अल-माइदा · 56/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
وَمَن يَتَوَلَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغَالِبُونَ ۝٥٦
Wa mai yatawallal laaha wa Rasoolahoo wallazeena aamanoo fa inna hizbal laahi humul ghaaliboon
📖 हिंदी अर्थ
और जिस शख्स ने ख़ुदा और रसूल और (उन्हीं) ईमानदारों को अपना सरपरस्त बनाया तो (ख़ुदा के लशकर में आ गया और) इसमें तो शक नहीं कि ख़ुदा ही का लशकर वर (ग़ालिब) रहता है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَتَوَلَّ: मित्र बनाए, संरक्षक बनाए, सहायता और समर्थन करे।
  • حِزْبَ اللَّهِ: अल्लाह का दल, अल्लाह के धर्म के समर्थक और सहायक।
  • الْغَالِبُونَ: विजयी, प्रभुत्वशाली, सफल।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत मुसलमानों को स्पष्ट संदेश देती है कि जो व्यक्ति अल्लाह को, उसके रसूल (ﷺ) को और ईमानवालों को अपना मित्र, संरक्षक और सहायक बनाता है—अर्थात उनसे प्रेम करता है, उनकी आज्ञा का पालन करता है और उनके मार्ग पर चलता है—तो वह अल्लाह के दल (हिज़्बुल्लाह) में शामिल हो जाता है। अल्लाह का दल कभी पराजित नहीं होता, क्योंकि अल्लाह स्वयं उनका संरक्षक और सहायक है। चाहे दुनिया में विरोधी कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, अल्लाह की मदद उसके सच्चे बंदों के साथ होती है, और अंततः विजय उन्हीं की होती है। यह आयत उन लोगों के लिए एक आश्वासन है जो अल्लाह और उसके रसूल के साथ वफादारी निभाते हैं, और यह बताती है कि ईमानवालों की कमज़ोरी केवल उनके अल्लाह से दूर होने के कारण है; जब वे अल्लाह से जुड़ते हैं, तो उनकी शक्ति अजेय हो जाती है।

फ़ायदे (लाभ):

  1. यह आयत मुसलमानों को यह विश्वास दिलाती है कि अल्लाह से जुड़ा हुआ दल कभी हारता नहीं—चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों। यह ईमानवालों के दिलों में साहस और धैर्य पैदा करती है।
  2. यह सिखाती है कि सच्ची सफलता और विजय का राज़ अल्लाह, उसके रसूल (ﷺ) और ईमानवालों से प्रेम और एकता में है, न कि धन या ताकत में।
  3. यह आयत मुसलमानों को आपसी भाईचारे और एकजुटता की शिक्षा देती है—जो लोग अल्लाह के दल में शामिल होते हैं, वे एक-दूसरे के सहायक बनते हैं, और यही एकता उन्हें अजेय बनाती है।
  4. यह हमें बताती है कि अल्लाह अपने वफादार बंदों को कभी अकेला नहीं छोड़ता; वह हमेशा उनकी मदद करता है, चाहे वह मदद कितनी भी देर से क्यों न आए। यह विश्वास मुसलमान को हर मुश्किल में स्थिर रखता है।


📜 आयत 54-58 — अल-माइदा

54يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا مَن يَرْتَدَّ مِنكُمْ عَن دِينِهِ فَسَوْفَ يَأْتِي اللَّهُ بِقَوْمٍ يُحِبُّهُمْ وَيُحِبُّونَهُ أَذِلَّةٍ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ أَعِزَّةٍ عَلَى الْكَافِرِينَ يُجَاهِدُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَلَا يَخَافُونَ لَوْمَةَ لَائِمٍ ۚ ذَٰلِكَ فَضْلُ اللَّهِ يُؤْتِيهِ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ
ऐ ईमानदारों तुममें से जो कोई अपने दीन से फिर जाएगा तो (कुछ परवाह नहीं फिर जाए) अनक़रीब ही ख़ुदा ऐसे लोगों को ज़ाहिर कर देगा जिन्हें ख़ुदा दोस्त रखता होगा और वह उसको दोस्त रखते होंगे ईमानदारों के साथ नर्म और मुन्किर (और) काफ़िरों के साथ सख्त ख़ुदा की राह में जेहाद करेंगे और किसी मलामत करने वाले की मलामत की कुछ परवाह न करेंगे ये ख़ुदा का फ़ज़ल (व करम) है वह जिसे चाहता हे देता है और ख़ुदा तो बड़ी गुन्जाइश वाला वाक़िफ़कार है
55إِنَّمَا وَلِيُّكُمُ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا الَّذِينَ يُقِيمُونَ الصَّلَاةَ وَيُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَهُمْ رَاكِعُونَ
(ऐ ईमानदारों) तुम्हारे मालिक सरपरस्त तो बस यही हैं ख़ुदा और उसका रसूल और वह मोमिनीन जो पाबन्दी से नमाज़ अदा करते हैं और हालत रूकूउ में ज़कात देते हैं
56وَمَن يَتَوَلَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغَالِبُونَ
और जिस शख्स ने ख़ुदा और रसूल और (उन्हीं) ईमानदारों को अपना सरपरस्त बनाया तो (ख़ुदा के लशकर में आ गया और) इसमें तो शक नहीं कि ख़ुदा ही का लशकर वर (ग़ालिब) रहता है
57يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَتَّخِذُوا الَّذِينَ اتَّخَذُوا دِينَكُمْ هُزُوًا وَلَعِبًا مِّنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِن قَبْلِكُمْ وَالْكُفَّارَ أَوْلِيَاءَ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
ऐ ईमानदारों जिन लोगों (यहूद व नसारा) को तुम से पहले किताबे (ख़ुदा तौरेत, इन्जील) दी जा चुकी है उनमें से जिन लोगों ने तुम्हारे दीन को हॅसी खेल बना रखा है उनको और कुफ्फ़ार को अपना सरपरस्त न बनाओ और अगर तुम सच्चे ईमानदार हो तो ख़ुदा ही से डरते रहो
58وَإِذَا نَادَيْتُمْ إِلَى الصَّلَاةِ اتَّخَذُوهَا هُزُوًا وَلَعِبًا ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَعْقِلُونَ
और (उनकी शरारत यहॉ तक पहुंची) कि जब तुम (अज़ान देकर) नमाज़ के वास्ते (लोगों को) बुलाते हो ये लोग नमाज़ को हॅसी खेल बनाते हैं ये इस वजह से कि (लोग बिल्कुल बे अक्ल हैं) और कुछ नहीं समझते
अल-माइदाकुरान सूची
120आयत
मदनीRevelation
56आयत

अनुवाद — अल-माइदा 56

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सूरा आयत 56/120 — अल-माइदा المائدة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-माइदा सुनें, अल-माइदा अनुवाद, अल-माइदा mp3, अल-माइदा pdf. आयत 54–58. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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