अश-शूरा · 38/53
अनुवाद उच्चारण — अश-शूरा
وَالَّذِينَ اسْتَجَابُوا لِرَبِّهِمْ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَأَمْرُهُمْ شُورَىٰ بَيْنَهُمْ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ ۝٣٨
Wallazeenas tajaaboo li Rabbhim wa aqaamus Salaata wa amruhum shooraa bainahum wa mimmaa razaqnaahum yunfiqoon
📖 हिंदी अर्थ
और जो अपने परवरदिगार का हुक्म मानते हैं और नमाज़ पढ़ते हैं और उनके कुल काम आपस के मशवरे से होते हैं और जो कुछ हमने उन्हें अता किया है उसमें से (राहे ख़ुदा में) ख़र्च करते हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • اسْتَجَابُوا: उत्तर दिया, स्वीकार किया
  • أَقَامُوا الصَّلَاةَ: नमाज़ को पूरी तरह से क़ायम किया
  • شُورَىٰ: आपसी सलाह-मशविरा
  • يُنفِقُونَ: खर्च करते हैं

तफ़सीर:

ये आयत उन मोमिनों के खूबसूरत गुणों का वर्णन करती है जिन्हें अल्लाह ने अपनी रहमत से नवाज़ा है। ये वो लोग हैं जिन्होंने अपने रब की पुकार पर लब्बैक कहा—जब अल्लाह ने उन्हें अपनी तौहीद (एकता) और इताअत (आज्ञाकारिता) की तरफ बुलाया, तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के उसे क़बूल किया। उन्होंने अपने जीवन को अल्लाह की रज़ा के ताबे कर दिया और हर उस चीज़ से परहेज़ किया जिससे अल्लाह ने रोका है।

फिर अल्लाह उनके दूसरे गुण का ज़िक्र करता है—वो नमाज़ को पूरी तरह से क़ायम करते हैं। यानी सिर्फ़ नमाज़ पढ़ना ही नहीं, बल्कि उसकी सभी शर्तों, अरकान और आदाब का पूरा ख़याल रखते हुए, वक़्त पर, बाजमात या अकेले, उसे अदा करते हैं। नमाज़ उनके दिलों को पाक करती है और उन्हें बुराई से रोकती है।

तीसरा गुण जो अल्लाह ने बयान किया है वो है "और उनका मामला आपसी सलाह से चलता है"—यानी वे अपने मामलों में अकेले फ़ैसला नहीं करते, बल्कि आपस में मशविरा करते हैं। चाहे वो दुनियावी मामला हो या दीनी, वे एक-दूसरे की राय को अहमियत देते हैं। ये उनकी शूरा (सलाह) की आदत है जो उन्हें अहंकार और अकेले फ़ैसले करने की बुराई से बचाती है। ये गुण उनके समाज में भाईचारे, एकता और आपसी मोहब्बत को बढ़ाता है।

चौथा गुण—"और जो कुछ हमने उन्हें रोज़ी दी है, उसमें से खर्च करते हैं"—वे अल्लाह की दी हुई नेमतों में से दूसरों के हक़ निकालते हैं। यानी ज़कात अदा करते हैं, रिश्तेदारों पर खर्च करते हैं, ग़रीबों और मिस्कीनों की मदद करते हैं, और अल्लाह की राह में हर नेक काम के लिए अपना माल खर्च करते हैं। वे इस बात को समझते हैं कि माल अल्लाह की अमानत है और उसमें दूसरों का भी हक़ है।

ये चार गुण—अल्लाह की इताअत, नमाज़ की पाबंदी, आपसी मशविरा और फ़ियसबीलिल्लाह खर्च—मिलकर एक मुकम्मल मोमिन की पहचान बनाते हैं। ये वो लोग हैं जो न सिर्फ़ अपने रब से जुड़े हैं बल्कि अपने बंदों से भी भलाई का सुलूक करते हैं।

प्यारे भाइयो और बहनों! ये आयत हमें सिखाती है कि सच्चा ईमान सिर्फ़ ज़ुबान का दावा नहीं, बल्कि अमल का तक़ाज़ा है। अगर हम इन चार गुणों को अपनी ज़िंदगी में अपना लें, तो हमारी ज़िंदगी में बरकत आएगी, हमारे समाज में मुहब्बत और इत्तेहाद पैदा होगा, और अल्लाह की रहमत हमारे साथ होगी। अल्लाह हमें इन गुणों पर अमल करने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 36-40 — अश-शूरा

36فَمَا أُوتِيتُم مِّن شَيْءٍ فَمَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۖ وَمَا عِندَ اللَّهِ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ لِلَّذِينَ آمَنُوا وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ
(लोगों) तुमको जो कुछ (माल) दिया गया है वह दुनिया की ज़िन्दगी का (चन्द रोज़) साज़ोसामान है और जो कुछ ख़ुदा के यहाँ है वह कहीं बेहतर और पायदार है (मगर ये) ख़ास उन ही लोगों के लिए है जो ईमान लाए और अपने परवरदिगार पर भरोसा रखते हैं
37وَالَّذِينَ يَجْتَنِبُونَ كَبَائِرَ الْإِثْمِ وَالْفَوَاحِشَ وَإِذَا مَا غَضِبُوا هُمْ يَغْفِرُونَ
और जो लोग बड़े बड़े गुनाहों और बेहयाई की बातों से बचे रहते हैं और ग़ुस्सा आ जाता है तो माफ कर देते हैं
38وَالَّذِينَ اسْتَجَابُوا لِرَبِّهِمْ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَأَمْرُهُمْ شُورَىٰ بَيْنَهُمْ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
और जो अपने परवरदिगार का हुक्म मानते हैं और नमाज़ पढ़ते हैं और उनके कुल काम आपस के मशवरे से होते हैं और जो कुछ हमने उन्हें अता किया है उसमें से (राहे ख़ुदा में) ख़र्च करते हैं
39وَالَّذِينَ إِذَا أَصَابَهُمُ الْبَغْيُ هُمْ يَنتَصِرُونَ
और (वह ऐसे हैं) कि जब उन पर किसी किस्म की ज्यादती की जाती है तो बस वाजिबी बदला ले लेते हैं
40وَجَزَاءُ سَيِّئَةٍ سَيِّئَةٌ مِّثْلُهَا ۖ فَمَنْ عَفَا وَأَصْلَحَ فَأَجْرُهُ عَلَى اللَّهِ ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الظَّالِمِينَ
और बुराई का बदला तो वैसी ही बुराई है उस पर भी जो शख्स माफ कर दे और (मामले की) इसलाह कर दें तो इसका सवाब ख़ुदा के ज़िम्मे है बेशक वह ज़ुल्म करने वालों को पसन्द नहीं करता
अश-शूराकुरान सूची
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38आयत

अनुवाद — अश-शूरा 38

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Tuesday, August 18, 2026

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