अल-क़ियामा · 18/40
अनुवाद उच्चारण — अल-क़ियामा
فَإِذَا قَرَأْنَاهُ فَاتَّبِعْ قُرْآنَهُ ۝١٨
Fa izaa qaraanaahu fattabi` qur aanah
📖 हिंदी अर्थ
तो जब हम उसको (जिबरील की ज़बानी) पढ़ें तो तुम भी (पूरा) सुनने के बाद इसी तरह पढ़ा करो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَإِذَا قَرَأْنَاهُ: जब हम (जिब्रील के माध्यम से) इसे पढ़ें।
  • فَاتَّبِعْ قُرْآنَهُ: तो तुम उसके पढ़ने का अनुसरण करो, यानी ध्यान से सुनो और उसी के अनुसार पढ़ो।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत नबी करीम ﷺ को संबोधित करते हुए बताती है कि जब जिब्रील अमीन वही (कुरआन) लेकर आते हैं और उसे पढ़ते हैं, तो आप ﷺ को चाहिए कि आप उनकी क़िराअत को ध्यान से सुनें, पूरी तरह से चुप रहकर उसे सुनें, और फिर उसी तरह पढ़ें जैसे जिब्रील ने पढ़ा है। यह इसलिए है क्योंकि अल्लाह तआला ने खुद इस कुरआन को आपके सीने में जमा करने और आपको इसे पढ़ाने की ज़िम्मेदारी ली है।

इस आयत में अल्लाह तआला अपने नबी को तसल्ली दे रहे हैं कि वह वही के दौरान जल्दबाज़ी न करें, क्योंकि कुरआन को याद कराना और उसे सुरक्षित रखना अल्लाह का काम है। जब जिब्रील पढ़ना खत्म कर लें, तब आप ﷺ उसे पढ़ें। यह सिखाता है कि कुरआन सुनते समय पूरी तरह से ध्यान और खामोशी ज़रूरी है, ताकि हम उसे अच्छी तरह समझ सकें।

यह आयत हमें सिखाती है कि कुरआन सुनना और उस पर ध्यान देना एक इबादत है। जब भी कुरआन पढ़ा जाए, हमें चुप होकर सुनना चाहिए, क्योंकि यही तरीका है जिससे दिल में नूर और समझ पैदा होती है। अल्लाह तआला ने अपने नबी को यह तालीम दी, ताकि हम भी इसी अदब (शिष्टाचार) को अपनाएं।

यह वही का एक बहुत ही प्यारा पहलू है कि अल्लाह अपने बंदे को सिखाता है कि कैसे उसकी किताब को सुनना और पढ़ना है। यह हमारे लिए रहमत है कि अल्लाह ने कुरआन को आसान बनाया और हमें इसके पढ़ने और समझने का तरीका सिखाया। हमें चाहिए कि हम कुरआन को सुनते समय पूरी तरह से ध्यान दें, क्योंकि यही वह ज़रिया है जिससे हमारे दिलों को सुकून मिलता है और हमारी ज़िंदगी में हिदायत आती है।

अल्लाह तआला ने इस आयत में यह भी बताया कि कुरआन की हिफाज़त (सुरक्षा) का वादा उसने खुद किया है, इसलिए हमें किसी भी तरह की चिंता नहीं करनी चाहिए। हमारा काम सिर्फ सुनना, समझना और उस पर अमल करना है। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया और आखिरत में कामयाबी की तरफ ले जाता है।

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि कुरआन के साथ हमारा रिश्ता सिर्फ पढ़ने का नहीं, बल्कि सुनने, समझने और अमल करने का होना चाहिए। जब हम कुरआन को ध्यान से सुनते हैं, तो हमारे दिल में उसकी मोहब्बत पैदा होती है और हम उस पर अमल करने की तौफीक पाते हैं। यही वह चीज़ है जो हमें जन्नत की तरफ ले जाती है और हमें अल्लाह का करीबी बंदा बनाती है।



📜 आयत 16-20 — अल-क़ियामा

16لَا تُحَرِّكْ بِهِ لِسَانَكَ لِتَعْجَلَ بِهِ
(ऐ रसूल) वही के जल्दी याद करने वास्ते अपनी ज़बान को हरकत न दो
17إِنَّ عَلَيْنَا جَمْعَهُ وَقُرْآنَهُ
उसका जमा कर देना और पढ़वा देना तो यक़ीनी हमारे ज़िम्मे है
18فَإِذَا قَرَأْنَاهُ فَاتَّبِعْ قُرْآنَهُ
तो जब हम उसको (जिबरील की ज़बानी) पढ़ें तो तुम भी (पूरा) सुनने के बाद इसी तरह पढ़ा करो
19ثُمَّ إِنَّ عَلَيْنَا بَيَانَهُ
फिर उस (के मुश्किलात का समझा देना भी हमारे ज़िम्में है)
20كَلَّا بَلْ تُحِبُّونَ الْعَاجِلَةَ
मगर (लोगों) हक़ तो ये है कि तुम लोग दुनिया को दोस्त रखते हो
अल-क़ियामाकुरान सूची
40आयत
मक्कीRevelation
18आयत

अनुवाद — अल-क़ियामा 18

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Tuesday, August 18, 2026

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