अज़-ज़ुखरुफ · 60/89
अनुवाद उच्चारण — सूरा अज़-ज़ुखरुफ
وَلَوْ نَشَاءُ لَجَعَلْنَا مِنكُم مَّلَائِكَةً فِي الْأَرْضِ يَخْلُفُونَ ۝٦٠
Wa law nashaaa`u laja`alnaa minkum malaaa`ikatan fil ardi yakhlufoon
📖 हिंदी अर्थ
और अगर हम चाहते तो तुम ही लोगों में से (किसी को) फ़रिश्ते बना देते जो तुम्हारी जगह ज़मीन में रहते

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
M Mohamed Siddiq Al-Minshawi ✓
A Abdul Basit Abdul Samad ✓
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A Abu Bakr Ash-Shaatree ✓
M Muhammad Ayyoub ✓
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A Abdullah Al-Juhani ✓
M Maher Al Muaiqly ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مِنكُم (तुममें से): यहाँ अर्थ है "तुम्हारे स्थान पर" या "तुम्हारे बदले"।
  • يَخْلُفُونَ (वे उत्तराधिकारी बनते): अर्थात एक के बाद एक आते जाते हैं, पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते हैं।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपनी पूर्ण शक्ति और कुदरत का बयान कर रहे हैं। वह फ़रमाते हैं कि यदि हम चाहते तो तुम इंसानों को ही नष्ट करके तुम्हारे स्थान पर फ़रिश्तों को धरती पर बसा देते, जो तुम्हारी जगह ले लेते और एक दूसरे के उत्तराधिकारी बनते चले जाते। यानी तुम्हारा अस्तित्व ही मिटा कर हम फ़रिश्तों की एक नई उम्मत पैदा कर सकते थे, जो हमारी इबादत में लगे रहते और कभी हमारी नाफ़रमानी न करते।

यह बात उस समय के काफ़िरों के उस दावे के जवाब में कही गई है, जब उन्होंने कहा था कि यदि अल्लाह चाहता तो फ़रिश्तों को भेजता, और वे फ़रिश्तों को अल्लाह की संतान कहने लगे थे। अल्लाह फ़रमाता है कि फ़रिश्ते तो हमारे आज्ञाकारी बंदे हैं, और यदि हम चाहते तो तुम्हें ही ख़त्म करके उन्हें तुम्हारा उत्तराधिकारी बना देते। यह तुम्हारी अहमियत नहीं है कि हम तुम्हारी वजह से अपने फ़ैसले बदल दें।

इस आयत में इंसान को यह सबक़ दिया गया है कि उसे अपनी ताक़त और वजूद पर घमंड नहीं करना चाहिए। अल्लाह की कुदरत के आगे इंसान की हैसियत बहुत छोटी है। यदि अल्लाह चाहे तो किसी भी क्षण इंसान को मिटा कर उसकी जगह कोई और मख़लूक़ पैदा कर सकता है। यह बात इंसान के लिए एक चेतावनी है कि वह अल्लाह की नेमतों का शुक्र अदा करे और उसकी इबादत में लगा रहे।

दावत और नसीहत:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें अल्लाह की अज़ीम शक्ति की याद दिलाती है। जिस अल्लाह के पास यह कुदरत है कि वह पूरी इंसानी नस्ल को ख़त्म करके फ़रिश्तों को ज़मीन पर बसा दे, उसी अल्लाह के पास हमारी हर ज़रूरत को पूरा करने की ताक़त भी है। हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की रज़ा के मुताबिक़ बनाएँ, उसकी इबादत को अपना सबसे बड़ा काम समझें और उसके दिए हुए इस्लाम के सुंदर मार्ग पर चलते हुए अपनी किस्मत को संवारें। अल्लाह ने हमें इंसान बनाकर, अक़्ल देकर और क़ुरआन भेजकर बहुत बड़ी नेमत दी है — इस नेमत की क़द्र करें और अल्लाह के शुक्रगुज़ार बनें।



📜 आयत 58-62 — सूरा अज़-ज़ुखरुफ

58وَقَالُوا أَآلِهَتُنَا خَيْرٌ أَمْ هُوَ ۚ مَا ضَرَبُوهُ لَكَ إِلَّا جَدَلًا ۚ بَلْ هُمْ قَوْمٌ خَصِمُونَ
और बोल उठे कि भला हमारे माबूद अच्छे हैं या वह (ईसा) उन लोगों ने जो ईसा की मिसाल तुमसे बयान की है तो सिर्फ झगड़ने को
59إِنْ هُوَ إِلَّا عَبْدٌ أَنْعَمْنَا عَلَيْهِ وَجَعَلْنَاهُ مَثَلًا لِّبَنِي إِسْرَائِيلَ
बल्कि (हक़ तो यह है कि) ये लोग हैं झगड़ालू ईसा तो बस हमारे एक बन्दे थे जिन पर हमने एहसान किया (नबी बनाया और मौजिज़े दिये) और उनको हमने बनी इसराईल के लिए (अपनी कुदरत का) नमूना बनाया
60وَلَوْ نَشَاءُ لَجَعَلْنَا مِنكُم مَّلَائِكَةً فِي الْأَرْضِ يَخْلُفُونَ
और अगर हम चाहते तो तुम ही लोगों में से (किसी को) फ़रिश्ते बना देते जो तुम्हारी जगह ज़मीन में रहते
61وَإِنَّهُ لَعِلْمٌ لِّلسَّاعَةِ فَلَا تَمْتَرُنَّ بِهَا وَاتَّبِعُونِ ۚ هَٰذَا صِرَاطٌ مُّسْتَقِيمٌ
और वह तो यक़ीनन क़यामत की एक रौशन दलील है तुम लोग इसमें हरगिज़ यक़ न करो और मेरी पैरवी करो यही सीधा रास्ता है
62وَلَا يَصُدَّنَّكُمُ الشَّيْطَانُ ۖ إِنَّهُ لَكُمْ عَدُوٌّ مُّبِينٌ
और (कहीं) शैतान तुम लोगों को (इससे) रोक न दे वही यक़ीनन तुम्हारा खुल्लम खुल्ला दुश्मन है
अज़-ज़ुखरुफकुरान सूची
89आयत
मक्कीअवतरण स्थान
60आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 60

सूरा अज़-ज़ुखरुफ आयत 60 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और अगर हम चाहते तो तुम ही लोगों में से…

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Saturday, October 3, 2026

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