अल-अहज़ाब · 20/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
يَحْسَبُونَ الْأَحْزَابَ لَمْ يَذْهَبُوا ۖ وَإِن يَأْتِ الْأَحْزَابُ يَوَدُّوا لَوْ أَنَّهُم بَادُونَ فِي الْأَعْرَابِ يَسْأَلُونَ عَنْ أَنبَائِكُمْ ۖ وَلَوْ كَانُوا فِيكُم مَّا قَاتَلُوا إِلَّا قَلِيلًا ۝٢٠
Yahsaboonal Ahzaaba lam yazhaboo wa iny yaatil Ahzaabu yawaddoo law annahum baadoona fil A`raabi yasaloona `an ambaaa`ikum wa law kaanoo feekum maa qaatalooo illaa qaleela
📖 हिंदी अर्थ
(मदीने का मुहासेरा करने वाले चल भी दिए मगर) ये लोग अभी यही समझ रहे हैं कि (काफ़िरों के) लश्कर अभी नहीं गए और अगर कहीं (कुफ्फार का) लश्कर फिर आ पहुँचे तो ये लोग चाहेंगे कि काश वह जंगलों में गँवारों में जा बसते और (वहीं से बैठे बैठे) तुम्हारे हालात दरयाफ्त करते रहते और अगर उनको तुम लोगों में रहना पड़ता तो फ़क़त (पीछा छुड़ाने को) ज़रा ज़हूर (कहीं) लड़ते
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • अहज़ाब: विभिन्न गिरोह, जिन्होंने मिलकर मदीना पर चढ़ाई की थी (कुरैश, ग़तफ़ान, बनी सुलैम आदि)।
  • बादून: जंगल में रहने वाले, बद्दू (ग्रामीण)।
  • अ'राब: रेगिस्तान के रहने वाले, खानाबदोश अरब।
  • अन्बा: समाचार, खबरें।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) की कायरता और कमज़ोर ईमान का पर्दाफाश करती है। जब अहज़ाब (मिले-जुले दुश्मन गिरोह) मदीना पर हमला करके लौट गए, तो ये कमज़ोर ईमान वाले लोग डर के मारे यह समझ ही नहीं पाए कि अल्लाह ने उन्हें शिकस्त दे दी है। उनका दिल इस कदर खौफ़ से भरा था कि उन्हें यक़ीन ही नहीं आ रहा था कि दुश्मन सच में चले गए हैं। उन्हें हर पल यह वहम रहता था कि शायद वे लौट आएँ।

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि अगर ये गिरोह दोबारा लौट भी आएँ, तो ये मुनाफ़िक़ दिल से चाहेंगे कि काश वे शहर में न हों, बल्कि रेगिस्तान में बद्दुओं के बीच जाकर छिप जाएँ, और वहाँ से तुम्हारी खबरें पूछते रहें—कि तुम्हारा क्या हुआ, तुम बचे या मारे गए। यानी वे तुम्हारे साथ खड़े होकर लड़ना नहीं चाहते, बल्कि दूर से तुम्हारे हालात की खबर लेना चाहते हैं।

और अगर वे तुम्हारे साथ लड़ाई के मैदान में होते भी, तो बहुत कम लड़ते—सिर्फ़ दिखावे के लिए, रिया के तौर पर। वे तीर-पत्थर फेंककर या थोड़ी सी कोशिश करके अपना फ़र्ज़ अदा करने का बहाना बना लेते, ताकि लोग उन्हें मुसलमान समझें। असल में उनका दिल जिहाद से खाली था, उनका ईमान कमज़ोर था और उन्हें अल्लाह पर भरोसा नहीं था।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान की मज़बूती ही असली ताक़त है। जिसे अल्लाह पर भरोसा होता है, वह मुश्किल से मुश्किल हालात में भी नहीं घबराता, क्योंकि वह जानता है कि अल्लाह ही मदद करने वाला है। अहज़ाब के दिन मुसलमानों ने सब्र और भरोसे का जो सबक़ दिया, वह हमारे लिए मशाल है। हमें चाहिए कि हम अपने ईमान को मज़बूत करें, अल्लाह पर भरोसा रखें और किसी भी मुसीबत में घबराएँ नहीं। याद रखें, अल्लाह उन्हीं की मदद करता है जो उस पर सच्चे दिल से भरोसा करते हैं। मुनाफ़िक़ों की कायरता का यह ज़िक्र हमें सिखाता है कि हम अपने दिलों को सच्चे ईमान से भरें, ताकि हम अल्लाह की नज़र में सच्चे मुसलमान कहला सकें।

🎧 सुनें

📜 आयत 18-22 — अल-अहज़ाब

18۞ قَدْ يَعْلَمُ اللَّهُ الْمُعَوِّقِينَ مِنكُمْ وَالْقَائِلِينَ لِإِخْوَانِهِمْ هَلُمَّ إِلَيْنَا ۖ وَلَا يَأْتُونَ الْبَأْسَ إِلَّا قَلِيلًا
तुममें से जो लोग (दूसरों को जिहाद से) रोकते हैं खुदा उनको खूब जानता है और (उनको भी खूब जानता है) जो अपने भाई बन्दों से कहते हैं कि हमारे पास चले भी आओ और खुद भी (फक़त पीछा छुड़ाने को लड़ाई के खेत) में बस एक ज़रा सा आकर तुमसे अपनी जान चुराई
19أَشِحَّةً عَلَيْكُمْ ۖ فَإِذَا جَاءَ الْخَوْفُ رَأَيْتَهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ تَدُورُ أَعْيُنُهُمْ كَالَّذِي يُغْشَىٰ عَلَيْهِ مِنَ الْمَوْتِ ۖ فَإِذَا ذَهَبَ الْخَوْفُ سَلَقُوكُم بِأَلْسِنَةٍ حِدَادٍ أَشِحَّةً عَلَى الْخَيْرِ ۚ أُولَٰئِكَ لَمْ يُؤْمِنُوا فَأَحْبَطَ اللَّهُ أَعْمَالَهُمْ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرًا
और चल दिए और जब (उन पर) कोई ख़ौफ (का मौक़ा) आ पड़ा तो देखते हो कि (आस से) तुम्हारी तरफ देखते हैं (और) उनकी ऑंखें इस तरह घूमती हैं जैसे किसी शख्स पर मौत की बेहोशी छा जाए फिर वह ख़ौफ (का मौक़ा) जाता रहा और ईमानदारों की फतेह हुई तो माले (ग़नीमत) पर गिरते पड़ते फौरन तुम पर अपनी तेज़ ज़बानों से ताना कसने लगे ये लोग (शुरू) से ईमान ही नहीं लाए (फक़त ज़बानी जमा ख़र्च थी) तो खुदा ने भी इनका किया कराया सब अकारत कर दिया और ये तो खुदा के वास्ते एक (निहायत) आसान बात थी
20يَحْسَبُونَ الْأَحْزَابَ لَمْ يَذْهَبُوا ۖ وَإِن يَأْتِ الْأَحْزَابُ يَوَدُّوا لَوْ أَنَّهُم بَادُونَ فِي الْأَعْرَابِ يَسْأَلُونَ عَنْ أَنبَائِكُمْ ۖ وَلَوْ كَانُوا فِيكُم مَّا قَاتَلُوا إِلَّا قَلِيلًا
(मदीने का मुहासेरा करने वाले चल भी दिए मगर) ये लोग अभी यही समझ रहे हैं कि (काफ़िरों के) लश्कर अभी नहीं गए और अगर कहीं (कुफ्फार का) लश्कर फिर आ पहुँचे तो ये लोग चाहेंगे कि काश वह जंगलों में गँवारों में जा बसते और (वहीं से बैठे बैठे) तुम्हारे हालात दरयाफ्त करते रहते और अगर उनको तुम लोगों में रहना पड़ता तो फ़क़त (पीछा छुड़ाने को) ज़रा ज़हूर (कहीं) लड़ते
21لَّقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّهَ كَثِيرًا
(मुसलमानों) तुम्हारे वास्ते तो खुद रसूल अल्लाह का (ख़न्दक़ में बैठना) एक अच्छा नमूना था (मगर हाँ यह) उस शख्स के वास्ते है जो खुदा और रोजे आखेरत की उम्मीद रखता हो और खुदा की याद बाकसरत करता हो
22وَلَمَّا رَأَى الْمُؤْمِنُونَ الْأَحْزَابَ قَالُوا هَٰذَا مَا وَعَدَنَا اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَصَدَقَ اللَّهُ وَرَسُولُهُ ۚ وَمَا زَادَهُمْ إِلَّا إِيمَانًا وَتَسْلِيمًا
और जब सच्चे ईमानदारों ने (कुफ्फार के) जमघटों को देखा तो (बेतकल्लुफ़) कहने लगे कि ये वही चीज़ तो है जिसका हम से खुदा ने और उसके रसूल ने वायदा किया था (इसकी परवाह क्या है) और खुदा ने और उसके रसूल ने बिल्कुल ठीक कहा था और (इसके देखने से) उनका ईमानदार और उनकी इताअत और भी ज़िन्दा हो गयी
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अनुवाद — अल-अहज़ाब 20

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Tuesday, August 18, 2026

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