अल-अहकाफ · 29/35
अनुवाद उच्चारण — अल-अहकाफ
وَإِذْ صَرَفْنَا إِلَيْكَ نَفَرًا مِّنَ الْجِنِّ يَسْتَمِعُونَ الْقُرْآنَ فَلَمَّا حَضَرُوهُ قَالُوا أَنصِتُوا ۖ فَلَمَّا قُضِيَ وَلَّوْا إِلَىٰ قَوْمِهِم مُّنذِرِينَ ۝٢٩
Wa iz sarafinaaa ilaika nafaram minal jinni yastami`oonal Quraana falammaa hadaroohu qaalooo ansitoo falammaa qudiya wallaw ilaa qawmihim munzireen
📖 हिंदी अर्थ
और जब हमने जिनों में से कई शख़्शों को तुम्हारी तरफ मुतावज्जे किया कि वह दिल लगाकर क़ुरान सुनें तो जब उनके पास हाज़िर हुए तो एक दुसरे से कहने लगे ख़ामोश बैठे (सुनते) रहो फिर जब (पढ़ना) तमाम हुआ तो अपनी क़ौम की तरफ़ वापस गए
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • صَرَفْنَا: हमने मोड़ा / भेजा
  • نَفَرًا: एक समूह / कुछ लोग
  • أَنصِتُوا: चुप रहो / ध्यान से सुनो
  • قُضِيَ: पूरा किया गया (तिलावत समाप्त हुई)
  • وَلَّوْا: वापस लौटे
  • مُّنذِرِينَ: डराने वाले / सावधान करने वाले

तफसीर:

ऐ नबी! उस समय को याद करो जब हमने जिन्नात के एक समूह को तुम्हारी ओर भेजा, ताकि वे क़ुरआन सुनें। जब वे वहाँ पहुँचे जहाँ तुम क़ुरआन पढ़ रहे थे, तो उन्होंने एक-दूसरे से कहा: "चुप रहो और ध्यान से सुनो!" वे पूरे अदब और गहरी तवज्जोह के साथ क़ुरआन सुनते रहे। जब तिलावत समाप्त हुई, तो उनके दिलों पर क़ुरआन का गहरा असर हुआ और वे ईमान की रोशनी से मुनव्वर हो गए। फिर वे अपनी क़ौम की तरफ लौटे और उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराने और क़ुरआन की हिदायत की दावत देने वाले बनकर गए।

यह वाक़िया इस बात का सबूत है कि क़ुरआन सिर्फ़ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि जिन्नात के लिए भी हिदायत और रहमत है। जब जिन्नात ने क़ुरआन सुना, तो वे इससे प्रभावित हुए बिना न रह सके। यह क़ुरआन की अज़मत और उसकी असरअंगेज़ी को दर्शाता है।

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि क़ुरआन को सुनते समय पूरा अदब और खामोशी रखनी चाहिए, क्योंकि यह अल्लाह का कलाम है। जब जिन्नात — जो आग से बनाए गए हैं — क़ुरआन से इस कदर प्रभावित हुए, तो हम इंसानों को तो और भी ज़्यादा क़ुरआन की तिलावत पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करना चाहिए और उस पर अमल करना चाहिए।

यह वाक़िया हमारे लिए एक नुस्ख़त है कि हिदायत किसी भी मख़लूक़ के लिए खुली है — इंसान हो या जिन्न — बशर्ते वह सच्चे दिल से सुनने और समझने की कोशिश करे। अल्लाह ने क़ुरआन को हर युग और हर क़ौम के लिए हिदायत का ज़रिया बनाया है। हमें भी चाहिए कि क़ुरआन को सुनें, समझें, और उस पर अमल करके अपनी ज़िंदगी को सफल बनाएं।

🎧 सुनें

📜 आयत 27-31 — अल-अहकाफ

27وَلَقَدْ أَهْلَكْنَا مَا حَوْلَكُم مِّنَ الْقُرَىٰ وَصَرَّفْنَا الْآيَاتِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
और (ऐ अहले मक्का) हमने तुम्हारे इर्द गिर्द की बस्तियों को हलाक कर मारा और (अपनी क़ुदरत की) बहुत सी निशानियाँ तरह तरह से दिखा दी ताकि ये लोग बाज़ आएँ (मगर कौन सुनता है)
28فَلَوْلَا نَصَرَهُمُ الَّذِينَ اتَّخَذُوا مِن دُونِ اللَّهِ قُرْبَانًا آلِهَةً ۖ بَلْ ضَلُّوا عَنْهُمْ ۚ وَذَٰلِكَ إِفْكُهُمْ وَمَا كَانُوا يَفْتَرُونَ
तो ख़ुदा के सिवा जिन को उन लोगों ने तक़र्रुब (ख़ुदा) के लिए माबूद बना रखा था उन्होंने (अज़ाब के वक्त) उनकी क्यों न मदद की बल्कि वह तो उनसे ग़ायब हो गये और उनके झूठ और उनकी (इफ़तेरा) परदाज़ियों की ये हक़ीक़त थी
29وَإِذْ صَرَفْنَا إِلَيْكَ نَفَرًا مِّنَ الْجِنِّ يَسْتَمِعُونَ الْقُرْآنَ فَلَمَّا حَضَرُوهُ قَالُوا أَنصِتُوا ۖ فَلَمَّا قُضِيَ وَلَّوْا إِلَىٰ قَوْمِهِم مُّنذِرِينَ
और जब हमने जिनों में से कई शख़्शों को तुम्हारी तरफ मुतावज्जे किया कि वह दिल लगाकर क़ुरान सुनें तो जब उनके पास हाज़िर हुए तो एक दुसरे से कहने लगे ख़ामोश बैठे (सुनते) रहो फिर जब (पढ़ना) तमाम हुआ तो अपनी क़ौम की तरफ़ वापस गए
30قَالُوا يَا قَوْمَنَا إِنَّا سَمِعْنَا كِتَابًا أُنزِلَ مِن بَعْدِ مُوسَىٰ مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ وَإِلَىٰ طَرِيقٍ مُّسْتَقِيمٍ
कि (उनको अज़ाब से) डराएं तो उन से कहना शुरू किया कि ऐ भाइयों हम एक किताब सुन आए हैं जो मूसा के बाद नाज़िल हुई है (और) जो किताबें, पहले (नाज़िल हुयीं) हैं उनकी तसदीक़ करती हैं सच्चे (दीन) और सीधी राह की हिदायत करती हैं
31يَا قَوْمَنَا أَجِيبُوا دَاعِيَ اللَّهِ وَآمِنُوا بِهِ يَغْفِرْ لَكُم مِّن ذُنُوبِكُمْ وَيُجِرْكُم مِّنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ
ऐ हमारी क़ौम ख़ुदा की तरफ बुलाने वाले की बात मानों और ख़ुदा पर ईमान लाओ वह तुम्हारे गुनाह बख्श देगा और (क़यामत) में तुम्हें दर्दनाक अज़ाब से पनाह में रखेगा
अल-अहकाफकुरान सूची
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29आयत

अनुवाद — अल-अहकाफ 29

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Tuesday, August 18, 2026

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