अल-आराफ · 27/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
يَا بَنِي آدَمَ لَا يَفْتِنَنَّكُمُ الشَّيْطَانُ كَمَا أَخْرَجَ أَبَوَيْكُم مِّنَ الْجَنَّةِ يَنزِعُ عَنْهُمَا لِبَاسَهُمَا لِيُرِيَهُمَا سَوْآتِهِمَا ۗ إِنَّهُ يَرَاكُمْ هُوَ وَقَبِيلُهُ مِنْ حَيْثُ لَا تَرَوْنَهُمْ ۗ إِنَّا جَعَلْنَا الشَّيَاطِينَ أَوْلِيَاءَ لِلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ ۝٢٧
Yaa Banee Aadama laa yaftinannnakumush Shaitaanu kamaaa akhraja abawaikum minal Jannati yanzi`u `anhumaa libaasahumaa liyuriyahumaa saw aatihimaaa; innahoo yaraakum huwa wa qabeeluhoo min haisu laa tarawnahum; innaa ja`alnash Shayaateena awliyaaa`a lillazeena laa yu`minoon
📖 हिंदी अर्थ
ताकि लोग नसीहत व इबरत हासिल करें ऐ औलादे आदम (होशियार रहो) कहीं तुम्हें शैतान बहका न दे जिस तरह उसने तुम्हारे बाप माँ आदम व हव्वा को बेहश्त से निकलवा छोड़ा उसी ने उन दोनों से (बेहश्ती) पोशाक उतरवाई ताकि उन दोनों को उनकी शर्मगाहें दिखा दे वह और उसका क़ुनबा ज़रूर तुम्हें इस तरह देखता रहता है कि तुम उन्हे नहीं देखने पाते हमने शैतानों को उन्हीं लोगों का रफीक़ क़रार दिया है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • لَا يَفْتِنَنَّكُم – वह तुम्हें बहका न दे, धोखे में न डाल दे।
  • يَنزِعُ – उतारता है, खींचकर अलग करता है।
  • سَوْآتِهِمَا – उनके शर्मगाह (गोपनीय अंग)।
  • قَبِيلُهُ – उसकी जाति, उसके साथी और अनुयायी।
  • أَوْلِيَاء – मित्र, सहायक, संरक्षक।

तफसीर (व्याख्या):

ऐ आदम की संतानो! शैतान तुम्हें कभी धोखा न दे और न ही वह तुम्हें बहकाकर गुनाह की तरफ खींचे, जैसा उसने तुम्हारे माता-पिता (आदम और हव्वा) के साथ किया। उसने उन्हें वर्जित वृक्ष का फल खाने का लालच देकर जन्नत से निकलवा दिया, और उनका वह लिबास उतरवा दिया जो अल्लाह ने उन्हें पहनाया था ताकि उनके शर्मगाह खुल जाएँ और उन्हें अपनी बेबसी और शर्मिंदगी का एहसास हो। यह शैतान की पुरानी चाल है—वह इंसान को बड़े नेक काम के बहाने गुनाह की तरफ ले जाता है, और जब इंसान उसके जाल में फँसता है, तो उसकी इज़्ज़त और पर्दा छीन लिया जाता है।

अल्लाह तआला हमें आगाह कर रहे हैं कि शैतान और उसकी पूरी जाति तुम्हें देखती है, जबकि तुम उन्हें नहीं देख सकते। यह कितना खतरनाक है! दुश्मन तुम्हें देख रहा है, तुम्हारी कमज़ोरियों को जानता है, तुम्हारे कदमों पर नज़र रखता है, और तुम उसे देख भी नहीं सकते। इसलिए उससे बचने का एक ही रास्ता है—अल्लाह की हिदायत को थाम लो, उसके हुक्मों पर चलो, और शैतान के वसवसों (फुसफुसाहटों) से दूर रहो।

फिर अल्लाह फरमाता है कि हमने शैतानों को उन लोगों का साथी और मददगार बना दिया है जो ईमान नहीं लाते। यानी जो लोग अल्लाह पर ईमान नहीं रखते, उनके रसूलों को नहीं मानते, और अल्लाह की हिदायत पर चलना नहीं चाहते, वे खुद शैतान को अपना दोस्त बना लेते हैं। शैतान उन्हें गुमराही में और धकेलता है, और वे उसके पीछे-पीछे चलते रहते हैं। मगर जो लोग ईमान लाते हैं और नेक अमल करते हैं, उन पर शैतान का कोई ज़ोर नहीं चलता, क्योंकि उन्होंने अल्लाह की पनाह ले ली है।


दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

यह आयत हमें बताती है कि शैतान हमारा खुला दुश्मन है, और उसकी कोशिश यही है कि हमें जन्नत से दूर करे। जिस तरह उसने आदम और हव्वा को जन्नत से निकलवाया, उसी तरह वह हमें भी अल्लाह की रहमत और जन्नत से दूर करना चाहता है। लेकिन अल्लाह ने हमें आगाह कर दिया है और बचाव का रास्ता भी बता दिया है—वह है ईमान, तक़वा और अल्लाह की याद। जब हम अल्लाह के करीब होते हैं, तो शैतान हमसे दूर भागता है। याद रखिए, शैतान की ताकत सिर्फ उन्हीं पर चलती है जो अल्लाह से दूर होते हैं। इसलिए अपने ईमान को मज़बूत कीजिए, नमाज़ की पाबंदी कीजिए, कुरान की तिलावत कीजिए, और अल्लाह से दुआ माँगते रहिए कि वह हमें शैतान के वसवसों से बचाए। अल्लाह अपने बंदों पर बहुत मेहरबान है, और वह चाहता है कि हम जन्नत की राह पर चलें, न कि शैतान की पैरवी करके जहन्नम की तरफ जाएँ।



📜 आयत 25-29 — अल-आराफ

25قَالَ فِيهَا تَحْيَوْنَ وَفِيهَا تَمُوتُونَ وَمِنْهَا تُخْرَجُونَ
ख़ुदा ने (ये भी) फरमाया कि तुम ज़मीन ही में जिन्दगी बसर करोगे और इसी में मरोगे
26يَا بَنِي آدَمَ قَدْ أَنزَلْنَا عَلَيْكُمْ لِبَاسًا يُوَارِي سَوْآتِكُمْ وَرِيشًا ۖ وَلِبَاسُ التَّقْوَىٰ ذَٰلِكَ خَيْرٌ ۚ ذَٰلِكَ مِنْ آيَاتِ اللَّهِ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ
और उसी में से (और) उसी में से फिर दोबारा तुम ज़िन्दा करके निकाले जाओगे ऐ आदम की औलाद हमने तुम्हारे लिए पोशाक नाज़िल की जो तुम्हारे शर्मगाहों को छिपाती है और ज़ीनत के लिए कपड़े और इसके अलावा परहेज़गारी का लिबास है और ये सब (लिबासों) से बेहतर है ये (लिबास) भी ख़ुदा (की कुदरत) की निशानियों से है
27يَا بَنِي آدَمَ لَا يَفْتِنَنَّكُمُ الشَّيْطَانُ كَمَا أَخْرَجَ أَبَوَيْكُم مِّنَ الْجَنَّةِ يَنزِعُ عَنْهُمَا لِبَاسَهُمَا لِيُرِيَهُمَا سَوْآتِهِمَا ۗ إِنَّهُ يَرَاكُمْ هُوَ وَقَبِيلُهُ مِنْ حَيْثُ لَا تَرَوْنَهُمْ ۗ إِنَّا جَعَلْنَا الشَّيَاطِينَ أَوْلِيَاءَ لِلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ
ताकि लोग नसीहत व इबरत हासिल करें ऐ औलादे आदम (होशियार रहो) कहीं तुम्हें शैतान बहका न दे जिस तरह उसने तुम्हारे बाप माँ आदम व हव्वा को बेहश्त से निकलवा छोड़ा उसी ने उन दोनों से (बेहश्ती) पोशाक उतरवाई ताकि उन दोनों को उनकी शर्मगाहें दिखा दे वह और उसका क़ुनबा ज़रूर तुम्हें इस तरह देखता रहता है कि तुम उन्हे नहीं देखने पाते हमने शैतानों को उन्हीं लोगों का रफीक़ क़रार दिया है
28وَإِذَا فَعَلُوا فَاحِشَةً قَالُوا وَجَدْنَا عَلَيْهَا آبَاءَنَا وَاللَّهُ أَمَرَنَا بِهَا ۗ قُلْ إِنَّ اللَّهَ لَا يَأْمُرُ بِالْفَحْشَاءِ ۖ أَتَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
जो ईमान नही रखते और वह लोग जब कोई बुरा काम करते हैं कि हमने उस तरीके पर अपने बाप दादाओं को पाया और ख़ुदा ने (भी) यही हुक्म दिया है (ऐ रसूल) तुम साफ कह दो कि ख़ुदा ने (भी) यही हुक्म दिया है (ऐ रसूल) तुम (साफ) कह दो कि ख़ुदा हरगिज़ बुरे काम का हुक्म नहीं देता क्या तुम लोग ख़ुदा पर (इफ्तिरा करके) वह बातें कहते हो जो तुम नहीं जानते
29قُلْ أَمَرَ رَبِّي بِالْقِسْطِ ۖ وَأَقِيمُوا وُجُوهَكُمْ عِندَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَادْعُوهُ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ ۚ كَمَا بَدَأَكُمْ تَعُودُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मेरे परवरदिगार ने तो इन्साफ का हुक्म दिया है और (ये भी क़रार दिया है कि) हर नमाज़ के वक्त अपने अपने मुँह (क़िबले की तरफ़) सीधे कर लिया करो और इसके लिए निरी खरी इबादत करके उससे दुआ मांगो जिस तरह उसने तुम्हें शुरू शुरू पैदा किया था
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अनुवाद — अल-आराफ 27

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Tuesday, August 18, 2026

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