अल-आराफ · 26/206
अनुवाद उच्चारण — अल-आराफ
يَا بَنِي آدَمَ قَدْ أَنزَلْنَا عَلَيْكُمْ لِبَاسًا يُوَارِي سَوْآتِكُمْ وَرِيشًا ۖ وَلِبَاسُ التَّقْوَىٰ ذَٰلِكَ خَيْرٌ ۚ ذَٰلِكَ مِنْ آيَاتِ اللَّهِ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ ۝٢٦
Yaa Baneee Aadama qad anzalnaa `alaikum libaasany yuwaaree saw aatikum wa reeshanw wa libaasut taqwaa zaalika khair; zaalika min Aayaatil laahi la`allahum yaz zakkaroon
📖 हिंदी अर्थ
और उसी में से (और) उसी में से फिर दोबारा तुम ज़िन्दा करके निकाले जाओगे ऐ आदम की औलाद हमने तुम्हारे लिए पोशाक नाज़िल की जो तुम्हारे शर्मगाहों को छिपाती है और ज़ीनत के लिए कपड़े और इसके अलावा परहेज़गारी का लिबास है और ये सब (लिबासों) से बेहतर है ये (लिबास) भी ख़ुदा (की कुदरत) की निशानियों से है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • लिबासन – वस्त्र, पहनावा
  • युवारी – ढकने वाला, छिपाने वाला
  • सौआत – शर्मगाहें, वे अंग जिन्हें छिपाना आवश्यक है
  • रीशन – सुंदरता और सजावट का वस्त्र, पक्षियों के पंखों की तरह जो उनकी शोभा बढ़ाते हैं
  • लिबासुत-तक़्वा – परहेज़गारी और अल्लाह के डर का वस्त्र

विस्तृत तफ़सीर:

ऐ आदम की संतान! अल्लाह तआला ने अपनी असीम कृपा और दया से तुम्हें दो प्रकार के वस्त्र प्रदान किए हैं। पहला वह वस्त्र जो तुम्हारी शर्मगाहों को ढकता है – यह तुम्हारी बुनियादी आवश्यकता है, जिसके बिना मानव जीवन अधूरा और लज्जाजनक होता। यह वस्त्र तुम्हारी गरिमा और सम्मान की रक्षा करता है। दूसरा वह वस्त्र है जो तुम्हारी सुंदरता और शोभा को बढ़ाता है – जैसे पक्षियों के पंख उनकी सुंदरता का कारण होते हैं, उसी प्रकार यह वस्त्र तुम्हें समाज में गरिमा और आकर्षण प्रदान करता है।

किंतु इन दोनों से भी बढ़कर और उत्तम वस्त्र है – तक़्वा का वस्त्र। यह वह आंतरिक गुण है जो अल्लाह के आदेशों का पालन करने और उसकी मनाही से बचने से प्राप्त होता है। यह वस्त्र आत्मा की पवित्रता, हृदय की शुद्धता और चरित्र की ऊँचाई का प्रतीक है। जबकि शारीरिक वस्त्र केवल बाहरी अंगों को ढकता है, तक़्वा का वस्त्र आंतरिक कमजोरियों, बुराइयों और पापों से मनुष्य की रक्षा करता है। यही वह वस्त्र है जो मनुष्य को अल्लाह के समक्ष सर्वोच्च सम्मान प्रदान करता है।

अल्लाह तआला का यह उपहार – वस्त्रों का अवतरण – उसकी रूबूबियत (प्रभुत्व), एकता और उसकी असीम दया की स्पष्ट निशानी है। यह इस बात का प्रमाण है कि अल्लाह अपने बंदों की हर आवश्यकता को जानता है और उसे पूरा करता है। वह चाहता है कि तुम इन नेमतों को पहचानो, उन पर विचार करो और उसका शुक्र अदा करो।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि जिस प्रकार हम अपने शरीर को ढकने के लिए वस्त्र पहनते हैं, उसी प्रकार हमें अपनी आत्मा को भी तक़्वा के वस्त्र से सजाना चाहिए। जिस प्रकार बिना वस्त्र के मनुष्य लज्जित और अपमानित होता है, उसी प्रकार बिना तक़्वा के आत्मा नग्न और कमज़ोर होती है। अल्लाह ने हमें दोनों प्रकार के वस्त्र दिए हैं – एक शारीरिक आवश्यकता के लिए और एक आध्यात्मिक उन्नति के लिए। यह अल्लाह की महान दया है कि उसने हमें न केवल शारीरिक सुरक्षा प्रदान की, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग भी दिखाया। आइए, हम अल्लाह की इन नेमतों को पहचानें, उसका शुक्र अदा करें और तक़्वा के वस्त्र को धारण करके अपने जीवन को सफल बनाएं। याद रखें, सच्ची शोभा और सम्मान उसी को प्राप्त है जो अल्लाह के डर और परहेज़गारी को अपना सबसे सुंदर वस्त्र बनाता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 24-28 — अल-आराफ

24قَالَ اهْبِطُوا بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ عَدُوٌّ ۖ وَلَكُمْ فِي الْأَرْضِ مُسْتَقَرٌّ وَمَتَاعٌ إِلَىٰ حِينٍ
हुक्म हुआ तुम (मियां बीबी शैतान) सब के सब बेहशत से नीचे उतरो तुममें से एक का एक दुश्मन है और (एक ख़ास) वक्त तक तुम्हारा ज़मीन में ठहराव (ठिकाना) और ज़िन्दगी का सामना है
25قَالَ فِيهَا تَحْيَوْنَ وَفِيهَا تَمُوتُونَ وَمِنْهَا تُخْرَجُونَ
ख़ुदा ने (ये भी) फरमाया कि तुम ज़मीन ही में जिन्दगी बसर करोगे और इसी में मरोगे
26يَا بَنِي آدَمَ قَدْ أَنزَلْنَا عَلَيْكُمْ لِبَاسًا يُوَارِي سَوْآتِكُمْ وَرِيشًا ۖ وَلِبَاسُ التَّقْوَىٰ ذَٰلِكَ خَيْرٌ ۚ ذَٰلِكَ مِنْ آيَاتِ اللَّهِ لَعَلَّهُمْ يَذَّكَّرُونَ
और उसी में से (और) उसी में से फिर दोबारा तुम ज़िन्दा करके निकाले जाओगे ऐ आदम की औलाद हमने तुम्हारे लिए पोशाक नाज़िल की जो तुम्हारे शर्मगाहों को छिपाती है और ज़ीनत के लिए कपड़े और इसके अलावा परहेज़गारी का लिबास है और ये सब (लिबासों) से बेहतर है ये (लिबास) भी ख़ुदा (की कुदरत) की निशानियों से है
27يَا بَنِي آدَمَ لَا يَفْتِنَنَّكُمُ الشَّيْطَانُ كَمَا أَخْرَجَ أَبَوَيْكُم مِّنَ الْجَنَّةِ يَنزِعُ عَنْهُمَا لِبَاسَهُمَا لِيُرِيَهُمَا سَوْآتِهِمَا ۗ إِنَّهُ يَرَاكُمْ هُوَ وَقَبِيلُهُ مِنْ حَيْثُ لَا تَرَوْنَهُمْ ۗ إِنَّا جَعَلْنَا الشَّيَاطِينَ أَوْلِيَاءَ لِلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ
ताकि लोग नसीहत व इबरत हासिल करें ऐ औलादे आदम (होशियार रहो) कहीं तुम्हें शैतान बहका न दे जिस तरह उसने तुम्हारे बाप माँ आदम व हव्वा को बेहश्त से निकलवा छोड़ा उसी ने उन दोनों से (बेहश्ती) पोशाक उतरवाई ताकि उन दोनों को उनकी शर्मगाहें दिखा दे वह और उसका क़ुनबा ज़रूर तुम्हें इस तरह देखता रहता है कि तुम उन्हे नहीं देखने पाते हमने शैतानों को उन्हीं लोगों का रफीक़ क़रार दिया है
28وَإِذَا فَعَلُوا فَاحِشَةً قَالُوا وَجَدْنَا عَلَيْهَا آبَاءَنَا وَاللَّهُ أَمَرَنَا بِهَا ۗ قُلْ إِنَّ اللَّهَ لَا يَأْمُرُ بِالْفَحْشَاءِ ۖ أَتَقُولُونَ عَلَى اللَّهِ مَا لَا تَعْلَمُونَ
जो ईमान नही रखते और वह लोग जब कोई बुरा काम करते हैं कि हमने उस तरीके पर अपने बाप दादाओं को पाया और ख़ुदा ने (भी) यही हुक्म दिया है (ऐ रसूल) तुम साफ कह दो कि ख़ुदा ने (भी) यही हुक्म दिया है (ऐ रसूल) तुम (साफ) कह दो कि ख़ुदा हरगिज़ बुरे काम का हुक्म नहीं देता क्या तुम लोग ख़ुदा पर (इफ्तिरा करके) वह बातें कहते हो जो तुम नहीं जानते
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अनुवाद — अल-आराफ 26

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Tuesday, August 18, 2026

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