अल-आराफ · 28/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
وَإِذَا فَعَلُوا فَاحِشَةً قَالُوا وَجَدْنَا عَلَيْهَا آبَاءَنَا وَاللَّهُ أَمَرَنَا بِهَا ۗ قُلْ إِنَّ اللَّهَ لَا يَأْمُرُ بِالْفَحْشَاءِ ۖ أَتَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ ۝٢٨
Wa izaa fa`aloo faahishatan qaaloo wajadnaa `alaihaaa aabaaa`ana wallaahu amaranaa bihaa; qul innal laaha laa yaamuru bilfahshaaa`i a-taqooloona `alal laahi mmaa laa ta`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
जो ईमान नही रखते और वह लोग जब कोई बुरा काम करते हैं कि हमने उस तरीके पर अपने बाप दादाओं को पाया और ख़ुदा ने (भी) यही हुक्म दिया है (ऐ रसूल) तुम साफ कह दो कि ख़ुदा ने (भी) यही हुक्म दिया है (ऐ रसूल) तुम (साफ) कह दो कि ख़ुदा हरगिज़ बुरे काम का हुक्म नहीं देता क्या तुम लोग ख़ुदा पर (इफ्तिरा करके) वह बातें कहते हो जो तुम नहीं जानते
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • फ़ाहिशा (فَاحِشَةً): अत्यंत बुरा कार्य, घृणित कर्म, जैसे मूर्तिपूजा, बुरे काम, और काबा का चक्कर लगाते समय नग्न होना।
  • वजदना (وَجَدْنَا): हमने पाया, हमने देखा।
  • अबाअना (آبَاءَنَا): हमारे बाप-दादा, पूर्वज।
  • अमरना (أَمَرَنَا): हमें आदेश दिया।
  • तक़ूलून (تَقُولُونَ): तुम कहते हो, तुम आरोप लगाते हो।

विस्तृत तफ़सीर:

जब ये मुशरिकीन (बहुदेववादी) कोई घिनौना और शर्मनाक काम करते हैं — जैसे मूर्तियों की पूजा करना, काबा के तवाफ़ के दौरान नंगे होना, या अन्य बुरे कर्म — और कोई उन्हें टोकता है या वे स्वयं अपने किए पर शर्मिंदा होते हैं, तो वे बहाने बनाते हैं। वे कहते हैं: "हमने अपने बाप-दादाओं को इन्हीं कामों पर पाया है, और हम तो बस उन्हीं के नक्शे-क़दम पर चल रहे हैं।" फिर वे इससे भी आगे बढ़कर झूठ और धृष्टता से यह दावा करते हैं कि "अल्लाह ने स्वयं हमें इन कामों का आदेश दिया है।" वे अपनी बुराइयों को सिर्फ़ पैतृक परंपरा ही नहीं, बल्कि ईश्वरीय आदेश बताकर उसे धार्मिक रंग देने की कोशिश करते हैं।

अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को आदेश देता है कि आप इनके इस झूठे दावे का दृढ़ता से खंडन करें और कहें: "अल्लाह कभी भी अश्लील और बुरे कामों का आदेश नहीं देता।" यह अल्लाह की पाक सिफ़ात के खिलाफ़ है। अल्लाह तो सदैव अच्छाई, पवित्रता, नेकी और भलाई का ही आदेश देता है। उसकी शान इससे बहुत ऊँची है कि वह अपने बंदों को गंदगी और बुराई का हुक्म दे। फिर आप उनसे पूछें: "क्या तुम अल्लाह पर वह बात थोपते हो जिसका तुम्हें कोई ज्ञान ही नहीं? क्या तुम बिना किसी प्रमाण और इल्म के अल्लाह के नाम पर झूठी बातें गढ़ते हो?" यह एक सख्त फटकार है और साथ ही उन्हें सोचने की दावत भी है।

यह आयत हमें सिखाती है कि अंधी परंपरा और पैतृक रीति-रिवाज़ों का पालन तभी जायज़ है जब वे अल्लाह की शिक्षाओं के अनुरूप हों। यदि कोई रिवाज़ गलत है, तो उसे बदलना ही होगा, चाहे वह कितना ही पुराना क्यों न हो। इस्लाम तर्क, ज्ञान और प्रमाण का धर्म है। हमें कभी भी अल्लाह के नाम पर झूठ नहीं बोलना चाहिए, न ही अपनी मनमानी को धर्म का नाम देना चाहिए। अल्लाह की राह सीधी और स्पष्ट है — वह हमेशा अच्छाई, सच्चाई, पवित्रता और नेकी की ओर बुलाती है। जो लोग बुराई को अच्छाई के नाम पर पेश करते हैं, वे अल्लाह पर बड़ा आरोप लगाते हैं, और यह बहुत बड़ा पाप है।

इस आयत से हमें यह भी सीख मिलती है कि हर मुसलमान को चाहिए कि वह अपने जीवन में अल्लाह के आदेशों को ही सर्वोपरि माने, न कि अपने बुज़ुर्गों की उन रीतियों को जो अल्लाह की शिक्षाओं के खिलाफ़ हों। सच्चा इंसान वही है जो अल्लाह के कहने पर चले, और अल्लाह तो हमेशा भलाई और पवित्रता का ही आदेश देता है। यही सफलता और मुक्ति का रास्ता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 26-30 — अल-आराफ

26يَا بَنِي آدَمَ قَدْ أَنزَلْنَا عَلَيْكُمْ لِبَاسًا يُوَارِي سَوْآتِكُمْ وَرِيشًا ۖ وَلِبَاسُ التَّقْوَىٰ ذَٰلِكَ خَيْرٌ ۚ ذَٰلِكَ مِنْ آيَاتِ اللَّهِ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ
और उसी में से (और) उसी में से फिर दोबारा तुम ज़िन्दा करके निकाले जाओगे ऐ आदम की औलाद हमने तुम्हारे लिए पोशाक नाज़िल की जो तुम्हारे शर्मगाहों को छिपाती है और ज़ीनत के लिए कपड़े और इसके अलावा परहेज़गारी का लिबास है और ये सब (लिबासों) से बेहतर है ये (लिबास) भी ख़ुदा (की कुदरत) की निशानियों से है
27يَا بَنِي آدَمَ لَا يَفْتِنَنَّكُمُ الشَّيْطَانُ كَمَا أَخْرَجَ أَبَوَيْكُم مِّنَ الْجَنَّةِ يَنزِعُ عَنْهُمَا لِبَاسَهُمَا لِيُرِيَهُمَا سَوْآتِهِمَا ۗ إِنَّهُ يَرَاكُمْ هُوَ وَقَبِيلُهُ مِنْ حَيْثُ لَا تَرَوْنَهُمْ ۗ إِنَّا جَعَلْنَا الشَّيَاطِينَ أَوْلِيَاءَ لِلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ
ताकि लोग नसीहत व इबरत हासिल करें ऐ औलादे आदम (होशियार रहो) कहीं तुम्हें शैतान बहका न दे जिस तरह उसने तुम्हारे बाप माँ आदम व हव्वा को बेहश्त से निकलवा छोड़ा उसी ने उन दोनों से (बेहश्ती) पोशाक उतरवाई ताकि उन दोनों को उनकी शर्मगाहें दिखा दे वह और उसका क़ुनबा ज़रूर तुम्हें इस तरह देखता रहता है कि तुम उन्हे नहीं देखने पाते हमने शैतानों को उन्हीं लोगों का रफीक़ क़रार दिया है
28وَإِذَا فَعَلُوا فَاحِشَةً قَالُوا وَجَدْنَا عَلَيْهَا آبَاءَنَا وَاللَّهُ أَمَرَنَا بِهَا ۗ قُلْ إِنَّ اللَّهَ لَا يَأْمُرُ بِالْفَحْشَاءِ ۖ أَتَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
जो ईमान नही रखते और वह लोग जब कोई बुरा काम करते हैं कि हमने उस तरीके पर अपने बाप दादाओं को पाया और ख़ुदा ने (भी) यही हुक्म दिया है (ऐ रसूल) तुम साफ कह दो कि ख़ुदा ने (भी) यही हुक्म दिया है (ऐ रसूल) तुम (साफ) कह दो कि ख़ुदा हरगिज़ बुरे काम का हुक्म नहीं देता क्या तुम लोग ख़ुदा पर (इफ्तिरा करके) वह बातें कहते हो जो तुम नहीं जानते
29قُلْ أَمَرَ رَبِّي بِالْقِسْطِ ۖ وَأَقِيمُوا وُجُوهَكُمْ عِندَ كُلِّ مَسْجِدٍ وَادْعُوهُ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ ۚ كَمَا بَدَأَكُمْ تَعُودُونَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मेरे परवरदिगार ने तो इन्साफ का हुक्म दिया है और (ये भी क़रार दिया है कि) हर नमाज़ के वक्त अपने अपने मुँह (क़िबले की तरफ़) सीधे कर लिया करो और इसके लिए निरी खरी इबादत करके उससे दुआ मांगो जिस तरह उसने तुम्हें शुरू शुरू पैदा किया था
30فَرِيقًا هَدَىٰ وَفَرِيقًا حَقَّ عَلَيْهِمُ الضَّلَالَةُ ۗ إِنَّهُمُ اتَّخَذُوا الشَّيَاطِينَ أَوْلِيَاءَ مِن دُونِ اللَّهِ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُم مُّهْتَدُونَ
उसी तरह फिर (दोबारा) ज़िन्दा किये जाओगे उसी ने एक फरीक़ की हिदायत की और एक गिरोह (के सर) पर गुमराही सवार हो गई उन लोगों ने ख़ुदा को छोड़कर शैतानों को अपना सरपरस्त बना लिया और बावजूद उसके गुमराह करते हैं कि वह राह रास्ते पर है
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Tuesday, August 18, 2026

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