अल-अहज़ाब · 21/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
لَّقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّهَ كَثِيرًا ۝٢١
Laqad kaana lakum fee Rasoolil laahi uswatun hasanatul liman kaana yarjul laaha wal yawmal Aakhira wa azkaral laaha kaseeraa
📖 हिंदी अर्थ
(मुसलमानों) तुम्हारे वास्ते तो खुद रसूल अल्लाह का (ख़न्दक़ में बैठना) एक अच्छा नमूना था (मगर हाँ यह) उस शख्स के वास्ते है जो खुदा और रोजे आखेरत की उम्मीद रखता हो और खुदा की याद बाकसरत करता हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • उस्वतुन हसनह: उत्तम आदर्श, बेहतरीन नमूना, पैरवी के काबिल रास्ता।
  • यरजू: आशा रखता है, उम्मीद करता है (अल्लाह की रहमत और उसके दीन की मदद की)।
  • ज़करल्लाह: अल्लाह का ज़िक्र करना (हर हाल में उसे याद करना, उसकी तस्बीह और हम्द करना)।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ ईमान वालों! अल्लाह तआला ने अपने रसूल ﷺ को तुम्हारे लिए सबसे उत्तम आदर्श बनाकर भेजा है। रसूलुल्लाह ﷺ की हर अदा, हर बात, हर हरकत, हर फैसला और हर हालत — चाहे वो जंग का मैदान हो, घर का कोना हो, या मस्जिद का मिंबर — सब कुछ तुम्हारे लिए एक रोशन राह है। जब अहज़ाब (क़बीलों) की जंग में मुसलमान घबरा गए थे, दिल काँप उठे थे, और मुश्किलें बढ़ गई थीं, तो रसूलुल्लाह ﷺ खुद अपने हाथों से खाई खोदते रहे, अपने जिस्म को मुश्किलों में डाला, और सब्र और भरोसे की मिसाल क़ायम की। उन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं की, बल्कि अल्लाह के दीन की सरबुलंदी के लिए हर क़ुर्बानी दी।

ये आदर्श सिर्फ़ उस वक़्त तक महदूद नहीं था, बल्कि क़यामत तक के लिए है। लेकिन इस आदर्श से फ़ायदा उठाने वाले वही लोग हैं जिनके दिलों में दो चीज़ें हों:

  1. अल्लाह की रहमत और उसके दीन की उम्मीद: यानी जो ये समझता है कि अल्लाह ही सब कुछ देने वाला है, और उसकी मदद और रहमत की आस लगाए रखता है।
  2. आख़िरत का यक़ीन: जो जानता है कि ये दुनिया फ़ानी है, और असली कामयाबी आख़िरत में है, वो रसूल ﷺ की सुन्नत पर चलने में हिचकिचाता नहीं।

और साथ ही, वो अल्लाह का ज़िक्र बहुत ज़्यादा करता है — हर हाल में, खुशी में, ग़म में, तंगी में, फ़राग़त में। जो दिल अल्लाह के ज़िक्र से जुड़ा होता है, उसे रसूल ﷺ की पैरवी में मज़ा आता है, और जो अल्लाह से बेख़बर है, उसे ये राह भारी लगती है।

प्यारे भाइयो और बहनो! ये आयत हमें सिखाती है कि हमारी कामयाबी का राज़ सिर्फ़ और सिर्फ़ रसूलुल्लाह ﷺ की सुन्नत पर अमल करने में है। आज दुनिया की तरक़्क़ी के नाम पर हम जितनी भी राहें अपनाते हैं, वो सब अधूरी हैं। असली राह वही है जो हमारे नबी ﷺ ने दिखाई। उनकी सीरत में हर मुश्किल का हल है, हर बीमारी की दवा है, और हर सवाल का जवाब है। आओ, हम अपनी ज़िंदगी को उनके नक़्शे-क़दम पर चलकर सजाएँ, उनके अख़लाक़ को अपनाएँ, और उनकी मुहब्बत को अपने दिलों में बसाएँ। यही हमारी दुनिया और आख़िरत की कामयाबी है।



📜 आयत 19-23 — अल-अहज़ाब

19أَشِحَّةً عَلَيْكُمْ ۖ فَإِذَا جَاءَ الْخَوْفُ رَأَيْتَهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ تَدُورُ أَعْيُنُهُمْ كَالَّذِي يُغْشَىٰ عَلَيْهِ مِنَ الْمَوْتِ ۖ فَإِذَا ذَهَبَ الْخَوْفُ سَلَقُوكُم بِأَلْسِنَةٍ حِدَادٍ أَشِحَّةً عَلَى الْخَيْرِ ۚ أُولَٰئِكَ لَمْ يُؤْمِنُوا فَأَحْبَطَ اللَّهُ أَعْمَالَهُمْ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرًا
और चल दिए और जब (उन पर) कोई ख़ौफ (का मौक़ा) आ पड़ा तो देखते हो कि (आस से) तुम्हारी तरफ देखते हैं (और) उनकी ऑंखें इस तरह घूमती हैं जैसे किसी शख्स पर मौत की बेहोशी छा जाए फिर वह ख़ौफ (का मौक़ा) जाता रहा और ईमानदारों की फतेह हुई तो माले (ग़नीमत) पर गिरते पड़ते फौरन तुम पर अपनी तेज़ ज़बानों से ताना कसने लगे ये लोग (शुरू) से ईमान ही नहीं लाए (फक़त ज़बानी जमा ख़र्च थी) तो खुदा ने भी इनका किया कराया सब अकारत कर दिया और ये तो खुदा के वास्ते एक (निहायत) आसान बात थी
20يَحْسَبُونَ الْأَحْزَابَ لَمْ يَذْهَبُوا ۖ وَإِن يَأْتِ الْأَحْزَابُ يَوَدُّوا لَوْ أَنَّهُم بَادُونَ فِي الْأَعْرَابِ يَسْأَلُونَ عَنْ أَنبَائِكُمْ ۖ وَلَوْ كَانُوا فِيكُم مَّا قَاتَلُوا إِلَّا قَلِيلًا
(मदीने का मुहासेरा करने वाले चल भी दिए मगर) ये लोग अभी यही समझ रहे हैं कि (काफ़िरों के) लश्कर अभी नहीं गए और अगर कहीं (कुफ्फार का) लश्कर फिर आ पहुँचे तो ये लोग चाहेंगे कि काश वह जंगलों में गँवारों में जा बसते और (वहीं से बैठे बैठे) तुम्हारे हालात दरयाफ्त करते रहते और अगर उनको तुम लोगों में रहना पड़ता तो फ़क़त (पीछा छुड़ाने को) ज़रा ज़हूर (कहीं) लड़ते
21لَّقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَن كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّهَ كَثِيرًا
(मुसलमानों) तुम्हारे वास्ते तो खुद रसूल अल्लाह का (ख़न्दक़ में बैठना) एक अच्छा नमूना था (मगर हाँ यह) उस शख्स के वास्ते है जो खुदा और रोजे आखेरत की उम्मीद रखता हो और खुदा की याद बाकसरत करता हो
22وَلَمَّا رَأَى الْمُؤْمِنُونَ الْأَحْزَابَ قَالُوا هَٰذَا مَا وَعَدَنَا اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَصَدَقَ اللَّهُ وَرَسُولُهُ ۚ وَمَا زَادَهُمْ إِلَّا إِيمَانًا وَتَسْلِيمًا
और जब सच्चे ईमानदारों ने (कुफ्फार के) जमघटों को देखा तो (बेतकल्लुफ़) कहने लगे कि ये वही चीज़ तो है जिसका हम से खुदा ने और उसके रसूल ने वायदा किया था (इसकी परवाह क्या है) और खुदा ने और उसके रसूल ने बिल्कुल ठीक कहा था और (इसके देखने से) उनका ईमानदार और उनकी इताअत और भी ज़िन्दा हो गयी
23مِّنَ الْمُؤْمِنِينَ رِجَالٌ صَدَقُوا مَا عَاهَدُوا اللَّهَ عَلَيْهِ ۖ فَمِنْهُم مَّن قَضَىٰ نَحْبَهُ وَمِنْهُم مَّن يَنتَظِرُ ۖ وَمَا بَدَّلُوا تَبْدِيلًا
ईमानदारों में से कुछ लोग ऐसे भी हैं कि खुदा से उन्होंने (जॉनिसारी का) जो एहद किया था उसे पूरा कर दिखाया ग़रज़ उनमें से बाज़ वह हैं जो (मर कर) अपना वक्त पूरा कर गए और उनमें से बाज़ (हुक्मे खुदा के) मुन्तज़िर बैठे हैं और उन लोगों ने (अपनी बात) ज़रा भी नहीं बदली
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अनुवाद — अल-अहज़ाब 21

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Tuesday, August 18, 2026

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