अल-हश्र · 14/24
अनुवाद उच्चारण — अल-हश्र
لَا يُقَاتِلُونَكُمْ جَمِيعًا إِلَّا فِي قُرًى مُّحَصَّنَةٍ أَوْ مِن وَرَاءِ جُدُرٍ ۚ بَأْسُهُم بَيْنَهُمْ شَدِيدٌ ۚ تَحْسَبُهُمْ جَمِيعًا وَقُلُوبُهُمْ شَتَّىٰ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَعْقِلُونَ ۝١٤
Laa yuqaatiloonakum jamee`an illaa fee quram muhas sanatin aw minw waraaa`i judur; baasuhum bainahum shadeed; tahsabuhum jamee`anw-wa quloobuhum shatta; zaalika biannahum qawmul laa ya`qiloon
📖 हिंदी अर्थ
ये सब के सब मिलकर भी तुमसे नहीं लड़ सकते, मगर हर तरफ से महफूज़ बस्तियों में या (शहर पनाह की) दीवारों की आड़ में इनकी आपस में तो बड़ी धाक है कि तुम ख्याल करोगे कि सब के सब (एक जान) हैं मगर उनके दिल एक दूसरे से फटे हुए हैं ये इस वजह से कि ये लोग बेअक्ल हैं
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • قُرًى مُّحَصَّنَةٍ – किलेबंद बस्तियाँ या ऐसी बस्तियाँ जो दीवारों और खाइयों से सुरक्षित हों।
  • جُدُرٍ – दीवारें, दीवारों के पीछे से।
  • بَأْسُهُمْ – उनकी लड़ाई, उनकी ताकत या आपसी शत्रुता।
  • شَتَّى – बिखरे हुए, अलग-अलग, परस्पर विरोधी।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ ईमान वालों! यहूदी और मुनाफ़िक़ कभी भी खुले मैदान में इकट्ठे होकर तुमसे युद्ध नहीं कर सकते। उनकी हिम्मत ही नहीं है कि वे तुम्हारे सामने आमने-सामने आकर लड़ें। वे तो केवल दो हालतों में लड़ सकते हैं: या तो किलेबंद बस्तियों की सुरक्षा में रहकर, जहाँ दीवारें और खाइयाँ उन्हें बचाए रखें, या दीवारों के पीछे छिपकर। यह उनकी बुज़दिली और कमज़ोरी की सबसे बड़ी निशानी है।

उनकी आपसी लड़ाई और दुश्मनी बहुत सख्त है। जब तुम उन्हें देखते हो तो समझते हो कि वे एकजुट हैं और उनका एक ही मक़सद है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि उनके दिल बिखरे हुए हैं, उनमें आपसी मोहब्बत नहीं, बल्कि नफ़रत और अदावत है। उनकी यह हालत इसलिए है क्योंकि वे अक़्ल से काम नहीं लेते। अगर वे अक़्ल इस्तेमाल करते तो समझ जाते कि हक़ क्या है, और हक़ पर इत्तिफ़ाक़ कर लेते। लेकिन उन्होंने अक़्ल को छोड़ दिया और अपनी हवस और अदावत का शिकार हो गए।

यह आयत मुसलमानों के लिए बड़ी ख़ुशख़बरी है कि उनके दुश्मन कितने भी ज़्यादा क्यों न हों, उनमें एकता नहीं है। उनके दिल आपस में बिखरे हुए हैं। जब दुश्मन के दिलों में इत्तिफ़ाक़ नहीं, तो उनकी ताकत कभी काम नहीं आ सकती। यह अल्लाह की तरफ से मोमिनीन के लिए एक बड़ी मदद है।

और ऐ मुसलमानों! तुम्हें भी इससे सबक़ लेना चाहिए कि एकता और भाईचारा कितनी बड़ी नेमत है। अल्लाह ने तुम्हें इस्लाम की बरकत से एक उम्मत बनाया है। इस एकता को क़ायम रखो, आपसी मोहब्बत को मज़बूत करो, और अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थामे रहो। याद रखो, जब दिल एक हो जाते हैं तो दुनिया की कोई ताकत उन्हें हरा नहीं सकती। अल्लाह उन लोगों की मदद करता है जो उस पर भरोसा करते हैं और उसके दीन की ख़िदमत करते हैं।

🎧 सुनें

📜 आयत 12-16 — अल-हश्र

12لَئِنْ أُخْرِجُوا لَا يَخْرُجُونَ مَعَهُمْ وَلَئِن قُوتِلُوا لَا يَنصُرُونَهُمْ وَلَئِن نَّصَرُوهُمْ لَيُوَلُّنَّ الْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يُنصَرُونَ
अगर कुफ्फ़ार निकाले भी जाएँ तो ये मुनाफेक़ीन उनके साथ न निकलेंगे और अगर उनसे लड़ाई हुई तो उनकी मदद भी न करेंगे और यक़ीनन करेंगे भी तो पीठ फेर कर भाग जाएँगे
13لَأَنتُمْ أَشَدُّ رَهْبَةً فِي صُدُورِهِم مِّنَ اللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَفْقَهُونَ
फिर उनको कहीं से कुमक भी न मिलेगी (मोमिनों) तुम्हारी हैबत उनके दिलों में ख़ुदा से भी बढ़कर है, ये इस वजह से कि ये लोग समझ नहीं रखते
14لَا يُقَاتِلُونَكُمْ جَمِيعًا إِلَّا فِي قُرًى مُّحَصَّنَةٍ أَوْ مِن وَرَاءِ جُدُرٍ ۚ بَأْسُهُم بَيْنَهُمْ شَدِيدٌ ۚ تَحْسَبُهُمْ جَمِيعًا وَقُلُوبُهُمْ شَتَّىٰ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَعْقِلُونَ
ये सब के सब मिलकर भी तुमसे नहीं लड़ सकते, मगर हर तरफ से महफूज़ बस्तियों में या (शहर पनाह की) दीवारों की आड़ में इनकी आपस में तो बड़ी धाक है कि तुम ख्याल करोगे कि सब के सब (एक जान) हैं मगर उनके दिल एक दूसरे से फटे हुए हैं ये इस वजह से कि ये लोग बेअक्ल हैं
15كَمَثَلِ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ قَرِيبًا ۖ ذَاقُوا وَبَالَ أَمْرِهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
उनका हाल उन लोगों का सा है जो उनसे कुछ ही पेशतर अपने कामों की सज़ा का मज़ा चख चुके हैं और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
16كَمَثَلِ الشَّيْطَانِ إِذْ قَالَ لِلْإِنسَانِ اكْفُرْ فَلَمَّا كَفَرَ قَالَ إِنِّي بَرِيءٌ مِّنكَ إِنِّي أَخَافُ اللَّهَ رَبَّ الْعَالَمِينَ
(मुनाफ़िकों) की मिसाल शैतान की सी है कि इन्सान से कहता रहा कि काफ़िर हो जाओ, फिर जब वह काफ़िर हो गया तो कहने लगा मैं तुमसे बेज़ार हूँ मैं सारे जहाँ के परवरदिगार से डरता हूँ
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Tuesday, August 18, 2026

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