अल-हश्र · 15/24
अनुवाद उच्चारण — अल-हश्र
كَمَثَلِ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ قَرِيبًا ۖ ذَاقُوا وَبَالَ أَمْرِهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ۝١٥
Kamasalil lazeena min qablihim qareeban zaaqoo wabaala amrihim wa lahum `azaabun aleem
📖 हिंदी अर्थ
उनका हाल उन लोगों का सा है जो उनसे कुछ ही पेशतर अपने कामों की सज़ा का मज़ा चख चुके हैं और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • وَبَالَ – बुरा परिणाम, कड़वा अंजाम
  • أَمْرِهِمْ – उनके कर्मों का, उनके काम का
  • أَلِيمٌ – दर्दनाक, बहुत तकलीफ़ देने वाला

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में यहूदियों की मिसाल देते हुए फ़रमाता है कि इन यहूदियों की हालत, जिन्होंने रसूलुल्लाह ﷺ की दुश्मनी की और अल्लाह के दीन के खिलाफ साज़िशें कीं, बिल्कुल उन लोगों जैसी है जो इनसे पहले थे। यानी मक्का के मुशरिकीन और बनी क़ैनुक़ा के यहूदी, जिन्होंने हाल ही में अपने कुफ्र और अल्लाह के रसूल की दुश्मनी का बुरा अंजाम चख लिया।

जिस तरह मक्का के मुशरिकीन ने बद्र के मैदान में अपने कुफ्र और सरकशी की सज़ा पाई — उनमें से कुछ मारे गए, कुछ क़ैद कर लिए गए — और बनी क़ैनुक़ा के यहूदियों को मदीना से निकाल दिया गया, उसी तरह इन यहूदियों (बनी नज़ीर) ने भी दुनिया में अपने कर्मों का कड़वा फल चखा। उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी की, तो अल्लाह ने उन्हें ज़िल्लत और रुसवाई में डाल दिया, उनके घर-बार छीन लिए और उन्हें जिलावतन कर दिया।

लेकिन यह सिर्फ़ दुनिया की सज़ा है। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि उनके लिए आख़िरत में और भी दर्दनाक अज़ाब है — यानी जहन्नम की आग, जो कहीं ज़्यादा सख्त और हमेशा रहने वाली है। यह उन लोगों के लिए है जो अल्लाह की नाफ़रमानी करते हैं और उसके दीन से मुँह मोड़ते हैं।

इस आयत में हमारे लिए बड़ी नसीहत है कि अल्लाह की नाफ़रमानी और उसके रसूल ﷺ की दुश्मनी का अंजाम हमेशा बुरा होता है। इतिहास गवाह है कि जिसने भी अल्लाह के दीन से लड़ाई की, उसे दुनिया में भी रुसवाई हुई और आख़िरत में भी सख्त अज़ाब का सामना करना पड़ेगा। इसलिए हमें चाहिए कि अल्लाह की इताअत करें, उसके रसूल ﷺ की सुन्नत को अपनाएँ और अपने आप को उस अज़ाब से बचाएँ जो कभी ख़त्म नहीं होने वाला। अल्लाह तआला हम सबको सीधी राह पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 13-17 — अल-हश्र

13لَأَنتُمْ أَشَدُّ رَهْبَةً فِي صُدُورِهِم مِّنَ اللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَفْقَهُونَ
फिर उनको कहीं से कुमक भी न मिलेगी (मोमिनों) तुम्हारी हैबत उनके दिलों में ख़ुदा से भी बढ़कर है, ये इस वजह से कि ये लोग समझ नहीं रखते
14لَا يُقَاتِلُونَكُمْ جَمِيعًا إِلَّا فِي قُرًى مُّحَصَّنَةٍ أَوْ مِن وَرَاءِ جُدُرٍ ۚ بَأْسُهُم بَيْنَهُمْ شَدِيدٌ ۚ تَحْسَبُهُمْ جَمِيعًا وَقُلُوبُهُمْ شَتَّىٰ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَعْقِلُونَ
ये सब के सब मिलकर भी तुमसे नहीं लड़ सकते, मगर हर तरफ से महफूज़ बस्तियों में या (शहर पनाह की) दीवारों की आड़ में इनकी आपस में तो बड़ी धाक है कि तुम ख्याल करोगे कि सब के सब (एक जान) हैं मगर उनके दिल एक दूसरे से फटे हुए हैं ये इस वजह से कि ये लोग बेअक्ल हैं
15كَمَثَلِ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ قَرِيبًا ۖ ذَاقُوا وَبَالَ أَمْرِهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
उनका हाल उन लोगों का सा है जो उनसे कुछ ही पेशतर अपने कामों की सज़ा का मज़ा चख चुके हैं और उनके लिए दर्दनाक अज़ाब है
16كَمَثَلِ الشَّيْطَانِ إِذْ قَالَ لِلْإِنسَانِ اكْفُرْ فَلَمَّا كَفَرَ قَالَ إِنِّي بَرِيءٌ مِّنكَ إِنِّي أَخَافُ اللَّهَ رَبَّ الْعَالَمِينَ
(मुनाफ़िकों) की मिसाल शैतान की सी है कि इन्सान से कहता रहा कि काफ़िर हो जाओ, फिर जब वह काफ़िर हो गया तो कहने लगा मैं तुमसे बेज़ार हूँ मैं सारे जहाँ के परवरदिगार से डरता हूँ
17فَكَانَ عَاقِبَتَهُمَا أَنَّهُمَا فِي النَّارِ خَالِدَيْنِ فِيهَا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ الظَّالِمِينَ
तो दोनों का नतीजा ये हुआ कि दोनों दोज़ख़ में (डाले) जाएँगे और उसमें हमेशा रहेंगे और यही तमाम ज़ालिमों की सज़ा है
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अनुवाद — अल-हश्र 15

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Tuesday, August 18, 2026

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