Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- مُتْرَفُوهَا: उस बस्ती के वे लोग जो सुख-सुविधाओं, धन-दौलत और ऐशो-आराम में डूबे हुए थे, और जिनके पास अधिकार और प्रभुत्व था।
- نَذِيرٍ: डराने वाला, अर्थात वह पैगंबर जो लोगों को अल्लाह के अज़ाब से डराए।
- كَافِرُونَ: इनकार करने वाले, न मानने वाले।
तफसीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में अपने नबी ﷺ को तसल्ली देते हुए बताते हैं कि यह कोई नई बात नहीं है। जब भी हमने किसी बस्ती में कोई नबी या रसूल भेजा, जो लोगों को अल्लाह की तौहीद की ओर बुलाता था और उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराता था, तो उस बस्ती के वही लोग जो सुख-सुविधाओं और ऐशो-आराम में डूबे हुए थे, जिनके पास धन, जाह और सत्ता थी, उन्होंने ही सबसे पहले उस नबी का विरोध किया और कहा: "हम उस चीज़ को नहीं मानते जो आप लेकर आए हो।" यानी उन्होंने स्पष्ट रूप से ईमान लाने से इनकार कर दिया।
यह आयत नबी ﷺ को दिलासा देती है कि हे मुहम्मद! आपके साथ जो कुछ भी आपकी क़ौम के मुतरफ़ (सुखी-समृद्ध) लोग कर रहे हैं, यह कोई नई बात नहीं। यह तो पिछली सारी उम्मतों का तरीका रहा है। जब भी कोई नबी आया, उसकी क़ौम के अमीर और ऐश-परस्त लोगों ने ही उसे नकारा। क्योंकि ये लोग अपनी सुख-सुविधाओं और अपनी मनमानी ज़िंदगी को छोड़ना नहीं चाहते थे। वे सच्चाई से इसलिए दूर भागते थे क्योंकि सच्चाई उनसे यह मांग करती थी कि वे अपने झूठे देवताओं, अपनी बनाई हुई रस्मों और अपनी मनमानी को छोड़ दें, और अल्लाह के आगे झुक जाएं। यह बात उनके घमंड और उनके ऐशो-आराम के खिलाफ थी।
इस आयत में हमारे लिए बड़ी सीख है। यह बताती है कि सच्चाई का विरोध हमेशा उन्हीं लोगों ने किया है जो दुनिया की चकाचौंध और सुख-सुविधाओं में डूबे हुए थे। उन्होंने अपने धन और अपनी सत्ता को ही सब कुछ समझ लिया था। लेकिन अल्लाह की सुन्नत (कायदा) यह रही है कि आखिरकार सच्चाई ही जीतती है। चाहे कितने ही मुतरफ़ (सुखी लोग) विरोध कर लें, अल्लाह अपने नबियों की मदद करता है और उन्हें कामयाब बनाता है।
हमें इससे यह सबक लेना चाहिए कि हम कभी भी सुख-सुविधाओं और दुनिया की चीज़ों को अपने ईमान पर हावी न होने दें। जब सच्चाई हमारे सामने आए, तो हमें उसे कबूल करना चाहिए, चाहे हमारी मनमानी के खिलाफ ही क्यों न हो। याद रखिए, अल्लाह के नबियों का साथ देने वाले हमेशा कामयाब हुए हैं, और उनका विरोध करने वाले हमेशा नाकाम। आज हमें भी उन लोगों में से होना चाहिए जो सच्चाई को कबूल करें, न कि उन मुतरफ़ लोगों में से जो घमंड और ऐशो-आराम की वजह से सच्चाई से मुंह मोड़ लेते हैं। अल्लाह हमें सच्चाई पर चलने की तौफीक दे। आमीन।
📜 आयत 32-36 — सूरा सबा
अनुवाद — सबा 34
सूरा सबा आयत 34 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और हमने किसी बस्ती में कोई डराने वाला पैग़म्बर नहीं…सूरा आयत 34/54 — सूरा सबा سبأ (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा सबा सुनें, सूरा सबा अनुवाद, सूरा सबा mp3, सूरा सबा pdf. आयत 32–36. हिंदी अर्थ: اردو.
सूरा सबा
पवित्र क़ुरआन
Thursday, October 1, 2026
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