةَ لَآتَوْهَا وَمَا تَلَبَّثُوا بِهَا إِلَّا يَسِيرًا
और अगर ऐसा ही लश्कर उन लोगों पर मदीने के एतराफ से आ पड़े और उन से फसाद (ख़ाना जंगी) करने की दरख्वास्त की जाए तो ये लोग उसके लिए (फौरन) आ मौजूद हों
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अनुवाद — अल-अहज़ाब 12

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Tuesday, August 18, 2026

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