अल-अहज़ाब · 19/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
أَشِحَّةً عَلَيْكُمْ ۖ فَإِذَا جَاءَ الْخَوْفُ رَأَيْتَهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ تَدُورُ أَعْيُنُهُمْ كَالَّذِي يُغْشَىٰ عَلَيْهِ مِنَ الْمَوْتِ ۖ فَإِذَا ذَهَبَ الْخَوْفُ سَلَقُوكُم بِأَلْسِنَةٍ حِدَادٍ أَشِحَّةً عَلَى الْخَيْرِ ۚ أُولَٰئِكَ لَمْ يُؤْمِنُوا فَأَحْبَطَ اللَّهُ أَعْمَالَهُمْ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرًا ۝١٩
Ashihhatan `alaikum faizaa jaaa`al khawfu ra aytahum yanzuroona ilaika tadooru a`yunuhum kallazee yughshaa `alaihi minal mawti fa izaa zahabal khawfu salqookum bi alsinatin hidaadin ashibbatan `alal khayr; ulaaa`ika lam yu`minoo fa ahbatal laahu a`maalahum; wa kaana zaalika `alal laahi yaseeraa
📖 हिंदी अर्थ
और चल दिए और जब (उन पर) कोई ख़ौफ (का मौक़ा) आ पड़ा तो देखते हो कि (आस से) तुम्हारी तरफ देखते हैं (और) उनकी ऑंखें इस तरह घूमती हैं जैसे किसी शख्स पर मौत की बेहोशी छा जाए फिर वह ख़ौफ (का मौक़ा) जाता रहा और ईमानदारों की फतेह हुई तो माले (ग़नीमत) पर गिरते पड़ते फौरन तुम पर अपनी तेज़ ज़बानों से ताना कसने लगे ये लोग (शुरू) से ईमान ही नहीं लाए (फक़त ज़बानी जमा ख़र्च थी) तो खुदा ने भी इनका किया कराया सब अकारत कर दिया और ये तो खुदा के वास्ते एक (निहायत) आसान बात थी
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • अशिह्हतन (أَشِحَّةً): बहुत कंजूस, बुख़्ल करने वाले
  • सलक़ूकुम (سَلَقُوكُم): तुम्हें अपनी ज़ुबान से सताया, तीखी बातें कहकर दुख पहुँचाया
  • हिदाद (حِدَاد): तेज़ और तीखी (ज़ुबानें)
  • अह्बत (أَحْبَطَ): बरबाद कर दिया, नष्ट कर दिया

तफ़सीर (व्याख्या):

ये आयत उन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के हालात बयान कर रही है जो ईमान का दावा तो करते थे, लेकिन उनके दिलों में नफ़रत और बुख़्ल भरा हुआ था। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ये लोग तुम पर बहुत कंजूस हैं — न अपने माल से तुम्हारी मदद करते हैं, न अपनी जान से तुम्हारे साथ जिहाद में शरीक होते हैं, और न ही दिल से तुमसे मुहब्बत रखते हैं।

जब जंग का ख़तरा पैदा होता है और लड़ाई का वक़्त आता है, तो तुम उन्हें देखोगे कि वो डर के मारे तुम्हारी तरफ़ देख रहे हैं, उनकी आँखें इस तरह घूम रही हैं जैसे किसी मरने वाले की आँखें घूमती हैं जिस पर मौत की बेहोशी छा गई हो। उनके दिलों में मौत का ख़ौफ़ इस कदर बैठा हुआ है कि उनकी अक़्ल ठिकाने नहीं रहती और वो हैरान-परेशान हो जाते हैं।

लेकिन जब ख़तरा टल जाता है और जंग ख़त्म हो जाती है, तो यही लोग अपनी तेज़ और तीखी ज़ुबानों से तुम्हें दुखी करते हैं, तुम पर तंज़ और तीखी बातें करते हैं। और जब ग़नीमत (माल-ए-ग़नीमत) की बारी आती है, तो वो बहुत कंजूस और हसद करने वाले बन जाते हैं, कहते हैं कि हम भी तो जंग में मौजूद थे, हमें भी हिस्सा दो।

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि ये लोग असल में ईमान नहीं लाए — उनका ईमान सिर्फ़ ज़ुबानी था, दिली नहीं। इसलिए अल्लाह ने उनके सारे अच्छे कामों को बरबाद कर दिया, क्योंकि उनके अंदर न तो सच्ची नीयत थी और न ही ख़ालिस ईमान। और अल्लाह के लिए ये बहुत आसान था कि वो उनके कर्मों को अकारथ कर दे।

दावती पहलू:

ये आयत हमें सिखाती है कि ईमान सिर्फ़ ज़ुबान का दावा नहीं, बल्कि दिल की गहराई से अल्लाह और उसके रसूल पर यक़ीन करना है। एक सच्चा मुसलमान वो है जो मुश्किल वक़्त में भी अपने भाइयों के साथ खड़ा रहे, अपने माल और जान से मदद करे। अल्लाह तआला उन लोगों के कर्मों को कभी ज़ाइया नहीं करता जो सच्चे दिल से ईमान लाते हैं और अपने अमल को ख़ालिस अल्लाह के लिए करते हैं। हमें चाहिए कि हम अपने दिलों को नफ़ाक़, हसद और बुख़्ल से पाक रखें, क्योंकि ये बीमारियाँ इंसान के सारे अच्छे कामों को बरबाद कर सकती हैं। अल्लाह से दुआ करें कि वो हमें सच्चा ईमान, ख़ालिस नीयत और फ़रावानी (उदारता) अता फ़रमाए।

🎧 सुनें

📜 आयत 17-21 — अल-अहज़ाब

17قُلْ مَن ذَا الَّذِي يَعْصِمُكُم مِّنَ اللَّهِ إِنْ أَرَادَ بِكُمْ سُوءًا أَوْ أَرَادَ بِكُمْ رَحْمَةً ۚ وَلَا يَجِدُونَ لَهُم مِّن دُونِ اللَّهِ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا
(ऐ रसूल) तुम उनसे कह दो कि अगर खुदा तुम्हारे साथ बुराई का इरादा कर बैठे तो तुम्हें उसके (अज़ाब) से कौन ऐसा है जो बचाए या भलाई ही करना चाहे (तो कौन रोक सकता है) और ये लोग खुदा के सिवा न तो किसी को अपना सरपरस्त पाएँगे और न मद्दगार
18۞ قَدْ يَعْلَمُ اللَّهُ الْمُعَوِّقِينَ مِنكُمْ وَالْقَائِلِينَ لِإِخْوَانِهِمْ هَلُمَّ إِلَيْنَا ۖ وَلَا يَأْتُونَ الْبَأْسَ إِلَّا قَلِيلًا
तुममें से जो लोग (दूसरों को जिहाद से) रोकते हैं खुदा उनको खूब जानता है और (उनको भी खूब जानता है) जो अपने भाई बन्दों से कहते हैं कि हमारे पास चले भी आओ और खुद भी (फक़त पीछा छुड़ाने को लड़ाई के खेत) में बस एक ज़रा सा आकर तुमसे अपनी जान चुराई
19أَشِحَّةً عَلَيْكُمْ ۖ فَإِذَا جَاءَ الْخَوْفُ رَأَيْتَهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ تَدُورُ أَعْيُنُهُمْ كَالَّذِي يُغْشَىٰ عَلَيْهِ مِنَ الْمَوْتِ ۖ فَإِذَا ذَهَبَ الْخَوْفُ سَلَقُوكُم بِأَلْسِنَةٍ حِدَادٍ أَشِحَّةً عَلَى الْخَيْرِ ۚ أُولَٰئِكَ لَمْ يُؤْمِنُوا فَأَحْبَطَ اللَّهُ أَعْمَالَهُمْ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرًا
और चल दिए और जब (उन पर) कोई ख़ौफ (का मौक़ा) आ पड़ा तो देखते हो कि (आस से) तुम्हारी तरफ देखते हैं (और) उनकी ऑंखें इस तरह घूमती हैं जैसे किसी शख्स पर मौत की बेहोशी छा जाए फिर वह ख़ौफ (का मौक़ा) जाता रहा और ईमानदारों की फतेह हुई तो माले (ग़नीमत) पर गिरते पड़ते फौरन तुम पर अपनी तेज़ ज़बानों से ताना कसने लगे ये लोग (शुरू) से ईमान ही नहीं लाए (फक़त ज़बानी जमा ख़र्च थी) तो खुदा ने भी इनका किया कराया सब अकारत कर दिया और ये तो खुदा के वास्ते एक (निहायत) आसान बात थी
20يَحْسَبُونَ الْأَحْزَابَ لَمْ يَذْهَبُوا ۖ وَإِن يَأْتِ الْأَحْزَابُ يَوَدُّوا لَوْ أَنَّهُم بَادُونَ فِي الْأَعْرَابِ يَسْأَلُونَ عَنْ أَنبَائِكُمْ ۖ وَلَوْ كَانُوا فِيكُم مَّا قَاتَلُوا إِلَّا قَلِيلًا
(मदीने का मुहासेरा करने वाले चल भी दिए मगर) ये लोग अभी यही समझ रहे हैं कि (काफ़िरों के) लश्कर अभी नहीं गए और अगर कहीं (कुफ्फार का) लश्कर फिर आ पहुँचे तो ये लोग चाहेंगे कि काश वह जंगलों में गँवारों में जा बसते और (वहीं से बैठे बैठे) तुम्हारे हालात दरयाफ्त करते रहते और अगर उनको तुम लोगों में रहना पड़ता तो फ़क़त (पीछा छुड़ाने को) ज़रा ज़हूर (कहीं) लड़ते
21لَّقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّهَ كَثِيرًا
(मुसलमानों) तुम्हारे वास्ते तो खुद रसूल अल्लाह का (ख़न्दक़ में बैठना) एक अच्छा नमूना था (मगर हाँ यह) उस शख्स के वास्ते है जो खुदा और रोजे आखेरत की उम्मीद रखता हो और खुदा की याद बाकसरत करता हो
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अनुवाद — अल-अहज़ाब 19

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Tuesday, August 18, 2026

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