अन-निसा · 3/176
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-निसा
وَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا تُقْسِطُوا فِي الْيَتَامَىٰ فَانكِحُوا مَا طَابَ لَكُم مِّنَ النِّسَاءِ مَثْنَىٰ وَثُلَاثَ وَرُبَاعَ ۖ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا تَعْدِلُوا فَوَاحِدَةً أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰ أَلَّا تَعُولُوا ۝٣
Wa in khiftum allaa tuqsitoo fil yataamaa fankihoo maa taaba lakum minan nisaaa`i masnaa wa sulaasa wa rubaa`a fa`in khiftum allaa ta`diloo fawaahidatan aw maa malakat aimaanukum; zaalika adnaaa allaa ta`ooloo
📖 हिंदी अर्थ
और अगर तुमको अन्देशा हो कि (निकाह करके) तुम यतीम लड़कियों (की रखरखाव) में इन्साफ न कर सकोगे तो और औरतों में अपनी मर्ज़ी के मवाफ़िक दो दो और तीन तीन और चार चार निकाह करो (फिर अगर तुम्हें इसका) अन्देशा हो कि (मुततइद) बीवियों में (भी) इन्साफ न कर सकोगे तो एक ही पर इक्तेफ़ा करो या जो (लोंडी) तुम्हारी ज़र ख़रीद हो (उसी पर क़नाअत करो) ये तदबीर बेइन्साफ़ी न करने की बहुत क़रीने क़यास है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • تُقْسِطُوا: न्याय करो, इंसाफ़ करो।
  • مَثْنَى: दो-दो।
  • ثُلَاث: तीन-तीन।
  • رُبَاع: चार-चार।
  • مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ: वे दासियाँ जो तुम्हारे स्वामित्व में हों।
  • تَعُولُوا: झुक जाओ, ज़ुल्म करो, या (एक रिवायत के अनुसार) फ़क़ीर हो जाओ।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों को संबोधित करती है जो यतीम लड़कियों के संरक्षक (वली) हैं। अगर तुम्हें डर हो कि उन यतीम लड़कियों से विवाह करके तुम उनके साथ न्याय नहीं कर पाओगे—चाहे उनका महर (दहेज) कम करके देना हो या उनके साथ अच्छा व्यवहार न कर पाना हो—तो उनसे विवाह करने से बचो। इसके बजाय, जो औरतें तुम्हें हलाल और पसंद हों, उनमें से दो, तीन या चार से विवाह कर लो। लेकिन अगर तुम्हें डर हो कि कई पत्नियों के बीच न्याय (बराबरी) नहीं कर पाओगे—चाहे खर्च, रातों की बारी या व्यवहार में—तो केवल एक ही पत्नी से विवाह करो, या अपनी दासियों (जो तुम्हारे स्वामित्व में हों) से काम चलाओ, क्योंकि दासियों के लिए वह सारे अधिकार और शर्तें लागू नहीं होतीं जो आज़ाद पत्नियों के लिए होती हैं। यह आदेश (यतीमों के मामले में न्याय की ताकीद और एक पत्नी या दासियों पर रुक जाना) इस बात के ज़्यादा करीब है कि तुम ज़ुल्म और झुकाव से बच जाओ, और न ही तुम पर बोझ पड़े।

फ़ायदे (सबक):

  1. यह आयत यतीमों के साथ न्याय और उनके अधिकारों की रक्षा की बहुत बड़ी ताकीद करती है, और यह सिखाती है कि कमज़ोर और बेसहारा लोगों के साथ कभी धोखा नहीं करना चाहिए।
  2. इस्लाम ने बहुविवाह की इजाज़त दी है, लेकिन उसे भी न्याय की शर्त से बाँधा है—यह दिखाता है कि इस्लाम हर मामले में इंसाफ़ को सबसे ऊपर रखता है।
  3. अगर किसी को डर हो कि वह न्याय नहीं कर पाएगा, तो उसके लिए एक पत्नी पर रुक जाना बेहतर है—यह आसानी और सहूलत का रास्ता है, न कि मुश्किल।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि शादी जैसे पवित्र रिश्ते में भी दिल की सफाई, न्याय और ज़िम्मेदारी का एहसास होना चाहिए, ताकि घर में सुकून और मुहब्बत बनी रहे।
  5. इस्लाम हर उस चीज़ से रोकता है जो ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी की तरफ ले जाए, और हर उस चीज़ की तरफ बुलाता है जो इंसाफ़ और भलाई की तरफ ले जाए।


📜 आयत 1-5 — सूरा अन-निसा

1يَا أَيُّهَا النَّاسُ اتَّقُوا رَبَّكُمُ الَّذِي خَلَقَكُم مِّن نَّفْسٍ وَاحِدَةٍ وَخَلَقَ مِنْهَا زَوْجَهَا وَبَثَّ مِنْهُمَا رِجَالًا كَثِيرًا وَنِسَاءً ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ الَّذِي تَسَاءَلُونَ بِهِ وَالْأَرْحَامَ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ عَلَيْكُمْ رَقِيبًا
ऐ लोगों अपने पालने वाले से डरो जिसने तुम सबको (सिर्फ) एक शख्स से पैदा किया और (वह इस तरह कि पहले) उनकी बाकी मिट्टी से उनकी बीवी (हव्वा) को पैदा किया और (सिर्फ़) उन्हीं दो (मियॉ बीवी) से बहुत से मर्द और औरतें दुनिया में फैला दिये और उस ख़ुदा से डरो जिसके वसीले से आपस में एक दूसरे से सवाल करते हो और क़तए रहम से भी डरो बेशक ख़ुदा तुम्हारी देखभाल करने वाला है
2وَآتُوا الْيَتَامَىٰ أَمْوَالَهُمْ ۖ وَلَا تَتَبَدَّلُوا الْخَبِيثَ بِالطَّيِّبِ ۖ وَلَا تَأْكُلُوا أَمْوَالَهُمْ إِلَىٰ أَمْوَالِكُمْ ۚ إِنَّهُ كَانَ حُوبًا كَبِيرًا
और यतीमों को उनके माल दे दो और बुरी चीज़ (माले हराम) को भली चीज़ (माले हलाल) के बदले में न लो और उनके माल अपने मालों में मिलाकर न चख जाओ क्योंकि ये बहुत बड़ा गुनाह है
3وَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا تُقْسِطُوا فِي الْيَتَامَىٰ فَانكِحُوا مَا طَابَ لَكُم مِّنَ النِّسَاءِ مَثْنَىٰ وَثُلَاثَ وَرُبَاعَ ۖ فَإِنْ خِفْتُمْ أَلَّا تَعْدِلُوا فَوَاحِدَةً أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَانُكُمْ ۚ ذَٰلِكَ أَدْنَىٰ أَلَّا تَعُولُوا
और अगर तुमको अन्देशा हो कि (निकाह करके) तुम यतीम लड़कियों (की रखरखाव) में इन्साफ न कर सकोगे तो और औरतों में अपनी मर्ज़ी के मवाफ़िक दो दो और तीन तीन और चार चार निकाह करो (फिर अगर तुम्हें इसका) अन्देशा हो कि (मुततइद) बीवियों में (भी) इन्साफ न कर सकोगे तो एक ही पर इक्तेफ़ा करो या जो (लोंडी) तुम्हारी ज़र ख़रीद हो (उसी पर क़नाअत करो) ये तदबीर बेइन्साफ़ी न करने की बहुत क़रीने क़यास है
4وَآتُوا النِّسَاءَ صَدُقَاتِهِنَّ نِحْلَةً ۚ فَإِن طِبْنَ لَكُمْ عَن شَيْءٍ مِّنْهُ نَفْسًا فَكُلُوهُ هَنِيئًا مَّرِيئًا
और औरतों को उनके महर ख़ुशी ख़ुशी दे डालो फिर अगर वह ख़ुशी ख़ुशी तुम्हें कुछ छोड़ दे तो शौक़ से नौशे जान खाओ पियो
5وَلَا تُؤْتُوا السُّفَهَاءَ أَمْوَالَكُمُ الَّتِي جَعَلَ اللَّهُ لَكُمْ قِيَامًا وَارْزُقُوهُمْ فِيهَا وَاكْسُوهُمْ وَقُولُوا لَهُمْ قَوْلًا مَّعْرُوفًا
और अपने वह माल जिनपर ख़ुदा ने तुम्हारी गुज़र न क़रार दी है बेवकूफ़ों (ना समझ यतीम) को न दे बैठो हॉ उसमें से उन्हें खिलाओ और उनको पहनाओ (तो मज़ाएक़ा नहीं) और उनसे (शौक़ से) अच्छी तरह बात करो
अन-निसाकुरान सूची
176आयत
मदनीअवतरण स्थान
3आयत

अनुवाद — अन-निसा 3

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Monday, September 28, 2026

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