يُقِيمُونَ الصَّلَاةَ: जो नमाज़ को पूरी तरह से अदा करते हैं, उसकी रुक्नों (स्तंभों) और शर्तों का पालन करते हुए।
يُؤْتُونَ الزَّكَاةَ: जो ज़कात (अनिवार्य दान) देते हैं।
رَاكِعُونَ: यहाँ इसका अर्थ है झुकने वाले, अर्थात अल्लाह के आगे विनम्र और ख़ुशू (गिड़गिड़ाहट) के साथ झुकने वाले।
तफ़सीर (व्याख्या):
हे ईमान वालो! तुम्हारे सच्चे सहायक, संरक्षक और मित्र केवल अल्लाह हैं, उसके रसूल (ﷺ) हैं, और वे ईमान वाले लोग हैं जो नमाज़ को पूरी तरह से क़ायम करते हैं—उसकी रुक्नों, शर्तों और आदाब (शिष्टाचार) के साथ—और ज़कात अदा करते हैं, और वे अल्लाह के आगे पूरी विनम्रता और ख़ुशू के साथ झुकते हैं। यह आयत यहूदियों, ईसाइयों और अन्य काफ़िरों से मोहब्बत और निकटता से रोकने के बाद आई है, ताकि मुसलमानों को स्पष्ट कर दिया जाए कि उनकी वफ़ादारी और सहायता का स्रोत कौन है। यहाँ "राक़िऊन" (झुकने वाले) का उल्लेख उनके अत्यधिक विनम्र होने और अल्लाह के प्रति समर्पण की स्थिति को दर्शाता है, जो उनके ईमान की गहराई और अच्छे आचरण की निशानी है। यह आयत उन लोगों की प्रशंसा करती है जो अपने धार्मिक कर्तव्यों (नमाज़) और आर्थिक कर्तव्यों (ज़कात) दोनों को एक साथ निभाते हैं, और यह उन्हें मुसलमानों का सच्चा मित्र और सहायक बनाती है।
फ़ायदे (लाभ):
सच्ची मित्रता का आधार: यह आयत सिखाती है कि एक मुसलमान की सच्ची मित्रता और सहायता अल्लाह, उसके रसूल और ईमान वालों के साथ होनी चाहिए, न कि काफ़िरों के साथ। यह मुसलमानों को एक मज़बूत और पवित्र रिश्ते से जोड़ती है।
नमाज़ और ज़कात का महत्व: यह आयत नमाज़ और ज़कात को एक साथ जोड़कर बताती है कि अल्लाह की इबादत (नमाज़) और उसकी मख़लूक़ (सृष्टि) की सेवा (ज़कात) दोनों एक साथ ज़रूरी हैं। यह एक संतुलित जीवन जीने की शिक्षा देती है—जिसमें अल्लाह का हक़ और बंदों का हक़ दोनों अदा किए जाएँ।
विनम्रता का गुण: "राक़िऊन" (झुकने वाले) का उल्लेख हमें सिखाता है कि अल्लाह के सामने विनम्रता, ख़ुशू और अदब के साथ झुकना बहुत पसंदीदा है। यह अहंकार और घमंड से बचाता है और दिल को अल्लाह की तरफ़ झुकाता है।
ईमान वालों से प्रेम: यह आयत मुसलमानों को आपसी भाईचारे और प्रेम की ओर प्रेरित करती है, क्योंकि सच्चे ईमान वाले ही एक-दूसरे के सहायक और मित्र हैं। यह समाज में एकता और भाईचारे को मज़बूत करती है।
ग़ैर-मुस्लिमों से ताल्लुक़ात में सावधानी: यह आयत मुसलमानों को सचेत करती है कि वे अपने धार्मिक मामलों में काफ़िरों से मित्रता न करें, बल्कि अपने ईमान और अच्छे आचरण की बदौलत सही रास्ते पर चलें। यह उन्हें आत्म-सम्मान और स्वाभिमान सिखाती है।
और मोमिनीन (जब उन पर नेफ़ाक़ ज़ाहिर हो जाएगा तो) कहेंगे क्या ये वही लोग हैं जो सख्त से सख्त क़समें खाकर (हमसे) कहते थे कि हम ज़रूर तुम्हारे साथ हैं उनका सारा किया धरा अकारत हुआ और सख्त घाटे में आ गए
ऐ ईमानदारों तुममें से जो कोई अपने दीन से फिर जाएगा तो (कुछ परवाह नहीं फिर जाए) अनक़रीब ही ख़ुदा ऐसे लोगों को ज़ाहिर कर देगा जिन्हें ख़ुदा दोस्त रखता होगा और वह उसको दोस्त रखते होंगे ईमानदारों के साथ नर्म और मुन्किर (और) काफ़िरों के साथ सख्त ख़ुदा की राह में जेहाद करेंगे और किसी मलामत करने वाले की मलामत की कुछ परवाह न करेंगे ये ख़ुदा का फ़ज़ल (व करम) है वह जिसे चाहता हे देता है और ख़ुदा तो बड़ी गुन्जाइश वाला वाक़िफ़कार है
और जिस शख्स ने ख़ुदा और रसूल और (उन्हीं) ईमानदारों को अपना सरपरस्त बनाया तो (ख़ुदा के लशकर में आ गया और) इसमें तो शक नहीं कि ख़ुदा ही का लशकर वर (ग़ालिब) रहता है
ऐ ईमानदारों जिन लोगों (यहूद व नसारा) को तुम से पहले किताबे (ख़ुदा तौरेत, इन्जील) दी जा चुकी है उनमें से जिन लोगों ने तुम्हारे दीन को हॅसी खेल बना रखा है उनको और कुफ्फ़ार को अपना सरपरस्त न बनाओ और अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो ख़ुदा ही से डरते रहो
सूराकुरान वेबसाइट की स्थापना पवित्र किताब और पाक सुन्नत की सेवा, अल्लाह की ओर बुलावा, और कुरान व सुन्नत के मार्ग पर धार्मिक विज्ञान को सुगम बनाने के एक विनम्र प्रयास के रूप में की गई थी। हम अल्लाह की प्रशंसा और उसके अनुग्रह के लिए धन्यवाद करते हैं, और उससे प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे कार्यों को स्वीकार करे और उन्हें केवल उसके महान चेहरे के लिए विशुद्ध बनाए।