अल-माइदा · 54/120
अनुवाद उच्चारण — अल-माइदा
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا مَن يَرْتَدَّ مِنكُمْ عَن دِينِهِ فَسَوْفَ يَأْتِي اللَّهُ بِقَوْمٍ يُحِبُّهُمْ وَيُحِبُّونَهُ أَذِلَّةٍ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ أَعِزَّةٍ عَلَى الْكَافِرِينَ يُجَاهِدُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَلَا يَخَافُونَ لَوْمَةَ لَائِمٍ ۚ ذَٰلِكَ فَضْلُ اللَّهِ يُؤْتِيهِ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ ۝٥٤
Yaa aiyuhal lazeena aamanoo mai yartadda minkum `an deenihee fasawfa yaatil laahu biqawminy yuhibbuhum wa yuhibboonahoo azillatin `alal mu`mineena a`izzatin `alal kaafireena yujaahidoona fee sabeelil laahi wa laa yakhaafoona lawmata laaa`im; zaalika fadlul laahi yu`teehi mai yashaaa`; wallaahu Waasi`un `Aleem
📖 हिंदी अर्थ
ऐ ईमानदारों तुममें से जो कोई अपने दीन से फिर जाएगा तो (कुछ परवाह नहीं फिर जाए) अनक़रीब ही ख़ुदा ऐसे लोगों को ज़ाहिर कर देगा जिन्हें ख़ुदा दोस्त रखता होगा और वह उसको दोस्त रखते होंगे ईमानदारों के साथ नर्म और मुन्किर (और) काफ़िरों के साथ सख्त ख़ुदा की राह में जेहाद करेंगे और किसी मलामत करने वाले की मलामत की कुछ परवाह न करेंगे ये ख़ुदा का फ़ज़ल (व करम) है वह जिसे चाहता हे देता है और ख़ुदा तो बड़ी गुन्जाइश वाला वाक़िफ़कार है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَرْتَدَّ: अपने धर्म से लौट जाना, अर्थात ईमान के बाद कुफ़्र की ओर पलट जाना।
  • أَذِلَّةٍ: नम्र, विनम्र, दयावान (मोमिनों के लिए)।
  • أَعِزَّةٍ: सख़्त, कठोर, प्रबल (काफ़िरों के लिए)।
  • لَوْمَةَ لَائِمٍ: किसी मलामत करने वाले की मलामत, निन्दा या फटकार।

तफ़सीर:

ऐ ईमान लाने वालो! तुम में से जो कोई अपने धर्म से फिर जाए (यानी ईस्लाम छोड़कर कुफ़्र की तरफ लौट जाए), तो वह अल्लाह को कोई नुक़्सान नहीं पहुँचा सकता। अल्लाह उसके बदले ऐसे लोगों को लाएगा जो उससे बेहतर होंगे—ऐसे लोग जिन्हें अल्लाह चाहता होगा और जो अल्लाह से मुहब्बत रखते होंगे। वे मोमिनों के साथ नरमी, विनम्रता और दया का व्यवहार करेंगे, और काफ़िरों के साथ सख़्ती, कठोरता और शक्ति से पेश आएँगे। वे अल्लाह की राह में जिहाद करेंगे (अपने माल और जान से) और किसी मलामत करने वाले की मलामत से नहीं डरेंगे, क्योंकि उन्होंने अल्लाह की रज़ा को सबसे आगे रखा होगा। यह सब अल्लाह का फ़ज़ल (कृपा) है, जो वह अपने बन्दों में से जिसे चाहता है प्रदान करता है। अल्लाह बड़ी गुंजाइश वाला (अपने फ़ज़ल में) और सब कुछ जानने वाला है—वह जानता है कि यह फ़ज़ल किसे देना है और किसे नहीं।


फ़ायदे (उपदेश):

  1. ईमान की हक़ीक़त: यह आयत बताती है कि ईमान अल्लाह की देन है, और जो उसे छोड़ देता है, वह अल्लाह को कोई नुक़्सान नहीं पहुँचा सकता। अल्लाह का दीन क़ायम रहने वाला है, चाहे लोग उसे छोड़ दें।
  2. अल्लाह की मुहब्बत की निशानी: सच्चा मोमिन वह है जो अल्लाह से मुहब्बत करे और अल्लाह उससे मुहब्बत करे। यह मुहब्बत अमल से ज़ाहिर होती है—मोमिनों के साथ नरमी, काफ़िरों के साथ सख़्ती, और अल्लाह की राह में जिहाद।
  3. बहादुरी और सच्चाई: मोमिन को किसी की मलामत की परवाह नहीं करनी चाहिए जब वह अल्लाह की राह में काम कर रहा हो। यही सच्ची बहादुरी है—अल्लाह की रज़ा को मख़लूक़ की रज़ा पर तरजीह देना।
  4. अल्लाह का फ़ज़ल: यह आयत मुसलमानों को उम्मीद देती है कि अगर वे अपने दीन पर क़ायम रहेंगे, तो अल्लाह उन्हें दुनिया और आख़िरत में इज़्ज़त देगा। और अगर वे पलट जाएँ, तो अल्लाह उनके बदले बेहतर लोग लाएगा—इसलिए दीन को छोड़ने का कोई औचित्य नहीं।
  5. उम्मत की ज़िम्मेदारी: यह आयत मुसलमानों को सिखाती है कि उन्हें आपस में मुहब्बत और एकता रखनी चाहिए, और काफ़िरों के सामने मज़बूत और सख़्त रहना चाहिए। यही वह सिफ़ात हैं जो अल्लाह को पसंद हैं।


📜 आयत 52-56 — अल-माइदा

52فَتَرَى الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ يُسَارِعُونَ فِيهِمْ يَقُولُونَ نَخْشَىٰ أَن تُصِيبَنَا دَائِرَةٌ ۚ فَعَسَى اللَّهُ أَن يَأْتِيَ بِالْفَتْحِ أَوْ أَمْرٍ مِّنْ عِندِهِ فَيُصْبِحُوا عَلَىٰ مَا أَسَرُّوا فِي أَنفُسِهِمْ نَادِمِينَ
तो (ऐ रसूल) जिन लोगों के दिलों में (नेफ़ाक़ की) बीमारी है तुम उन्हें देखोगे कि उनमें दौड़ दौड़ के मिले जाते हैं और तुमसे उसकी वजह यह बयान करते हैं कि हम तो इससे डरते हैं कि कहीं ऐसा न हो उनके न (मिलने से) ज़माने की गर्दिश में न मुब्तिला हो जाएं तो अनक़रीब ही ख़ुदा (मुसलमानों की) फ़तेह या कोई और बात अपनी तरफ़ से ज़ाहिर कर देगा तब यह लोग इस बदगुमानी पर जो अपने जी में छिपाते थे शर्माएंगे (
53وَيَقُولُ الَّذِينَ آمَنُوا أَهَٰؤُلَاءِ الَّذِينَ أَقْسَمُوا بِاللَّهِ جَهْدَ أَيْمَانِهِمْ ۙ إِنَّهُمْ لَمَعَكُمْ ۚ حَبِطَتْ أَعْمَالُهُمْ فَأَصْبَحُوا خَاسِرِينَ
और मोमिनीन (जब उन पर नेफ़ाक़ ज़ाहिर हो जाएगा तो) कहेंगे क्या ये वही लोग हैं जो सख्त से सख्त क़समें खाकर (हमसे) कहते थे कि हम ज़रूर तुम्हारे साथ हैं उनका सारा किया धरा अकारत हुआ और सख्त घाटे में आ गए
54يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا مَن يَرْتَدَّ مِنكُمْ عَن دِينِهِ فَسَوْفَ يَأْتِي اللَّهُ بِقَوْمٍ يُحِبُّهُمْ وَيُحِبُّونَهُ أَذِلَّةٍ عَلَى الْمُؤْمِنِينَ أَعِزَّةٍ عَلَى الْكَافِرِينَ يُجَاهِدُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَلَا يَخَافُونَ لَوْمَةَ لَائِمٍ ۚ ذَٰلِكَ فَضْلُ اللَّهِ يُؤْتِيهِ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ وَاسِعٌ عَلِيمٌ
ऐ ईमानदारों तुममें से जो कोई अपने दीन से फिर जाएगा तो (कुछ परवाह नहीं फिर जाए) अनक़रीब ही ख़ुदा ऐसे लोगों को ज़ाहिर कर देगा जिन्हें ख़ुदा दोस्त रखता होगा और वह उसको दोस्त रखते होंगे ईमानदारों के साथ नर्म और मुन्किर (और) काफ़िरों के साथ सख्त ख़ुदा की राह में जेहाद करेंगे और किसी मलामत करने वाले की मलामत की कुछ परवाह न करेंगे ये ख़ुदा का फ़ज़ल (व करम) है वह जिसे चाहता हे देता है और ख़ुदा तो बड़ी गुन्जाइश वाला वाक़िफ़कार है
55إِنَّمَا وَلِيُّكُمُ اللَّهُ وَرَسُولُهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا الَّذِينَ يُقِيمُونَ الصَّلَاةَ وَيُؤْتُونَ الزَّكَاةَ وَهُمْ رَاكِعُونَ
(ऐ ईमानदारों) तुम्हारे मालिक सरपरस्त तो बस यही हैं ख़ुदा और उसका रसूल और वह मोमिनीन जो पाबन्दी से नमाज़ अदा करते हैं और हालत रूकूउ में ज़कात देते हैं
56وَمَن يَتَوَلَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَالَّذِينَ آمَنُوا فَإِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْغَالِبُونَ
और जिस शख्स ने ख़ुदा और रसूल और (उन्हीं) ईमानदारों को अपना सरपरस्त बनाया तो (ख़ुदा के लशकर में आ गया और) इसमें तो शक नहीं कि ख़ुदा ही का लशकर वर (ग़ालिब) रहता है
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अनुवाद — अल-माइदा 54

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Tuesday, August 18, 2026

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