अल-जासिया · 31/37
अनुवाद उच्चारण — अल-जासिया
وَأَمَّا الَّذِينَ كَفَرُوا أَفَلَمْ تَكُنْ آيَاتِي تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فَاسْتَكْبَرْتُمْ وَكُنتُمْ قَوْمًا مُّجْرِمِينَ ۝٣١
Wa ammal lazeena kafarooo afalam takun Aayaatee tutlaa `alaikum fastakbartum wa kuntum qawmam mujrimeen
📖 हिंदी अर्थ
और जिन्होंने कुफ्र एख्तेयार किया (उनसे कहा जाएगा) तो क्या तुम्हारे सामने हमारी आयतें नहीं पढ़ी जाती थीं (ज़रूर) तो तुमने तकब्बुर किया और तुम लोग तो गुनेहगार हो गए
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • آيَاتِي: मेरी आयतें, मेरे प्रमाण, मेरे संकेत।
  • تُتْلَى: पढ़ी जाती थीं, सुनाई जाती थीं।
  • فَاسْتَكْبَرْتُمْ: तो तुमने घमंड किया, अहंकार किया।
  • مُجْرِمِينَ: अपराधी, गुनाहगार, काफिर।

तफसीर (व्याख्या):

जिन लोगों ने अल्लाह को नकारा और उसके रसूलों को झुठलाया, उनसे क़यामत के दिन पूछा जाएगा — ऐसे सवाल के रूप में जो उन्हें शर्मिंदा करे और उनके दिलों को जला दे — कि "क्या मेरी आयतें तुम्हारे सामने नहीं पढ़ी जाती थीं? क्या तुम्हें मेरे प्रमाण नहीं सुनाए गए थे?" यह सवाल इसलिए नहीं होगा कि अल्लाह को उनके हाल का पता नहीं, बल्कि इसलिए होगा कि उनके ऊपर सबूत क़ायम हो जाए और उनके पास कोई बहाना न बचे।

तो उनका जवाब होगा — हाँ, आयतें हमारे सामने पढ़ी जाती थीं, लेकिन हमने उन्हें सुनने से घमंड किया, उन पर ईमान लाने से अहंकार किया। हमने अपने आप को बड़ा समझा और सच्चाई के आगे झुकना गवारा नहीं किया। हम ऐसे लोग थे जो गुनाहों में डूबे हुए थे — शिर्क करते थे, अल्लाह के साथ दूसरों को साझी ठहराते थे, और उसके हुक्मों की परवाह नहीं करते थे। हम न तो सज़ा पर विश्वास रखते थे और न ही इनाम पर, इसलिए हमने अपनी ज़िंदगी में जो चाहा किया, जो मन में आया कर दिया।

यह वह मौका होगा जब उनकी आँखें खुलेंगी, लेकिन तब बहुत देर हो चुकी होगी। अफसोस और पछतावे के सिवा उनके पास कुछ नहीं होगा।

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आज हमारे पास अल्लाह की आयतें — कुरआन — मौजूद है। हम इसे पढ़ते हैं, सुनते हैं, लेकिन क्या हम इस पर अमल करते हैं? क्या हम इसके आगे अपने आप को झुकाते हैं? या फिर हम भी उन लोगों की तरह हैं जो सुनते हैं लेकिन घमंड की वजह से मानते नहीं? याद रखिए, अल्लाह की आयतें हमारे लिए रहमत और हिदायत हैं, और जो इन्हें अपनाएगा वह दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब होगा। आइए, हम अपने घमंड को तोड़ें, अपने अहंकार को मिटाएँ, और अल्लाह के सामने अपने आप को झुका दें — क्योंकि जो अल्लाह के आगे झुकता है, अल्लाह उसे सबसे ऊँचा उठाता है। यही सच्ची कामयाबी है, और यही वह रास्ता है जो हमें जहन्नुम की आग से बचाकर जन्नत की राहत तक पहुँचाएगा।

🎧 सुनें

📜 आयत 29-33 — अल-जासिया

29هَٰذَا كِتَابُنَا يَنطِقُ عَلَيْكُم بِالْحَقِّ ۚ إِنَّا كُنَّا نَسْتَنسِخُ مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
ये हमारी किताब (जिसमें आमाल लिखे हैं) तुम्हारे मुक़ाबले में ठीक ठीक बोल रही है जो कुछ भी तुम करते थे हम लिखवाते जाते थे
30فَأَمَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فَيُدْخِلُهُمْ رَبُّهُمْ فِي رَحْمَتِهِ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْمُبِينُ
ग़रज़ जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और अच्छे (अच्छे) काम किये तो उनको उनका परवरदिगार अपनी रहमत (से बेहिश्त) में दाख़िल करेगा यही तो सरीही कामयाबी है
31وَأَمَّا الَّذِينَ كَفَرُوا أَفَلَمْ تَكُنْ آيَاتِي تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فَاسْتَكْبَرْتُمْ وَكُنتُمْ قَوْمًا مُّجْرِمِينَ
और जिन्होंने कुफ्र एख्तेयार किया (उनसे कहा जाएगा) तो क्या तुम्हारे सामने हमारी आयतें नहीं पढ़ी जाती थीं (ज़रूर) तो तुमने तकब्बुर किया और तुम लोग तो गुनेहगार हो गए
32وَإِذَا قِيلَ إِنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ وَالسَّاعَةُ لَا رَيْبَ فِيهَا قُلْتُم مَّا نَدْرِي مَا السَّاعَةُ إِن نَّظُنُّ إِلَّا ظَنًّا وَمَا نَحْنُ بِمُسْتَيْقِنِينَ
और जब (तुम से) कहा जाता था कि ख़ुदा का वायदा सच्चा है और क़यामत (के आने) में कुछ शुबहा नहीं तो तुम कहते थे कि हम नहीं जानते कि क़यामत क्या चीज़ है हम तो बस (उसे) एक ख्याली बात समझते हैं और हम तो (उसका) यक़ीन नहीं रखते
33وَبَدَا لَهُمْ سَيِّئَاتُ مَا عَمِلُوا وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
और उनके करतूतों की बुराईयाँ उस पर ज़ाहिर हो जाएँगी और जिस (अज़ाब) की ये हँसी उड़ाया करते थे उन्हें (हर तरफ से) घेर लेगा
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अनुवाद — अल-जासिया 31

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Tuesday, August 18, 2026

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