अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- फ़ाहिशा (فَاحِشَةً): अत्यंत बुरा कार्य, घृणित कर्म, जैसे मूर्तिपूजा, बुरे काम, और काबा का चक्कर लगाते समय नग्न होना।
- वजदना (وَجَدْنَا): हमने पाया, हमने देखा।
- अबाअना (آبَاءَنَا): हमारे बाप-दादा, पूर्वज।
- अमरना (أَمَرَنَا): हमें आदेश दिया।
- तक़ूलून (تَقُولُونَ): तुम कहते हो, तुम आरोप लगाते हो।
विस्तृत तफ़सीर:
जब ये मुशरिकीन (बहुदेववादी) कोई घिनौना और शर्मनाक काम करते हैं — जैसे मूर्तियों की पूजा करना, काबा के तवाफ़ के दौरान नंगे होना, या अन्य बुरे कर्म — और कोई उन्हें टोकता है या वे स्वयं अपने किए पर शर्मिंदा होते हैं, तो वे बहाने बनाते हैं। वे कहते हैं: "हमने अपने बाप-दादाओं को इन्हीं कामों पर पाया है, और हम तो बस उन्हीं के नक्शे-क़दम पर चल रहे हैं।" फिर वे इससे भी आगे बढ़कर झूठ और धृष्टता से यह दावा करते हैं कि "अल्लाह ने स्वयं हमें इन कामों का आदेश दिया है।" वे अपनी बुराइयों को सिर्फ़ पैतृक परंपरा ही नहीं, बल्कि ईश्वरीय आदेश बताकर उसे धार्मिक रंग देने की कोशिश करते हैं।
अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को आदेश देता है कि आप इनके इस झूठे दावे का दृढ़ता से खंडन करें और कहें: "अल्लाह कभी भी अश्लील और बुरे कामों का आदेश नहीं देता।" यह अल्लाह की पाक सिफ़ात के खिलाफ़ है। अल्लाह तो सदैव अच्छाई, पवित्रता, नेकी और भलाई का ही आदेश देता है। उसकी शान इससे बहुत ऊँची है कि वह अपने बंदों को गंदगी और बुराई का हुक्म दे। फिर आप उनसे पूछें: "क्या तुम अल्लाह पर वह बात थोपते हो जिसका तुम्हें कोई ज्ञान ही नहीं? क्या तुम बिना किसी प्रमाण और इल्म के अल्लाह के नाम पर झूठी बातें गढ़ते हो?" यह एक सख्त फटकार है और साथ ही उन्हें सोचने की दावत भी है।
यह आयत हमें सिखाती है कि अंधी परंपरा और पैतृक रीति-रिवाज़ों का पालन तभी जायज़ है जब वे अल्लाह की शिक्षाओं के अनुरूप हों। यदि कोई रिवाज़ गलत है, तो उसे बदलना ही होगा, चाहे वह कितना ही पुराना क्यों न हो। इस्लाम तर्क, ज्ञान और प्रमाण का धर्म है। हमें कभी भी अल्लाह के नाम पर झूठ नहीं बोलना चाहिए, न ही अपनी मनमानी को धर्म का नाम देना चाहिए। अल्लाह की राह सीधी और स्पष्ट है — वह हमेशा अच्छाई, सच्चाई, पवित्रता और नेकी की ओर बुलाती है। जो लोग बुराई को अच्छाई के नाम पर पेश करते हैं, वे अल्लाह पर बड़ा आरोप लगाते हैं, और यह बहुत बड़ा पाप है।
इस आयत से हमें यह भी सीख मिलती है कि हर मुसलमान को चाहिए कि वह अपने जीवन में अल्लाह के आदेशों को ही सर्वोपरि माने, न कि अपने बुज़ुर्गों की उन रीतियों को जो अल्लाह की शिक्षाओं के खिलाफ़ हों। सच्चा इंसान वही है जो अल्लाह के कहने पर चले, और अल्लाह तो हमेशा भलाई और पवित्रता का ही आदेश देता है। यही सफलता और मुक्ति का रास्ता है।
📜 आयत 26-30 — अल-आराफ
अनुवाद — अल-आराफ 28
सूरा अल-आराफ आयत 28 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : जो ईमान नही रखते और वह लोग जब कोई बुरा…सूरा आयत 28/206 — अल-आराफ الأعراف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-आराफ सुनें, अल-आराफ अनुवाद, अल-आराफ mp3, अल-आराफ pdf. आयत 26–30. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Tuesday, August 18, 2026
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