अल-आराफ · 162/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
فَبَدَّلَ الَّذِينَ ظَلَمُوا مِنْهُمْ قَوْلًا غَيْرَ الَّذِي قِيلَ لَهُمْ فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِجْزًا مِّنَ السَّمَاءِ بِمَا كَانُوا يَظْلِمُونَ ۝١٦٢
Fabaddalal lazeena zalamoo minhum qawlan ghairal lazee qeela lahum fa arsalnaa `alaihim rijzam minas samaaa`i bimaa kaanoo yazlimoon
📖 हिंदी अर्थ
तो ज़ालिमों ने जो बात उनसे कही गई थी उसे बदल कर कुछ और कहना शुरू किया तो हमने उनकी शरारतों की बदौलत उन पर आसमान से अज़ाब भेज दिया
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • فَبَدَّلَ: बदल दिया
  • ظَلَمُوا: अत्याचार किया, हद से आगे बढ़ गए
  • قَوْلًا غَيْرَ الَّذِي قِيلَ لَهُمْ: वह बात जो उनसे कही गई थी, उसके विपरीत बात कही
  • رِجْزًا: यातना, आज़ाब (गज़ब का अज़ाब)
  • مِنَ السَّمَاءِ: आसमान से

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत बनी इसराईल के उस समूह के बारे में है जिन्हें अल्लाह ने आदेश दिया था कि वे अपने शहर (बैतुल-मुक़द्दस) के दरवाज़े में सजदा करते हुए, झुककर और विनम्रता के साथ प्रवेश करें, और कहें: "हित्ततुन" (यानी ऐ अल्लाह! हमारे गुनाह माफ़ कर दे)। लेकिन उन अत्याचारियों ने इस आदेश की अवहेलना की और उसे बदल दिया। उन्होंने विनम्रता के बजाय अहंकार दिखाया, और दरवाज़े में उल्टे (पीठ के बल) घिसटते हुए प्रवेश किया। साथ ही, "हित्ततुन" (माफ़ी माँगने) के बजाय उन्होंने मज़ाक़िया अंदाज़ में कहा: "हब्बतुन फ़ी शअरतिन" (यानी गेहूँ का दाना बाल में)। इस तरह उन्होंने शब्दों के साथ-साथ अपने अमल (कर्म) को भी बिगाड़ दिया।

इस घोर अवज्ञा और उपहास के कारण अल्लाह ने उन पर आसमान से एक भयंकर यातना भेजी, जिसने उन्हें हलाक कर दिया। यह अज़ाब उनके ज़ुल्म और सरकशी का सीधा परिणाम था। अल्लाह ने उन्हें पहले मौका दिया था, लेकिन जब उन्होंने हद से आगे बढ़कर अल्लाह के हुक्म का मज़ाक उड़ाया, तो उनकी सज़ा तय हो गई।

फ़ायदे (सीख):

  1. अल्लाह के हुक्मों में कोई बदलाव या हेर-फेर करना बहुत बड़ा गुनाह है। जो लोग अल्लाह के आदेशों को अपनी मर्ज़ी से तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं, वे अल्लाह की यातना के हक़दार बनते हैं।
  2. अल्लाह की इबादत और उसके हुक्मों की पालना में विनम्रता और खुशी के साथ आज्ञा मानना चाहिए। अहंकार और उपहास का रवैया इंसान को अल्लाह की रहमत से दूर कर देता है।
  3. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की नेमतों और मौकों की कद्र करनी चाहिए। जब अल्लाह किसी को हिदायत देता है और वह उसे ठुकरा देता है, तो अंजाम बहुत बुरा होता है।
  4. इस्लाम सिखाता है कि दुआ और इस्तिग़फ़ार (माफ़ी माँगना) अल्लाह की रहमत पाने का सबसे बड़ा ज़रिया है। बनी इसराईल को जो आदेश दिया गया था, उसमें माफ़ी माँगने की तालीम थी, लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया।
  5. अल्लाह की यातना किसी के लिए भी आ सकती है जब वह ज़ुल्म और नाफ़रमानी में हद से आगे बढ़ जाए। इसलिए हमें हमेशा अल्लाह के हुक्मों की पालना में सच्चाई और ईमानदारी अपनानी चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 160-164 — अल-आराफ

160وَقَطَّعْنَاهُمُ اثْنَتَيْ عَشْرَةَ أَسْبَاطًا أُمَمًا ۚ وَأَوْحَيْنَا إِلَىٰ مُوسَىٰ إِذِ اسْتَسْقَاهُ قَوْمُهُ أَنِ اضْرِب بِّعَصَاكَ الْحَجَرَ ۖ فَانبَجَسَتْ مِنْهُ اثْنَتَا عَشْرَةَ عَيْنًا ۖ قَدْ عَلِمَ كُلُّ أُنَاسٍ مَّشْرَبَهُمْ ۚ وَظَلَّلْنَا عَلَيْهِمُ الْغَمَامَ وَأَنزَلْنَا عَلَيْهِمُ الْمَنَّ وَالسَّلْوَىٰ ۖ كُلُوا مِن طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ ۚ وَمَا ظَلَمُونَا وَلَٰكِن كَانُوا أَنفُسَهُمْ يَظْلِمُونَ
और हमने बनी ईसराइल के एक एक दादा की औलाद को जुदा जुदा बारह गिरोह बना दिए और जब मूसा की क़ौम ने उनसे पानी मॉगा तो हमने उनके पास वही भेजी कि तुम अपनी छड़ी पत्थर पर मारो (छड़ी मारना था) कि उस पत्थर से पानी के बारह चश्मे फूट निकले और ऐसे साफ साफ अलग अलग कि हर क़बीले ने अपना अपना घाट मालूम कर लिया और हमने बनी ईसराइल पर अब्र (बादल) का साया किया और उन पर मन व सलवा (सी नेअमत) नाज़िल की (लोगों) जो पाक (पाकीज़ा) चीज़े तुम्हें दी हैं उन्हें (शौक़ से खाओ पियो) और उन लोगों ने (नाफरमानी करके) कुछ हमारा नहीं बिगाड़ा बल्कि अपना आप ही बिगाड़ते हैं
161وَإِذْ قِيلَ لَهُمُ اسْكُنُوا هَٰذِهِ الْقَرْيَةَ وَكُلُوا مِنْهَا حَيْثُ شِئْتُمْ وَقُولُوا حِطَّةٌ وَادْخُلُوا الْبَابَ سُجَّدًا نَّغْفِرْ لَكُمْ خَطِيئَاتِكُمْ ۚ سَنَزِيدُ الْمُحْسِنِينَ
और जब उनसे कहा गया कि उस गाँव में जाकर रहो सहो और उसके मेवों से जहाँ तुम्हारा जी चाहे (शौक़ से) खाओ (पियो) और मुँह से हुतमा कहते और सजदा करते हुए दरवाजे में दाखिल हो तो हम तुम्हारी ख़ताए बख्श देगें और नेकी करने वालों को हम कुछ ज्यादा ही देगें
162فَبَدَّلَ الَّذِينَ ظَلَمُوا مِنْهُمْ قَوْلًا غَيْرَ الَّذِي قِيلَ لَهُمْ فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِجْزًا مِّنَ السَّمَاءِ بِمَا كَانُوا يَظْلِمُونَ
तो ज़ालिमों ने जो बात उनसे कही गई थी उसे बदल कर कुछ और कहना शुरू किया तो हमने उनकी शरारतों की बदौलत उन पर आसमान से अज़ाब भेज दिया
163وَاسْأَلْهُمْ عَنِ الْقَرْيَةِ الَّتِي كَانَتْ حَاضِرَةَ الْبَحْرِ إِذْ يَعْدُونَ فِي السَّبْتِ إِذْ تَأْتِيهِمْ حِيتَانُهُمْ يَوْمَ سَبْتِهِمْ شُرَّعًا وَيَوْمَ لَا يَسْبِتُونَ ۙ لَا تَأْتِيهِمْ ۚ كَذَٰلِكَ نَبْلُوهُم بِمَا كَانُوا يَفْسُقُونَ
और (ऐ रसूल) उनसे ज़रा उस गाँव का हाल तो पूछो जो दरिया के किनारे वाक़ऐ था जब ये लोग उनके बुज़ुर्ग शुम्बे (सनीचर) के दिन ज्यादती करने लगे कि जब उनका शुम्बे (वाला इबादत का) दिन होता तब तो मछलियाँ सिमट कर उनके सामने पानी पर उभर के आ जाती और जब उनका शुम्बा (वाला इबादत का) दिन न होता तो मछलियॉ उनके पास ही न फटकतीं और चॅूकि ये लोग बदचलन थे उस दरजे से हम भी उनकी यूं ही आज़माइश किया करते थे
164وَإِذْ قَالَتْ أُمَّةٌ مِّنْهُمْ لِمَ تَعِظُونَ قَوْمًا ۙ اللَّهُ مُهْلِكُهُمْ أَوْ مُعَذِّبُهُمْ عَذَابًا شَدِيدًا ۖ قَالُوا مَعْذِرَةً إِلَىٰ رَبِّكُمْ وَلَعَلَّهُمْ يَتَّقُونَ
और जब उनमें से एक जमाअत ने (उन लोगों में से जो शुम्बे के दिन शिकार को मना करते थे) कहा कि जिन्हें ख़ुदा हलाक़ करना या सख्त अज़ाब में मुब्तिला करना चाहता है उन्हें (बेफायदे) क्यो नसीहत करते हो तो वह कहने लगे कि फक़त तुम्हारे परवरदिगार में (अपने को) इल्ज़ाम से बचाने के लिए यायद इसलिए कि ये लोग परहेज़गारी एख्तियार करें
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Tuesday, August 18, 2026

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