तो ज़ालिमों ने जो बात उनसे कही गई थी उसे बदल कर कुछ और कहना शुरू किया तो हमने उनकी शरारतों की बदौलत उन पर आसमान से अज़ाब भेज दिया
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مگر جو ان میں ظالم تھے انہوں نے اس لفظ کو جس کا ان کو حکم دیا گیا تھا بدل کر اس کی جگہ اور لفظ کہنا شروع کیا تو ہم نے ان پر آسمان سے عذاب بھیجا اس لیے کہ ظلم کرتے تھے
तो ज़ालिमों ने जो बात उनसे कही गई थी उसे बदल कर कुछ और कहना शुरू किया तो हमने उनकी शरारतों की बदौलत उन पर आसमान से अज़ाब भेज दिया
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
فَبَدَّلَ: बदल दिया
ظَلَمُوا: अत्याचार किया, हद से आगे बढ़ गए
قَوْلًا غَيْرَ الَّذِي قِيلَ لَهُمْ: वह बात जो उनसे कही गई थी, उसके विपरीत बात कही
رِجْزًا: यातना, आज़ाब (गज़ब का अज़ाब)
مِنَ السَّمَاءِ: आसमान से
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत बनी इसराईल के उस समूह के बारे में है जिन्हें अल्लाह ने आदेश दिया था कि वे अपने शहर (बैतुल-मुक़द्दस) के दरवाज़े में सजदा करते हुए, झुककर और विनम्रता के साथ प्रवेश करें, और कहें: "हित्ततुन" (यानी ऐ अल्लाह! हमारे गुनाह माफ़ कर दे)। लेकिन उन अत्याचारियों ने इस आदेश की अवहेलना की और उसे बदल दिया। उन्होंने विनम्रता के बजाय अहंकार दिखाया, और दरवाज़े में उल्टे (पीठ के बल) घिसटते हुए प्रवेश किया। साथ ही, "हित्ततुन" (माफ़ी माँगने) के बजाय उन्होंने मज़ाक़िया अंदाज़ में कहा: "हब्बतुन फ़ी शअरतिन" (यानी गेहूँ का दाना बाल में)। इस तरह उन्होंने शब्दों के साथ-साथ अपने अमल (कर्म) को भी बिगाड़ दिया।
इस घोर अवज्ञा और उपहास के कारण अल्लाह ने उन पर आसमान से एक भयंकर यातना भेजी, जिसने उन्हें हलाक कर दिया। यह अज़ाब उनके ज़ुल्म और सरकशी का सीधा परिणाम था। अल्लाह ने उन्हें पहले मौका दिया था, लेकिन जब उन्होंने हद से आगे बढ़कर अल्लाह के हुक्म का मज़ाक उड़ाया, तो उनकी सज़ा तय हो गई।
फ़ायदे (सीख):
अल्लाह के हुक्मों में कोई बदलाव या हेर-फेर करना बहुत बड़ा गुनाह है। जो लोग अल्लाह के आदेशों को अपनी मर्ज़ी से तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं, वे अल्लाह की यातना के हक़दार बनते हैं।
अल्लाह की इबादत और उसके हुक्मों की पालना में विनम्रता और खुशी के साथ आज्ञा मानना चाहिए। अहंकार और उपहास का रवैया इंसान को अल्लाह की रहमत से दूर कर देता है।
यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की नेमतों और मौकों की कद्र करनी चाहिए। जब अल्लाह किसी को हिदायत देता है और वह उसे ठुकरा देता है, तो अंजाम बहुत बुरा होता है।
इस्लाम सिखाता है कि दुआ और इस्तिग़फ़ार (माफ़ी माँगना) अल्लाह की रहमत पाने का सबसे बड़ा ज़रिया है। बनी इसराईल को जो आदेश दिया गया था, उसमें माफ़ी माँगने की तालीम थी, लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया।
अल्लाह की यातना किसी के लिए भी आ सकती है जब वह ज़ुल्म और नाफ़रमानी में हद से आगे बढ़ जाए। इसलिए हमें हमेशा अल्लाह के हुक्मों की पालना में सच्चाई और ईमानदारी अपनानी चाहिए।
और हमने बनी ईसराइल के एक एक दादा की औलाद को जुदा जुदा बारह गिरोह बना दिए और जब मूसा की क़ौम ने उनसे पानी मॉगा तो हमने उनके पास वही भेजी कि तुम अपनी छड़ी पत्थर पर मारो (छड़ी मारना था) कि उस पत्थर से पानी के बारह चश्मे फूट निकले और ऐसे साफ साफ अलग अलग कि हर क़बीले ने अपना अपना घाट मालूम कर लिया और हमने बनी ईसराइल पर अब्र (बादल) का साया किया और उन पर मन व सलवा (सी नेअमत) नाज़िल की (लोगों) जो पाक (पाकीज़ा) चीज़े तुम्हें दी हैं उन्हें (शौक़ से खाओ पियो) और उन लोगों ने (नाफरमानी करके) कुछ हमारा नहीं बिगाड़ा बल्कि अपना आप ही बिगाड़ते हैं
और जब उनसे कहा गया कि उस गाँव में जाकर रहो सहो और उसके मेवों से जहाँ तुम्हारा जी चाहे (शौक़ से) खाओ (पियो) और मुँह से हुतमा कहते और सजदा करते हुए दरवाजे में दाखिल हो तो हम तुम्हारी ख़ताए बख्श देगें और नेकी करने वालों को हम कुछ ज्यादा ही देगें
और (ऐ रसूल) उनसे ज़रा उस गाँव का हाल तो पूछो जो दरिया के किनारे वाक़ऐ था जब ये लोग उनके बुज़ुर्ग शुम्बे (सनीचर) के दिन ज्यादती करने लगे कि जब उनका शुम्बे (वाला इबादत का) दिन होता तब तो मछलियाँ सिमट कर उनके सामने पानी पर उभर के आ जाती और जब उनका शुम्बा (वाला इबादत का) दिन न होता तो मछलियॉ उनके पास ही न फटकतीं और चॅूकि ये लोग बदचलन थे उस दरजे से हम भी उनकी यूं ही आज़माइश किया करते थे
और जब उनमें से एक जमाअत ने (उन लोगों में से जो शुम्बे के दिन शिकार को मना करते थे) कहा कि जिन्हें ख़ुदा हलाक़ करना या सख्त अज़ाब में मुब्तिला करना चाहता है उन्हें (बेफायदे) क्यो नसीहत करते हो तो वह कहने लगे कि फक़त तुम्हारे परवरदिगार में (अपने को) इल्ज़ाम से बचाने के लिए यायद इसलिए कि ये लोग परहेज़गारी एख्तियार करें
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