अज़-ज़ुमर · 10/75
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुमर
قُلْ يَا عِبَادِ الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا رَبَّكُمْ ۚ لِلَّذِينَ أَحْسَنُوا فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا حَسَنَةٌ ۗ وَأَرْضُ اللَّهِ وَاسِعَةٌ ۗ إِنَّمَا يُوَفَّى الصَّابِرُونَ أَجْرَهُم بِغَيْرِ حِسَابٍ ۝١٠
Qul yaa `ibaadil lazeena aamanut taqoo Rabbakum; lillazeena ahsanoo fee haazihid dunyaa hasanah; wa ardul laahi waasi`ah; innamaa yuwaffas saabiroona ajrahum bighayri hisab
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ मेरे ईमानदार बन्दों अपने परवरदिगार (ही) से डरते रहो (क्योंकि) जिन लोगों ने इस दुनिया में नेकी की उन्हीं के लिए (आख़ेरत में) भलाई है और खुदा की ज़मीन तो कुशादा है (जहाँ इबादत न कर सको उसे छोड़ दो) सब्र करने वालों ही की तो उनका भरपूर बेहिसाब बदला दिया जाएगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • اتَّقُوا: अल्लाह का भय रखो, उसके आदेशों का पालन करो और उसकी मनाही से बचो।
  • أَحْسَنُوا: अच्छे कर्म करने वाले, नेकी करने वाले।
  • حَسَنَةٌ: भलाई, अच्छा बदला, इनाम।
  • أَرْضُ اللَّهِ وَاسِعَةٌ: अल्लाह की धरती विस्तृत है (यानी हिजरत की गुंजाइश है)।
  • يُوَفَّى: पूरा-पूरा दिया जाएगा।
  • الصَّابِرُونَ: सब्र करने वाले, धैर्य रखने वाले।
  • بِغَيْرِ حِسَابٍ: बिना किसी हिसाब के, बिना किसी माप-तौल के, असीमित।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप मेरे उन बंदों से कह दीजिए जो ईमान लाए हैं कि अपने रब का भय रखो, उसकी आज्ञाओं का पालन करो और उसके द्वारा मना की गई चीज़ों से बचो। यही ईमान की पहचान है कि बंदा अपने रब के सामने अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास रखे।

जिन लोगों ने इस दुनिया में नेकी की, अच्छे कर्म किए, अल्लाह की इबादत की और उसकी राह में भलाई के काम किए, उनके लिए दुनिया में भी भलाई है — जैसे स्वास्थ्य, रिज़्क़ में बरकत, मदद और कामयाबी — और आख़िरत में भी उनके लिए सबसे बड़ी भलाई है, और वह है जन्नत। यह अल्लाह का वादा है जो कभी नहीं टूटता।

और अगर किसी जगह पर ईमान वालों को अपने दीन पर अमल करने में रुकावट आए, या उन पर ज़ुल्म हो, तो याद रखें कि अल्लाह की धरती बहुत विस्तृत है। हिजरत करो, किसी दूसरी जगह चले जाओ जहाँ तुम अपने रब की इबादत कर सको और अपने दीन पर स्थिर रह सको। अल्लाह की ज़मीन उसके बंदों के लिए तंग नहीं है, और जो अल्लाह की राह में अपना घर-बार छोड़कर निकलता है, उसे अल्लाह कभी अकेला नहीं छोड़ता।

फिर अल्लाह तआला सब्र करने वालों का ज़िक्र करते हुए फ़रमाता है कि जिन लोगों ने अपने ईमान पर सब्र किया, दीन की मुश्किलों पर धैर्य रखा, अल्लाह की इबादत पर जमे रहे और उसकी राह में आने वाली तकलीफ़ों को सहा, उन्हें उनका पूरा-पूरा अज्र मिलेगा — बिना किसी हिसाब के, बिना किसी माप-तौल के। यानी उनका इनाम इतना अधिक होगा कि उसकी कोई सीमा नहीं होगी, कोई गिनती नहीं होगी। यह अल्लाह की ओर से सब्र करने वालों के लिए एक बहुत बड़ा सम्मान और विशेष उपहार है।

यह आयत हमें सिखाती है कि ईमान का तक़ाज़ा है तक़्वा, नेकी का इनाम अल्लाह के यहाँ ज़रूर मिलता है, और मुश्किलों में सब्र करने वालों के लिए अल्लाह के पास ऐसा अज्र है जिसका कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता। इसलिए हमें चाहिए कि हम अपने रब से डरें, नेकी पर जमे रहें, और हर हाल में सब्र करें — क्योंकि अल्लाह का इनाम सब्र करने वालों के लिए ही है।



📜 आयत 8-12 — अज़-ज़ुमर

8۞ وَإِذَا مَسَّ الْإِنسَانَ ضُرٌّ دَعَا رَبَّهُ مُنِيبًا إِلَيْهِ ثُمَّ إِذَا خَوَّلَهُ نِعْمَةً مِّنْهُ نَسِيَ مَا كَانَ يَدْعُو إِلَيْهِ مِن قَبْلُ وَجَعَلَ لِلَّهِ أَندَادًا لِّيُضِلَّ عَن سَبِيلِهِ ۚ قُلْ تَمَتَّعْ بِكُفْرِكَ قَلِيلًا ۖ إِنَّكَ مِنْ أَصْحَابِ النَّارِ
और आदमी (की हालत तो ये है कि) जब उसको कोई तकलीफ पहुँचती है तो उसी की तरफ रूजू करके अपने परवरदिगार से दुआ करता है (मगर) फिर जब खुदा अपनी तरफ से उसे नेअमत अता फ़रमा देता है तो जिस काम के लिए पहले उससे दुआ करता था उसे भुला देता है और बल्कि खुदा का शरीक बनाने लगता है ताकि (उस ज़रिए से और लोगों को भी) उसकी राह से गुमराह कर दे (ऐ रसूल ऐसे शख्स से) कह दो कि थोड़े दिनों और अपने कुफ्र (की हालत) में चैन कर लो
9أَمَّنْ هُوَ قَانِتٌ آنَاءَ اللَّيْلِ سَاجِدًا وَقَائِمًا يَحْذَرُ الْآخِرَةَ وَيَرْجُو رَحْمَةَ رَبِّهِ ۗ قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَالَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ ۗ إِنَّمَا يَتَذَكَّرُ أُولُو الْأَلْبَابِ
(आख़िर) तू यक़ीनी जहन्नुमियों में होगा क्या जो शख्स रात के अवक़ात में सजदा करके और खड़े-खड़े (खुदा की) इबादत करता हो और आख़ेरत से डरता हो अपने परवरदिगार की रहमत का उम्मीदवार हो (नाशुक्रे) काफिर के बराबर हो सकता है (ऐ रसूल) तुम पूछो तो कि भला कहीं जानने वाले और न जाननेवाले लोग बराबर हो सकते हैं (मगर) नसीहत इबरतें तो बस अक्लमन्द ही लोग मानते हैं
10قُلْ يَا عِبَادِ الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا رَبَّكُمْ ۚ لِلَّذِينَ أَحْسَنُوا فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا حَسَنَةٌ ۗ وَأَرْضُ اللَّهِ وَاسِعَةٌ ۗ إِنَّمَا يُوَفَّى الصَّابِرُونَ أَجْرَهُم بِغَيْرِ حِسَابٍ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ मेरे ईमानदार बन्दों अपने परवरदिगार (ही) से डरते रहो (क्योंकि) जिन लोगों ने इस दुनिया में नेकी की उन्हीं के लिए (आख़ेरत में) भलाई है और खुदा की ज़मीन तो कुशादा है (जहाँ इबादत न कर सको उसे छोड़ दो) सब्र करने वालों ही की तो उनका भरपूर बेहिसाब बदला दिया जाएगा
11قُلْ إِنِّي أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ اللَّهَ مُخْلِصًا لَّهُ الدِّينَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मुझे तो ये हुक्म दिया गया है कि मैं इबादत को उसके लिए ख़ास करके खुदा ही की बन्दगी करो
12وَأُمِرْتُ لِأَنْ أَكُونَ أَوَّلَ الْمُسْلِمِينَ
और मुझे तो ये हुक्म दिया गया है कि मैं सबसे पहल मुसलमान हूँ
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अनुवाद — अज़-ज़ुमर 10

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Tuesday, August 18, 2026

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