अज़-ज़ुमर · 48/75
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुमर
وَبَدَا لَهُمْ سَيِّئَاتُ مَا كَسَبُوا وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ ۝٤٨
Wa badaa lahum saiyiaatu maa kasaboo wa haaqa bihim maa kaanoo bihee yastahzi`oon
📖 हिंदी अर्थ
और जो बदकिरदारियाँ उन लोगों ने की थीं (वह सब) उनके सामने खुल जाएँगीं और जिस (अज़ाब) पर यह लोग क़हक़हे लगाते थे वह उन्हें घेरेगा
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • وَبَدَا لَهُمْ – और उनके सामने प्रकट हो गया
  • سَيِّئَاتُ مَا كَسَبُوا – उन कर्मों की बुराइयाँ (सज़ा) जो उन्होंने कमाई थीं
  • وَحَاقَ بِهِمْ – और उन्हें घेर लिया
  • مَا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ – वह (अज़ाब) जिसका वे मज़ाक उड़ाया करते थे

तफ़सीर:

यह आयत उन लोगों के उस भयानक हालात का वर्णन कर रही है जिन्होंने दुनिया में अल्लाह के साथ कुफ़्र किया, उसके रसूलों को झुठलाया और आख़िरत के अज़ाब का मज़ाक उड़ाया। जब क़यामत का दिन आएगा और उनके आमाल के पन्ने खोले जाएँगे, तो उनके सामने उनके बुरे कर्मों की सज़ा साफ़-साफ़ प्रकट हो जाएगी। वे देखेंगे कि जो कुछ उन्होंने दुनिया में किया था—शिर्क, नाफ़रमानी, ज़ुल्म, और अल्लाह के दीन का मज़ाक—उसका पूरा-पूरा बदला उनके सामने मौजूद है।

फिर अल्लाह फ़रमाता है कि वह अज़ाब, जिसके बारे में उन्हें दुनिया में डराया जाता था और वे उसका मज़ाक उड़ाते थे, अब उन्हें चारों तरफ से घेर लेगा। कोई रास्ता नहीं बचेगा, कोई भागने की जगह नहीं होगी, और न ही कोई मददगार होगा। यह वही अज़ाब है जिसे वे दुनिया में "मज़ाक" समझते थे, लेकिन आज वह उनके सामने हक़ीक़त बनकर खड़ा है।

यह आयत हमें एक बहुत बड़ी सीख देती है—कि हम अपने कर्मों से कभी बेख़बर न हों। अल्लाह ने हमें दुनिया में मौका दिया है कि हम अपने आमाल सुधार लें, तौबा कर लें, और उस रास्ते पर चलें जो उसकी रज़ा तक पहुँचाता है। क़यामत का दिन कोई मज़ाक नहीं है, बल्कि एक सच्चाई है जिस पर ईमान लाना और उसकी तैयारी करना ही असली समझदारी है।

अल्लाह हमें उन लोगों में से न बनाए जो आख़िरत का मज़ाक उड़ाते हैं, बल्कि हमें उन बंदों में शामिल करे जो उसके अज़ाब से डरते हैं, उसकी रहमत की उम्मीद रखते हैं, और अपने जीवन को उसकी इताअत में गुज़ारते हैं। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 46-50 — अज़-ज़ुमर

46قُلِ اللَّهُمَّ فَاطِرَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ عَالِمَ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ أَنتَ تَحْكُمُ بَيْنَ عِبَادِكَ فِي مَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि ऐ ख़ुदा (ऐ) सारे आसमान और ज़मीन पैदा करने वाले, ज़ाहिर व बातिन के जानने वाले हक़ बातों में तेरे बन्दे आपस में झगड़ रहे हैं तू ही उनके दरमियान फैसला कर देगा
47وَلَوْ أَنَّ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا مَا فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا وَمِثْلَهُ مَعَهُ لَافْتَدَوْا بِهِ مِن سُوءِ الْعَذَابِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۚ وَبَدَا لَهُم مِّنَ اللَّهِ مَا لَمْ يَكُونُوا يَحْتَسِبُونَ
और अगर नाफरमानों के पास रूए ज़मीन की सारी काएनात मिल जाएग बल्कि उनके साथ उतनी ही और भी हो तो क़यामत के दिन ये लोग यक़ीनन सख्त अज़ाब का फ़िदया दे निकलें (और अपना छुटकारा कराना चाहें) और (उस वक्त) उनके सामने ख़ुदा की तरफ से वह बात पेश आएगी जिसका उन्हें वहम व गुमान भी न था
48وَبَدَا لَهُمْ سَيِّئَاتُ مَا كَسَبُوا وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
और जो बदकिरदारियाँ उन लोगों ने की थीं (वह सब) उनके सामने खुल जाएँगीं और जिस (अज़ाब) पर यह लोग क़हक़हे लगाते थे वह उन्हें घेरेगा
49فَإِذَا مَسَّ الْإِنسَانَ ضُرٌّ دَعَانَا ثُمَّ إِذَا خَوَّلْنَاهُ نِعْمَةً مِّنَّا قَالَ إِنَّمَا أُوتِيتُهُ عَلَىٰ عِلْمٍ ۚ بَلْ هِيَ فِتْنَةٌ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
इन्सान को तो जब कोई बुराई छू गयी बस वह लगा हमसे दुआएँ माँगने, फिर जब हम उसे अपनी तरफ़ से कोई नेअमत अता करते हैं तो कहने लगता है कि ये तो सिर्फ (मेरे) इल्म के ज़ोर से मुझे दिया गया है (ये ग़लती है) बल्कि ये तो एक आज़माइश है मगर उन में के अक्सर नहीं जानते हैं
50قَدْ قَالَهَا الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ فَمَا أَغْنَىٰ عَنْهُم مَّا كَانُوا يَكْسِبُونَ
जो लोग उनसे पहले थे वह भी ऐसी बातें बका करते थे फिर (जब हमारा अज़ाब आया) तो उनकी कारस्तानियाँ उनके कुछ भी काम न आई
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अनुवाद — अज़-ज़ुमर 48

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Tuesday, August 18, 2026

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