अल-हश्र · 13/24
अनुवाद उच्चारण — अल-हश्र
لَأَنتُمْ أَشَدُّ رَهْبَةً فِي صُدُورِهِم مِّنَ اللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَفْقَهُونَ ۝١٣
La antum ashaddu rahbatan fee sudoorihim minal laah; zaalika bi annahum qawmul laa yafqahoon
📖 हिंदी अर्थ
फिर उनको कहीं से कुमक भी न मिलेगी (मोमिनों) तुम्हारी हैबत उनके दिलों में ख़ुदा से भी बढ़कर है, ये इस वजह से कि ये लोग समझ नहीं रखते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • रहबत (رهبة): डर, भय, खौफ।
  • सुदूरिहिम (صدورهم): उनके दिलों में।
  • ला यफ़क़हून (لا يفقهون): वे समझते नहीं, उन्हें अल्लाह की असलीयत और उसकी शान का इल्म नहीं।

तफ़सीर:

ऐ ईमान वालो! ये बात बड़ी हैरान करने वाली है कि मुनाफ़िक़ीन और यहूदियों के दिलों में तुम्हारा खौफ़ अल्लाह के खौफ़ से ज़्यादा होता है। वे तुमसे इस कदर डरते हैं जैसे कोई अपने सबसे बड़े दुश्मन से डरता है, लेकिन अल्लाह से उनके दिलों में वो रोब और दहशत नहीं होती जो होनी चाहिए। ये उनकी नासमझी और जहालत की वजह से है — वे अल्लाह की अज़मत, उसकी क़ुदरत और उसके इंतक़ाम को नहीं समझते। अगर वे सच में समझते कि अल्लाह कितना बड़ा है, उसका अज़ाब कितना सख्त है, और वो ही है जो तुम्हें उन पर ग़ालिब बनाता है, तो वे अल्लाह से ज़्यादा डरते, तुमसे नहीं।

ये बात ईमान वालों के लिए बड़ी तसल्ली और हौसले की है। अल्लाह ने तुम्हारे रोब को उनके दिलों में डाल रखा है, और ये उसी की तरफ़ से है। जब अल्लाह किसी बंदे की मदद करता है, तो दुश्मनों के दिलों में उसका खौफ़ पैदा कर देता है, चाहे वो ताक़त में कम ही क्यों न हो। ये अल्लाह की सुन्नत है — ईमान वालों को इज़्ज़त देना और मुनाफ़िक़ों को ज़िल्लत में डालना।

इस आयत से हमें सबक़ लेना चाहिए कि अल्लाह से डरना ही असली डर है। जो बंदा अल्लाह से डरता है, अल्लाह उसे हर चीज़ से महफ़ूज़ रखता है और उसके दुश्मनों को उससे डरा देता है। लेकिन जो अल्लाह से नहीं डरता, वो हर चीज़ से डरता है — यहाँ तक कि उसके अपने दिल में भी खौफ़ बस जाता है। ईमान वालों को चाहिए कि वे अल्लाह की अज़मत को समझें, उसकी क़ुदरत को याद रखें, और उसी पर भरोसा करें। जब दिल में अल्लाह का खौफ़ होगा, तो दुनिया की कोई ताक़त हमें नहीं डरा सकती। और याद रखो, अल्लाह अपने ईमान वाले बंदों के साथ है — यही सबसे बड़ी ताक़त है।



📜 आयत 11-15 — अल-हश्र

11۞ أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ نَافَقُوا يَقُولُونَ لِإِخْوَانِهِمُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ لَئِنْ أُخْرِجْتُمْ لَنَخْرُجَنَّ مَعَكُمْ وَلَا نُطِيعُ فِيكُمْ أَحَدًا أَبَدًا وَإِن قُوتِلْتُمْ لَنَنصُرَنَّكُمْ وَاللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ
क्या तुमने उन मुनाफ़िकों की हालत पर नज़र नहीं की जो अपने काफ़िर भाइयों अहले किताब से कहा करते हैं कि अगर कहीं तुम (घरों से) निकाले गए तो यक़ीन जानों कि हम भी तुम्हारे साथ (ज़रूर) निकल खड़े होंगे और तुम्हारे बारे में कभी किसी की इताअत न करेंगे और अगर तुमसे लड़ाई होगी तो ज़रूर तुम्हारी मदद करेंगे, मगर ख़ुदा बयान किए देता है कि ये लोग यक़ीनन झूठे हैं
12لَئِنْ أُخْرِجُوا لَا يَخْرُجُونَ مَعَهُمْ وَلَئِن قُوتِلُوا لَا يَنصُرُونَهُمْ وَلَئِن نَّصَرُوهُمْ لَيُوَلُّنَّ الْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يُنصَرُونَ
अगर कुफ्फ़ार निकाले भी जाएँ तो ये मुनाफेक़ीन उनके साथ न निकलेंगे और अगर उनसे लड़ाई हुई तो उनकी मदद भी न करेंगे और यक़ीनन करेंगे भी तो पीठ फेर कर भाग जाएँगे
13لَأَنتُمْ أَشَدُّ رَهْبَةً فِي صُدُورِهِم مِّنَ اللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَفْقَهُونَ
फिर उनको कहीं से कुमक भी न मिलेगी (मोमिनों) तुम्हारी हैबत उनके दिलों में ख़ुदा से भी बढ़कर है, ये इस वजह से कि ये लोग समझ नहीं रखते
14لَا يُقَاتِلُونَكُمْ جَمِيعًا إِلَّا فِي قُرًى مُّحَصَّنَةٍ أَوْ مِن وَرَاءِ جُدُرٍ ۚ بَأْسُهُم بَيْنَهُمْ شَدِيدٌ ۚ تَحْسَبُهُمْ جَمِيعًا وَقُلُوبُهُمْ شَتَّىٰ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَعْقِلُونَ
ये सब के सब मिलकर भी तुमसे नहीं लड़ सकते, मगर हर तरफ से महफूज़ बस्तियों में या (शहर पनाह की) दीवारों की आड़ में इनकी आपस में तो बड़ी धाक है कि तुम ख्याल करोगे कि सब के सब (एक जान) हैं मगर उनके दिल एक दूसरे से फटे हुए हैं ये इस वजह से कि ये लोग बेअक्ल हैं
15كَمَثَلِ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ قَرِيبًا ۖ ذَاقُوا وَبَالَ أَمْرِهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
उनका हाल उन लोगों का सा है जो उनसे कुछ ही पेशतर अपने कामों की सज़ा का मज़ा चख चुके हैं और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
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Tuesday, August 18, 2026

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