अन-निसा · 4/176
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-निसा
وَآتُوا النِّسَاءَ صَدُقَاتِهِنَّ نِحْلَةً ۚ فَإِن طِبْنَ لَكُمْ عَن شَيْءٍ مِّنْهُ نَفْسًا فَكُلُوهُ هَنِيئًا مَّرِيئًا ۝٤
Wa aatun nisaaa`a sadu qaatihinna nihlah; fa in tibna lakum `an shai`im minhu nafsan fakuloohu hanee`am mareee`aa
📖 हिंदी अर्थ
और औरतों को उनके महर ख़ुशी ख़ुशी दे डालो फिर अगर वह ख़ुशी ख़ुशी तुम्हें कुछ छोड़ दे तो शौक़ से नौशे जान खाओ पियो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • صَدُقَاتِهِنَّ (सदुक़ातिहिन्न): उनका महर (विवाह में दिया जाने वाला अनिवार्य उपहार)।
  • نِحْلَةً (निह्लतन): एक अनिवार्य और ख़ुशी-ख़ुशी दी जाने वाली भेंट, जो बिना किसी शर्त या बदले के हो।
  • طِبْنَ (तिब्न): वे (औरतें) ख़ुश हों या उनका दिल राज़ी हो।
  • نَفْسًا (नफ़्सन): अपनी पूरी रज़ामंदी और ख़ुशी से।
  • هَنِيئًا (हनीअन): जो आराम से और बिना किसी परेशानी के खाया जाए।
  • مَرِيئًا (मरीअन): जो गले से उतर जाए और बाद में कोई तकलीफ़ या पछतावा न हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला मुसलमानों को हुक्म देता है कि जब विवाह हो जाए, तो औरतों को उनका महर (मेहर) पूरा-पूरा दो। यह महर कोई एहसान या बाद में अदा करने वाली चीज़ नहीं है, बल्कि यह एक अनिवार्य और नियत किया गया हक़ है, जो ख़ुशी और खुले दिल से दिया जाना चाहिए। यह अल्लाह की तरफ़ से एक फ़र्ज़ है, जिसे अदा करना हर पति पर लाज़िम है।

इसके बाद अल्लाह फ़रमाता है कि अगर औरतें अपनी ख़ुशी और रज़ामंदी से, बिना किसी दबाव या डर के, महर का कुछ हिस्सा या पूरा महर अपने पति को दे दें या माफ़ कर दें, तो पति के लिए उसे लेना और उसमें से खाना-पीना या ख़र्च करना हलाल और पाक है। यह ऐसा माल है जिसमें कोई गंदगी या हराम नहीं है, और इसे इस्तेमाल करने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन यह शर्त है कि औरत का दिल सच्चे दिल से राज़ी हो, न कि वह किसी डर या शर्मिंदगी की वजह से ऐसा करे।


फ़ायदे (सीख):

  1. इस आयत से पता चलता है कि इस्लाम ने औरतों को आर्थिक अधिकार दिए हैं, और महर उनका निजी हक़ है, जिसे बिना किसी कमी के अदा करना ज़रूरी है। यह औरत की इज़्ज़त और उसके अस्तित्व को मान्यता देता है।
  2. इस्लाम में हर लेन-देन और रिश्ते में साफ़-सफ़ाई और खुले दिल की तालीम दी गई है। महर को "निह्ला" (ख़ुशी से दी जाने वाली भेंट) कहना बताता है कि इसे अदा करते समय नेक नीयत और मुहब्बत होनी चाहिए।
  3. यह आयत पतियों को सिखाती है कि अगर पत्नी अपनी मर्ज़ी से कुछ दे, तो उसे लेने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन कभी भी औरत पर दबाव नहीं डालना चाहिए। यह इस्लाम का वह नाज़ुक पहलू है जो औरत के दिल की रज़ामंदी को अहमियत देता है।
  4. इस आयत से यह भी सीख मिलती है कि रिश्तों में मुहब्बत और आपसी राज़ी-ख़ुशी का होना कितना ज़रूरी है। अल्लाह ने जहाँ हुक्म दिया, वहीं दिल की नरमी और खुशी को भी शर्त बनाया, ताकि घरों में मुहब्बत और भरोसा बना रहे।
  5. यह आयत मुसलमानों को यह भी सिखाती है कि जो माल हलाल और पाक हो, उसे इस्तेमाल करने में कोई बुराई नहीं, बल्कि वह उनके लिए बरकत वाला होता है। जबकि हराम माल दिल और ज़िंदगी दोनों को तबाह कर देता है।


📜 आयत 2-6 — सूरा अन-निसा

2وَآتُوا الْيَتَامَىٰ أَمْوَالَهُمْ ۖ وَلَا تَتَبَدَّلُوا الْخَبِيثَ بِالطَّيِّبِ ۖ وَلَا تَأْكُلُوا أَمْوَالَهُمْ إِلَىٰ أَمْوَالِكُمْ ۚ إِنَّهُ كَانَ حُوبًا كَبِيرًا
और यतीमों को उनके माल दे दो और बुरी चीज़ (माले हराम) को भली चीज़ (माले हलाल) के बदले में न लो और उनके माल अपने मालों में मिलाकर न चख जाओ क्योंकि ये बहुत बड़ा गुनाह है
3وَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا تُقْسِطُوا فِي الْيَتَامَىٰ فَانكِحُوا مَا طَابَ لَكُم مِّنَ النِّسَاءِ مَثْنَىٰ وَثُلَاثَ وَرُبَاعَ ۖ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا تَعْدِلُوا فَوَاحِدَةً أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰ أَلَّا تَعُولُوا
और अगर तुमको अन्देशा हो कि (निकाह करके) तुम यतीम लड़कियों (की रखरखाव) में इन्साफ न कर सकोगे तो और औरतों में अपनी मर्ज़ी के मवाफ़िक दो दो और तीन तीन और चार चार निकाह करो (फिर अगर तुम्हें इसका) अन्देशा हो कि (मुततइद) बीवियों में (भी) इन्साफ न कर सकोगे तो एक ही पर इक्तेफ़ा करो या जो (लोंडी) तुम्हारी ज़र ख़रीद हो (उसी पर क़नाअत करो) ये तदबीर बेइन्साफ़ी न करने की बहुत क़रीने क़यास है
4وَآتُوا النِّسَاءَ صَدُقَاتِهِنَّ نِحْلَةً ۚ فَإِن طِبْنَ لَكُمْ عَن شَيْءٍ مِّنْهُ نَفْسًا فَكُلُوهُ هَنِيئًا مَّرِيئًا
और औरतों को उनके महर ख़ुशी ख़ुशी दे डालो फिर अगर वह ख़ुशी ख़ुशी तुम्हें कुछ छोड़ दे तो शौक़ से नौशे जान खाओ पियो
5وَلَا تُؤْتُوا السُّفَهَاءَ أَمْوَالَكُمُ الَّتِي جَعَلَ اللَّهُ لَكُمْ قِيَامًا وَارْزُقُوهُمْ فِيهَا وَاكْسُوهُمْ وَقُولُوا لَهُمْ قَوْلًا مَّعْرُوفًا
और अपने वह माल जिनपर ख़ुदा ने तुम्हारी गुज़र न क़रार दी है बेवकूफ़ों (ना समझ यतीम) को न दे बैठो हॉ उसमें से उन्हें खिलाओ और उनको पहनाओ (तो मज़ाएक़ा नहीं) और उनसे (शौक़ से) अच्छी तरह बात करो
6وَابْتَلُوا الْيَتَامَىٰ حَتَّىٰ إِذَا بَلَغُوا النِّكَاحَ فَإِنْ آنَسْتُم مِّنْهُمْ رُشْدًا فَادْفَعُوا إِلَيْهِمْ أَمْوَالَهُمْ ۖ وَلَا تَأْكُلُوهَا إِسْرَافًا وَبِدَارًا أَن يَكْبَرُوا ۚ وَمَن كَانَ غَنِيًّا فَلْيَسْتَعْفِفْ ۖ وَمَن كَانَ فَقِيرًا فَلْيَأْكُلْ بِالْمَعْرُوفِ ۚ فَإِذَا دَفَعْتُمْ إِلَيْهِمْ أَمْوَالَهُمْ فَأَشْهِدُوا عَلَيْهِمْ ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ حَسِيبًا
और यतीमों को कारोबार में लगाए रहो यहॉ तक के ब्याहने के क़ाबिल हों फिर उस वक्त तुम उन्हे (एक महीने का ख़र्च) उनके हाथ से कराके अगर होशियार पाओ तो उनका माल उनके हवाले कर दो और (ख़बरदार) ऐसा न करना कि इस ख़ौफ़ से कि कहीं ये बड़े हो जाएंगे फ़ुज़ूल ख़र्ची करके झटपट उनका माल चट कर जाओ और जो (जो वली या सरपरस्त) दौलतमन्द हो तो वह (माले यतीम अपने ख़र्च में लाने से) बचता रहे और (हॉ) जो मोहताज हो वह अलबत्ता (वाजिबी) दस्तूर के मुताबिक़ खा सकता है पस जब उनके माल उनके हवाले करने लगो तो लोगों को उनका गवाह बना लो और (यूं तो) हिसाब लेने को ख़ुदा काफ़ी ही है
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अनुवाद — अन-निसा 4

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Tuesday, September 8, 2026

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