अल-हश्र · 3/24
अनुवाद उच्चारण — अल-हश्र
وَلَوْلَا أَن كَتَبَ اللَّهُ عَلَيْهِمُ الْجَلَاءَ لَعَذَّبَهُمْ فِي الدُّنْيَا ۖ وَلَهُمْ فِي الْآخِرَةِ عَذَابُ النَّارِ ۝٣
Wa law laaa an katabal laahu `alaihimul jalaaa`a la`azzabahum fid dunyaa wa lahum fil Aakhirati `azaabun Naar
📖 हिंदी अर्थ
और ख़ुदा ने उनकी किसमत में ज़िला वतनी न लिखा होता तो उन पर दुनिया में भी (दूसरी तरह) अज़ाब करता और आख़ेरत में तो उन पर जहन्नुम का अज़ाब है ही
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الْجَلَاءَ: वतन से निकाला जाना, निर्वासन, अपने घरों और शहरों से बेदखल होना।
  • كَتَبَ: यहाँ इसका अर्थ है अल्लाह का फ़ैसला कर देना, लिख देना, अनिवार्य कर देना।
  • لَعَذَّبَهُمْ: वह उन्हें अज़ाब देता।
  • فِي الدُّنْيَا: दुनिया में (यानी इसी दुनिया में सज़ा दे देता)।
  • عَذَابُ النَّارِ: आग का अज़ाब (जहन्नम की आग)।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला ने बनी नज़ीर (यहूदियों के एक क़बीले) के उस हाल का ज़िक्र किया है, जिन्होंने अल्लाह के रसूल ﷺ से की गई अपनी संधि तोड़ दी थी और मदीना से निकाले जाने की सज़ा पाई। अल्लाह फ़रमाता है: अगर अल्लाह ने उनके हक़ में यह फ़ैसला न लिख दिया होता कि उन्हें अपने वतन से निकाला जाए और वे जिलावतन हों, तो वह उन्हें दुनिया में ही सख़्त से सख़्त अज़ाब देता — यानी उन्हें क़त्ल (मार डालने) और क़ैद (बंदी बनाने) की सज़ा देता। मगर अल्लाह ने उनके लिए यह आसान सज़ा चुनी कि वे अपने घर-बार छोड़कर निकल जाएँ, ताकि वे ज़िंदा रहकर सोचें और शायद ईमान ले आएँ।

लेकिन यह सिर्फ़ दुनिया की बात है। उनके लिए आख़िरत में आग का अज़ाब तैयार है, जो कहीं ज़्यादा सख़्त और हमेशा रहने वाला है। अगर वे दुनिया में क़त्ल से बच भी गए, तो आख़िरत की आग से नहीं बच सकते, जब तक कि वे तौबा न कर लें और अल्लाह के रसूल ﷺ पर ईमान न ले आएँ।


दावती पहलू (शिक्षाप्रद बातें):

यह आयत हमें कई अहम सबक़ सिखाती है:

  1. अल्लाह की रहमत: अल्लाह तआला बंदों पर रहम करने वाला है। वह चाहता तो उन्हें दुनिया में ही तबाह कर देता, मगर उसने उन्हें मौक़ा दिया, ताकि वे पलट आएँ। यह अल्लाह की मेहरबानी है कि वह जल्दी सज़ा नहीं देता, बल्कि मौक़ा देता है।
  2. अल्लाह का फ़ैसला टलता नहीं: जब अल्लाह किसी क़ौम के हक़ में फ़ैसला कर देता है, तो वह पूरा होकर रहता है। बनी नज़ीर को निकाला गया, उनकी ताक़त और साज़िशों के बावजूद वे अल्लाह के फ़ैसले के आगे कुछ न कर सके।
  3. आख़िरत की सज़ा सबसे बड़ी: दुनिया की सज़ा चाहे जितनी भी सख़्त हो, आख़िरत की सज़ा उससे कहीं बढ़कर है। इसलिए हमें दुनिया की चीज़ों पर आख़िरत को तरजीह देनी चाहिए और अल्लाह की नाफ़रमानी से बचना चाहिए।
  4. तौबा का दरवाज़ा खुला है: अल्लाह ने उन्हें ज़िंदा रखा, ताकि वे तौबा कर सकें। यह हमारे लिए भी पैग़ाम है कि जब तक हम ज़िंदा हैं, अल्लाह की रहमत से उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। अल्लाह की रहमत उसके ग़ज़ब से कहीं ज़्यादा वसीअ है।
  5. अल्लाह की नेमतों का शुक्र: जब हम देखते हैं कि अल्लाह ने हमें अपने घरों, वतन और आज़ादी में रखा है, तो हमें उसका शुक्र अदा करना चाहिए और उसकी नाफ़रमानी से बचना चाहिए। यह बड़ी नेमत है कि हम अपने घरों में इत्मिनान से रहते हैं, जबकि कई क़ौमें अपने वतन से निकाली गईं।

अल्लाह हमें समझने की तौफ़ीक़ दे और हमें उन लोगों में शामिल करे जो उसके फ़ैसलों पर रज़ामंद रहते हैं और उसकी रहमत के तलबगार हैं। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 1-5 — अल-हश्र

1سَبَّحَ لِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۖ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
जो चीज़ आसमानों में है और जो चीज़ ज़मीन में है (सब) ख़ुदा की तस्बीह करती हैं और वही ग़ालिब हिकमत वाला है
2هُوَ الَّذِي أَخْرَجَ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ مِن دِيَارِهِمْ لِأَوَّلِ الْحَشْرِ ۚ مَا ظَنَنتُمْ أَن يَخْرُجُوا ۖ وَظَنُّوا أَنَّهُم مَّانِعَتُهُمْ حُصُونُهُم مِّنَ اللَّهِ فَأَتَاهُمُ اللَّهُ مِنْ حَيْثُ لَمْ يَحْتَسِبُوا ۖ وَقَذَفَ فِي قُلُوبِهِمُ الرُّعْبَ ۚ يُخْرِبُونَ بُيُوتَهُم بِأَيْدِيهِمْ وَأَيْدِي الْمُؤْمِنِينَ فَاعْتَبِرُوا يَا أُولِي الْأَبْصَارِ
वही तो है जिसने कुफ्फ़ार अहले किताब (बनी नुजैर) को पहले हश्र (ज़िलाए वतन) में उनके घरों से निकाल बाहर किया (मुसलमानों) तुमको तो ये वहम भी न था कि वह निकल जाएँगे और वह लोग ये समझे हुये थे कि उनके क़िले उनको ख़ुदा (के अज़ाब) से बचा लेंगे मगर जहाँ से उनको ख्याल भी न था ख़ुदा ने उनको आ लिया और उनके दिलों में (मुसलमानों) को रौब डाल दिया कि वह लोग ख़ुद अपने हाथों से और मोमिनीन के हाथों से अपने घरों को उजाड़ने लगे तो ऐ ऑंख वालों इबरत हासिल करो
3وَلَوْلَا أَن كَتَبَ اللَّهُ عَلَيْهِمُ الْجَلَاءَ لَعَذَّبَهُمْ فِي الدُّنْيَا ۖ وَلَهُمْ فِي الْآخِرَةِ عَذَابُ النَّارِ
और ख़ुदा ने उनकी किसमत में ज़िला वतनी न लिखा होता तो उन पर दुनिया में भी (दूसरी तरह) अज़ाब करता और आख़ेरत में तो उन पर जहन्नुम का अज़ाब है ही
4ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ شَاقُّوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۖ وَمَن يُشَاقِّ اللَّهَ فَإِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ
ये इसलिए कि उन लोगों ने ख़ुदा और उसके रसूल की मुख़ालेफ़त की और जिसने ख़ुदा की मुख़ालेफ़त की तो (याद रहे कि) ख़ुदा बड़ा सख्त अज़ाब देने वाला है
5مَا قَطَعْتُم مِّن لِّينَةٍ أَوْ تَرَكْتُمُوهَا قَائِمَةً عَلَىٰ أُصُولِهَا فَبِإِذْنِ اللَّهِ وَلِيُخْزِيَ الْفَاسِقِينَ
(मोमिनों) खजूर का दरख्त जो तुमने काट डाला या जूँ का तँ से उनकी जड़ों पर खड़ा रहने दिया तो ख़ुदा ही के हुक्म से और मतलब ये था कि वह नाफरमानों को रूसवा करे
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अनुवाद — अल-हश्र 3

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Tuesday, August 18, 2026

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